रोजाना फास्ट फूड खाता है बच्चा, तो हो जाएं सावधान! दिमाग पर पड़ सकता है असर

खबर सार :-

फास्ट फूड का सेवन केवल शरीर के लिए ही नहीं, बल्कि दिमाग के लिए भी हानिकारक है। अगर बच्चा आमतौर पर पिज्जा, बर्गर जैसी चीजें खाता है तो उसकी याददाश्त कमजोर हो सकती है।
बच्चों के शरीर ही नहीं, दिमाग पर भी असर डालता है फास्ट फूड

खबर विस्तार : -

नई दिल्लीः मोमो, मैगी, पिज्जा, बर्गर और आइसक्रीम जैसी चीजें बच्चों को खूब पसंद होती हैं। बच्चों की सेहत के लिए इन सब चीजों की एक सीमित मात्रा ही ठीक है। लेकिन, कई बार बच्चों की जिद पर उन्हें फास्ट फूड दे दिया जाता है। ये न केवल उनके शरीर पर प्रतिकूल असर डालता है, बल्कि इनसे दिमाग भी सुस्त हो जाता है। 

आजकल की भागदौड़ वाली जिंदगी में रेडीमेड भोजन का चलन बढ़ गया है। रेस्टोरेंट से खाना मंगाना और रेडी टू ईट फूड को जल्दी बना लेना आसान है। लेकिन, इनके रोजाना सेवन से शरीर और मस्तिष्क पर प्रतिकूल असर दिखने लगता है। बच्चों की जिद पर उन्हें बार-बार फास्ट फूड देना उनके लिए हानिकारक साबित हो सकता है। आइए जानते हैं कि बच्चों को फास्ट फूड के सेवन से शरीर और दिमाग पर क्या असर पड़ता है-

2 साल से कम उम्र के बच्चों को न दें फास्ट फूड

बच्चों को फास्ट फूड जितना हो सके कम देना चाहिए; एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि इसे महीने में एक बार से भी कम खाया जाए या बिल्कुल न खाया जाए। दो साल से कम उम्र के बच्चों को फास्ट फूड बिल्कुल नहीं देना चाहिए; इस उम्र में बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास तेजी से होता है और जंक फूड उनके अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। दो से पांच साल की उम्र के बच्चों के लिए इसे महीने में एक बार से ज्यादा नहीं देना चाहिए। पांच साल से ज्यादा उम्र के बच्चों के लिए इसे कभी-कभी ही देना बेहतर है—यानी बहुत कम, जैसे महीने में एक बार। इसे रेगुलर खाना या हफ्ते में कई बार खाना बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदायक है।

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स्लो पाइजन माना जाता है मैदा

मैदा, जो आजकल लगभग सभी फास्ट फूड और बेकरी प्रोडक्ट्स में मुख्य सामग्री बन गया है, हमारी सेहत के लिए 'धीमे जहर' जैसा साबित हो रहा है। पिज्जा, बर्गर, ब्रेड, बिस्किट, समोसे और कचौड़ी जैसी चीजे भले ही स्वादिष्ट हों, लेकिन इन्हें बनाने में इस्तेमाल होने वाला मैदा शरीर के लिए बहुत नुकसानदायक होता है। मैदा गेहूं के दानों से चोकर (bran) और जर्म (germ) को हटाकर बनाया जाता है, जिससे सिर्फ स्टार्च बचता है। इस प्रक्रिया में विटामिन, मिनरल और फाइबर पूरी तरह खत्म हो जाते हैं। इसके अलावा, इसका रंग और बनावट बेहतर बनाने के लिए बेंजोयल पेरोक्साइड और क्लोरीन गैस जैसे ब्लीचिंग एजेंट मिलाए जाते हैं; ये ऐसे केमिकल हैं जो सेहत के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

मैदा शरीर पर कई तरह से बुरा असर डालता है। आइए जानते हैं-

  • सबसे पहले, यह पाचन तंत्र पर भारी बोझ डालता है। आंतों में पहुंचने पर यह गोंद जैसी परत बना लेता है, जिससे कब्ज, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याएं होती हैं। 
  • इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत ज्यादा होता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल तेजी से बढ़ता है, जो खासकर डायबिटीज के मरीजों के लिए खतरनाक है।
  • मैदे का लगातार सेवन करने से शरीर में फैट जमा होता है, (खासकर पेट और कमर के आसपास) जिससे मोटापा और मेटाबॉलिक विकार होते हैं। साथ ही, यह 'बैड' कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल बढ़ाता है, जिससे दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।
  • मैदे में न तो पोषक तत्व होते हैं और न ही फाइबर। यह सिर्फ 'खाली कैलोरी' (empty calories) देता है, जो धीरे-धीरे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) को कमजोर कर देती हैं। 
  • आयुर्वेद के अनुसार, मैदा पचने में भारी और एसिड बनाने वाला होता है; यह पाचन अग्नि को कमजोर करता है और शरीर में जहरीले तत्व जमा करता है। यह 'कफ दोष' को बढ़ाता है, जिससे मोटापा, डायबिटीज और जोड़ों के दर्द जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

आधुनिक रिसर्च भी इस बात की पुष्टि करती है। 2010 की एक स्टडी में पाया गया कि जो लोग रोजाना रिफाइंड आटे से बनी चीजें खाते थे, उनमें दिल की बीमारी का खतरा 30% ज्यादा था। इसलिए, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट का ज्यादा सेवन न करने की सलाह दी है। साबुत गेहूं का आटा, मल्टीग्रेन आटा, जौ, ओट्स, बेसन और मक्के के आटे जैसे विकल्पों को चुनना कहीं ज्यादा फायदेमंद है, क्योंकि इनमें फाइबर, प्रोटीन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में होते हैं।

फास्ट फूड का मस्तिष्क पर असर

  • तले हुए और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ शरीर और मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं में दीर्घकालिक सूजन पैदा करते हैं।
  • यह सूजन मस्तिष्क की कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) को नुकसान पहुंचाती है, जिससे संज्ञानात्मक कार्यक्षमता में समय से पहले गिरावट का खतरा पैदा होता है।
  • फास्ट फूड में पाए जाने वाले अनहेल्दी फैट और जरूरत से ज्यादा चीनी, दिमाग के उस हिस्से को नुकसान पहुंचाते हैं जो सीखने और याददाश्त के लिए जिम्मेदार होता है। इससे मस्तिष्क के काम करने की क्षमता क्षीण होती जाती है।

घर का बना खाना सबसे अच्छा 

भले ही फास्ट फूड, रेस्टोरेंट का खाना या पैक्ड फूड खाने में बहुत स्वादिष्ट लगें, लेकिन सेहत के मामले में घर का बना खाना ही सबसे बेहतर होता है। इसके मुख्य कारण हैं ताजगी और शुद्धता। घर पर खाना बनाते समय हम सामग्री खुद चुनते हैं। हम ताजी और मौसमी सब्जियां, साफ दालें, अच्छी क्वालिटी का अनाज और जरूरत के हिसाब से मसाले इस्तेमाल करते हैं। हमें ठीक-ठीक पता होता है कि हम क्या खा रहे हैं। इसके उलट, बाहर के खाने में इस्तेमाल होने वाले तेल, मसालों और सामग्री की क्वालिटी पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। जानें इसके फायदे- 

  • घर पर खाना बनाते समय हम साफ-सफाई का खुद ध्यान रखते हैं, जैसे बर्तन, किचन और अपने हाथों को साफ रखना। लेकिन बाहर के खाने में सफाई के स्तर की कोई गारंटी नहीं होती। इसीलिए बाहर का खाना खाने से अक्सर पेट से जुड़ी परेशानियाँ हो जाती हैं।
  • घर पर हम अपनी पसंद के हिसाब से तेल, नमक और मसाले डालते हैं। अगर किसी को कम तेल वाला खाना पसंद है, तो उसे वैसे ही बनाया जा सकता है। वहीं, बाहर के खाने में अक्सर बहुत ज्यादा तेल, मसाले और नमक होता है, जो धीरे-धीरे शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
  • संतुलित आहार भी जरूरी है। घर के बने खाने में हम आसानी से दाल, सब्ज़ी, रोटी, चावल और सलाद को संतुलित मात्रा में शामिल कर सकते हैं, जिससे शरीर को सभी ज़रूरी पोषक तत्व मिलें। बाहर के खाने में अक्सर इस संतुलन की कमी होती है, जिसका असर सेहत पर पड़ सकता है।
  •  घर का बना खाना सिर्फ भूख मिटाने का जरिया नहीं है; इसमें परिवार का प्यार भी शामिल होता है। जब कोई हमारे लिए अपने हाथों से खाना बनाता है, तो एक भावनात्मक जुड़ाव बनता है जिससे मानसिक शांति भी मिलती है।
  • घर का बना खाना खाने से मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों का ख़तरा कम हो जाता है, क्योंकि हम ज्यादा तेल, चीनी और अस्वास्थ्यकर चीजों से बच सकते हैं। साथ ही, घर का बना खाना आसानी से पच जाता है। बाहर का भारी और तला-भुना खाना पेट पर ज्यादा बोझ डालता है, जबकि घर का बना खाना हल्का और प्राकृतिक होता है।

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