बच्चों की सेहत के लिए बड़ा कदम, इस राज्य में स्कूल-कॉलेजों के बाहर जंक फूड की बिक्री पर रोक की सिफारिश
खबर सार :-
मध्य प्रदेश में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर स्कूल-कॉलेजों के 50 मीटर के दायरे में जंक फूड की बिक्री पर पाबंदी लगाने की सिफारिश की है।
खबर विस्तार : -
भोपाल: मध्य प्रदेश में बच्चों की सेहत और पोषण को लेकर एक अहम नीतिगत कदम उठाया गया है। बच्चों की बेहतर सेहत और सुरक्षित खान-पान का माहौल सुनिश्चित करने के लिए 'राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग' ने स्कूल और कॉलेज कैंपस के अंदर और उनके आस-पास के इलाकों में ज्यादा फैट, नमक और चीनी (HFSS) वाले खाने-पीने की चीजों पर नियंत्रण की पहल की है। आयोग ने शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को पत्र लिखकर उनसे अपील की है कि वे शिक्षण संस्थानों के परिसर और उनके 50 मीटर के दायरे के लिए जरूरी गाइडलाइंस जारी करें।
अधिकारों के तहत उठाया गया मुद्दा
आयोग ने सरकार का ध्यान इस बात की ओर भी दिलाया है कि वह संसद द्वारा बनाए गए 'बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005' के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है। इस अधिनियम की धारा 17 में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के गठन का प्रावधान है, जबकि धारा 24 में यह कहा गया है कि धारा 13(1), 14 और 15 के प्रावधान राज्य आयोग पर भी लागू होते हैं। धारा 13 आयोग को बाल अधिकारों के लिए संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा करने, उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपाय सुझाने और बाल अधिकारों व कल्याण से जुड़े मुद्दों को संबंधित अधिकारियों के सामने उठाने का अधिकार देती है।
स्कूलों के बाहर जंक फूड उपलब्ध—क्यों?
आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा कहती हैं, "बच्चों की खान-पान की आदतों और सेहत पर बुरा असर डालने वाली खाने-पीने की चीजों की आसानी से उपलब्धता पर रोक लगाना उनकी भलाई और स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है। स्कूल स्तर पर खान-पान की आदतों में सुधार करके भविष्य में मोटापा, डायबिटीज, हाइपरटेंशन और जीवनशैली से जुड़ी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करने में अहम भूमिका निभाई जा सकती है।"
बच्चों में खान-पान की आदतों पर जताई चिंता
आयोग ने अपने पत्र में बच्चों में बदलती खान-पान की आदतों को गंभीर चिंता का विषय बताया है। पैक्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा चीनी वाले ड्रिंक्स, फ्राइड फूड, मीठे स्नैक्स और नमक व फैट से भरपूर चीजें तेजी से बच्चों के रोजाना के खाने का हिस्सा बन रही हैं। आयोग का तर्क है कि बचपन में बनी खान-पान की आदतें लंबे समय में किसी व्यक्ति की सेहत और जीवनशैली पर असर डालती हैं। स्कूल सिर्फ शिक्षा देने की जगह नहीं हैं, बल्कि बच्चे के व्यवहार, अनुशासन और जीवनशैली को आकार देने वाले अहम संस्थान भी हैं; इसलिए, स्कूलों में स्वस्थ खान-पान की शिक्षा और स्कूल परिसर के बाहर आसानी से मिलने वाले अस्वास्थ्यकर (unhealthy) खाद्य पदार्थों के बीच के विरोधाभास को दूर करना जरूरी है।
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50 मीटर के दायरे में विज्ञापन पर भी रोक
आयोग की सिफारिशें स्कूल और कॉलेज की कैंटीन से आगे तक जाती हैं; वे परिसर और उसके आस-पास 50 मीटर के दायरे में HFSS (ज्यादा फैट, नमक और चीनी वाले) खाद्य पदार्थों की न केवल बिक्री, बल्कि विज्ञापन, प्रचार, ब्रांडिंग और मार्केटिंग (खासकर बच्चों को लक्षित करने वाली) को नियंत्रित करने के लिए एक प्रभावी प्रणाली की मांग करती हैं। यह स्थानीय निकायों, जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग के माध्यम से आस-पास के खाद्य विक्रेताओं की नियमित निगरानी और नियमों के पालन के लिए एक तंत्र स्थापित करने का भी सुझाव देता है।
कैंटीन के लिए पौष्टिक भोजन की मानक सूची
आयोग ने स्कूल और कॉलेज परिसरों में चलने वाली कैंटीन, कैफेटेरिया, हॉस्टल और फूड आउटलेट के लिए स्वस्थ, पौष्टिक खाद्य पदार्थों के मानक और सूची तय करने की सिफारिश की है। इसके अलावा, यह बच्चों को स्थानीय और पारंपरिक पौष्टिक भोजन से जोड़ने के लिए 'स्वस्थ भोजन-स्वस्थ बचपन' जैसे अभियान शुरू करने का सुझाव देता है। आयोग संतुलित आहार, पोषण, खाद्य सुरक्षा, स्वस्थ जीवन शैली और शारीरिक गतिविधि के बारे में बच्चों में उम्र के हिसाब से जागरूकता पैदा करने पर भी जोर देता है।
कुपोषण और बदलती जीवन शैली की चुनौती
यह ध्यान देने योग्य है कि मध्य प्रदेश में बच्चों के पोषण की चुनौती दोहरी है। जहां कई इलाकों में कुपोषण और पोषण की कमी चिंता का विषय बनी हुई है, वहीं शहरी क्षेत्रों में बदलती जीवन शैली, शारीरिक निष्क्रियता और असंतुलित आहार से जुड़ी समस्याएं देखी जा रही हैं। आयोग का मानना है कि राज्य की बाल पोषण नीति का उद्देश्य न केवल बच्चों को भोजन उपलब्ध कराना होना चाहिए, बल्कि एक सुरक्षित, स्वच्छ, पौष्टिक और संतुलित खाद्य वातावरण सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।
छह विभाग मिलकर कार्य योजना बनाएंगे
इस मामले को किसी एक विभाग तक सीमित रखने के बजाय, आयोग ने स्वास्थ्य, स्कूल शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, खाद्य सुरक्षा, शहरी प्रशासन और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभागों के समन्वय से अंतर-विभागीय कार्य योजना तैयार करने की सिफारिश की है। इसने जिला स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करके एक समयबद्ध निगरानी प्रणाली स्थापित करने का भी सुझाव दिया है।
छोटे वेंडरों की आजीविका का भी ध्यान रखा
आयोग ने साफ किया है कि प्रस्तावित सिस्टम का मकसद छोटे फ़ूड वेंडरों या खाने-पीने से जुड़े किसी भी कारोबार की आजीविका पर बेवजह असर डालना नहीं है। जरूरत पड़ने पर इसे चरणों में लागू करने, एक ट्रांजिशन पीरियड (बदलाव का समय) देने और मंजूरी-प्राप्त पौष्टिक खाने के विकल्पों को बढ़ावा देने के प्रावधान किए जा सकते हैं। असल में, मकसद कारोबार बंद करना नहीं, बल्कि बच्चों के आस-पास खाने-पीने के माहौल में व्यवहार संबंधी बदलाव लाना है।
आयोग ने ‘इलाज से बेहतर बचाव’ पर जोर दिया
आयोग ने स्कूल शिक्षा मंत्री से बच्चों की सेहत के मामले में ‘इलाज से बेहतर बचाव’ (prevention over cure) के नज़रिए को प्राथमिकता देने का आग्रह किया है। इसने मध्य प्रदेश में एक असरदार सिस्टम बनाने की ज़रूरत पर जोर दिया है, जो FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) के ‘ईट राइट स्कूल’ प्रोग्राम जैसी पहलों के अनुरूप हो।
मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की यह सिफारिश इसलिए अहम है क्योंकि पहली बार बच्चों के खान-पान के मुद्दे को सिर्फ फूड सेफ़्टी (खाद्य सुरक्षा) के मामले के तौर पर नहीं, बल्कि बाल अधिकारों, सेहत, पोषण और सुरक्षित विकास को शामिल करने वाले एक व्यापक मुद्दे के तौर पर देखा जा रहा है। अगर सरकार इसके आधार पर कोई पॉलिसी या गाइडलाइन जारी करती है, तो यह स्कूलों के आस-पास खाने-पीने के माहौल को बदलने और पूरे राज्य में बच्चों के लिए सेहतमंद खान-पान का माहौल बनाने की दिशा में एक अहम कदम साबित होगा।
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