टीबी के खिलाफ जंग तेज, आसानी से पहचान में आएगी बीमारी

खबर सार :-

टीबी को खत्म करने का संकल्प लिया गया है। 2030 तक इसे पूरी तरह से मिटाना है। डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के सदस्य देशों ने गंभीर बीमारी के खिलाफ कई ठोस कदम उठाए हैं।
टीबी के खिलाफ बन रही योजना, बीमारी से मुक्ति पाने का लक्ष्य

खबर विस्तार : -

नई दिल्ली:  डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के सदस्य देशों ने गंभीर बीमारी टीबी को खत्म करने का संकल्प लिया है। यह बीमारी अब जल्द पहचान में आ जाएगी। इसके रोकथाम और इलाज की बेहतर सुविधा के साथ परिवारों के लिए आर्थिक मदद की व्यवस्था भी की जाएगी। नई टीबी वैक्सीन को तैयार करने के लिए एक ठोस कदम उठाया जा रहा है। 

टीबी से हर साल लाखों लोगों की मौत हो जाती है। कई परिवारों के सामने रोटी का संकट हो जाता है। टीबी का इलाज संभव है। यदि जरूरतमंद हर व्यक्ति को समय से उचित दवाएं मिल जाएं, तो वह ठीक हो सकता है। डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के प्रभारी अधिकारी डॉ. नीलेश बुद्धा ने डब्ल्यूएचओ क्षेत्रीय समिति के 79वें सत्र में टीबी को लेकर चिंता जताई। कहा कि इलाज संभव है और इसे रोका भी जा सकता है। 

 34 प्रतिशत मामले एक ही क्षेत्र के

दुनिया की लगभग एक चौथाई आबादी डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में रहती है। 2024 में दुनिया में टीबी के जितने भी मामलों आए, उनमें 34 प्रतिशत यहीं से थे। इस भाग से लगभग 4.33 लाख लोगों की मौत टीबी से हुई। यहां करीब 36.8 लाख नए मामले आने पर चिंता जताई गई है। अनुमान है कि करीब 1.5 लाख लोगों में मल्टीड्रग और रिफाम्पिसिन-रेजिस्टेंट टीबी पाई गई। यह पूरी दुनिया के कुल मामलों का 38 प्रतिशत से भी ज्यादा है। कई देशों ने आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के प्रति चिंता जताई है।

कहा है कि टीबी के मरीजों की जल्द पहचान और उनके स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए काम किया जाएगा। मरीजों की पहुंच आसान और हर संभव इलाज पर ध्यान दिया जाएगा। इस मामले में डब्ल्यूएचओ द्वारा सुझाई गई तेज जांच तकनीकों, जैसे मॉलिक्यूलर टेस्ट और डिजिटल तकनीक को अपनाया जाएगा। 

यह भी पढ़ें :  मध्य प्रदेश: इंटर्न डॉक्टरों पर लाठीचार्ज की होगी जांच, सरकारी अस्पतालों की ओपीडी प्रभावित

सामाजिक बाधाओं को भी दूर किया जाएगा

डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के प्रभारी अधिकारी डॉ. नीलेश बुद्धा ने टीबी केयर को ज्यादा लोगों पर केंद्रित बनाने का भी वादा किया है। टीबी से मुक्ति के लिए कई निर्णय खास हैं। इनमें ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी के लिए बेहतर क्वालिटी का इलाज मिल सकेगा। न्यूट्रिशन और कम्युनिटी-बेस्ड सपोर्ट के साथ ही लोगों को केयर पाने से रोकने वाली सामाजिक, फाइनेंशियल, ज्योग्राफिक का ताड़ निकाला जाएगा। साथ ही दूसरी रुकावटों को दूर करने के लिए पूरी कार्रवाई शामिल है। इसके सभी पहलुओं की ओर ध्यान दिया जा रहा है। जैसे टीबी से बचाव का इलाज मुहैया कराय जाएगा। संक्रमण की रोकथाम, कुपोषण, डायबिटीज और तंबाकू के सेवन को यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता है। 

कम हो सकती हैं टीबी से मौतें 

 क्षेत्रीय मॉडल कहता है कि टीबी के बेहतर इलाज और सरकारी-निजी भागीदारी, तेज जांच, लक्षित रोकथाम, सक्रिय जांच और टीबी वैक्सीन का इस्तेमाल आसान हो। इसलिए वैक्सीन लाने की तैयारी बहुत जरूरी हो गई है। हमने टीबी का इलाज सफल किया है। 2015 के बाद से यह साफ दिखाई दे रहा है। इलाज की पहुंच 85 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है। नए टीबी मामले भी करीब 16 प्रतिशत कम हुए हैं। मौतों में 23 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह भी कहा जा रहा है कि 2030 तक हम टीबी से मुक्त नहीं हो पाऐंगे।

बताया जा रहा है कि जिस परिवार में टीबी जैसी बीमारी का मरीज हो, वह आर्थिक रूप से कमजोर पड़ जाता है। लगभग 44 प्रतिशत टीबी प्रभावित परिवारों को भारी खर्च का सामना करना पड़ रहा है। दवा-प्रतिरोधी टीबी से पीड़ित परिवारों में यह आंकड़ा 80 प्रतिशत से भी ज्यादा है। कहा जा रहा है कि 2024 में टीबी से निपटने के लिए 300 में 90 करोड़ अमेरिकी डॉलर ही उपलब्ध थे। यदि इससे मुक्त होना है तो प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के साथ टीबी की जानकारी दिया जाए।डॉ. नीलेश बुद्ध ने कहा कि टीबी को खत्म करने के लिए हेल्थ सिस्टम सुधारना है। इसके साथ ही कम्युनिटी सिस्टम एवं क्षेत्रीय एकजुटता की जरूरत होगी। 

यह भी पढ़ें : पटियाला के मैराथन से दूर रहे नशेबाज, अवसर था गुरु रविदास महाराज के 650वें प्रकाश पर्व का

अन्य प्रमुख खबरें