मौसम में बदलाव के साथ बढ़े सर्दी-जुकाम और फ्लू के मामले, केजीएमयू के विशेषज्ञ डॉक्टर सूर्यकांत ने दी सतर्क रहने की सलाह
खबर सार :-
केजीएमयू के डॉ. सूर्यकांत से जानिए सामान्य सर्दी, फ्लू और स्वाइन फ्लू में अंतर, इसके लक्षण, जोखिम वाले वर्ग और बचाव के जरूरी उपाय।
खबर विस्तार : -
Lucknow : मौसम में हो रहे बदलाव के साथ ही इन दिनों सामान्य सर्दी, वायरल बुखार, फ्लू और स्वाइन फ्लू के मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। ऐसे हालात में आम जनता के लिए यह समझना बेहद जरूरी हो गया है कि इन बीमारियों के शुरुआती लक्षण क्या हैं और इनमें आपस में क्या बुनियादी अंतर है। सामान्य सर्दी आमतौर पर हल्की होती है, जबकि फ्लू अचानक तेज लक्षणों के साथ शुरू होकर कुछ मामलों में गंभीर रूप ले सकता है। स्वाइन फ्लू भी इन्फ्लूएंजा वायरस से होने वाला एक श्वसन संक्रमण है। सही समय पर पहचान, उचित चिकित्सीय परामर्श और पर्याप्त आराम से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।
यह महत्वपूर्ण जानकारी उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकांत ने दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एच1एन1 इन्फ्लूएंजा ए वायरस के संक्रमण को ही आमतौर पर स्वाइन फ्लू के नाम से जाना जाता है। साल 2009 में इस वायरस की वजह से पूरी दुनिया में एक बड़ा पेंडेमिक यानी वैश्विक महामारी की स्थिति बनी थी। इसके बाद से एच1एन1 लगातार एक मौसमी इन्फ्लूएंजा वायरस के तौर पर सक्रिय बना हुआ है। इन्फ्लूएंजा वायरस में समय-समय पर जेनेटिक बदलाव होते रहते हैं, जिससे संक्रमण और बीमारी की गंभीरता पर असर पड़ सकता है।
सर्दी, फ्लू और स्वाइन फ्लू में अंतर
डॉ. सूर्यकांत के अनुसार, साधारण सर्दी-जुकाम में बुखार अमूमन नहीं होता या फिर बहुत हल्का रहता है। इसमें सिरदर्द भी हल्का होता है और बदन दर्द न के बराबर या कभी-कभार ही महसूस होता है। कमजोरी आमतौर पर हल्की होती है, जबकि गले में खराश या जलन आम लक्षण है और सीने में हल्की बेचैनी हो सकती है। इसके विपरीत, मौसमी फ्लू में सामान्य सर्दी की तुलना में तेज बुखार आ सकता है। सिरदर्द काफी तेज हो सकता है और बदन दर्द आम बात है, जो कई बार गंभीर रूप भी ले सकता है। मरीज को अत्यधिक थकान और कमजोरी महसूस होती है, जो ठीक होने के बाद भी कुछ समय तक बनी रह सकती है। सीने में जकड़न और खांसी फ्लू के आम लक्षण हैं, जो अचानक और अधिक तीव्रता के साथ शुरू होते हैं।
स्वाइन फ्लू भी मौसमी फ्लू यानी इन्फ्लूएंजा ए संक्रमण का ही एक प्रकार है। इसके लक्षण भी मौसमी फ्लू से मिलते-जुलते हो सकते हैं, जिनमें तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, खांसी, गले में खराश और गंभीर कमजोरी शामिल हैं। कुछ मरीजों में ये लक्षण अधिक गंभीर हो सकते हैं, जिससे सांस लेने में कठिनाई, निमोनिया और अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि, केवल लक्षणों की गंभीरता के आधार पर यह निश्चित करना संभव नहीं होता कि यह सामान्य फ्लू है या स्वाइन फ्लू, इसलिए इसकी पुष्टि के लिए चिकित्सीय जांच की आवश्यकता पड़ सकती है।
जोखिम भरे वर्ग और संक्रमण फैलने के कारण
छोटे बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों, मधुमेह से पीड़ित लोगों, दिल फेफड़े या अन्य पुरानी बीमारियों से जूझ रहे रोगियों और कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों को गंभीर फ्लू का खतरा अधिक होता है। ऐसे लोगों को फ्लू के लक्षण दिखते ही बिना किसी देरी के डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
यह संक्रमण मुख्य रूप से तब फैलता है जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता, छींकता या बात करता है, जिससे हवा में श्वसन की बूंदें फैलती हैं। इसके अलावा संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से या संक्रमित हाथों से अपनी आंख, नाक और मुंह को छूने से भी संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए हाथों की स्वच्छता और खांसते-छींकते समय पूरी सावधानी बरतना बेहद जरूरी है।
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उपचार के दौरान सावधानियां और बचाव के उपाय
साधारण सर्दी या हल्के फ्लू के मामलों में पर्याप्त आराम, पानी और अन्य तरल पदार्थों का सेवन तथा हल्का व पचने वाला भोजन लेने की सलाह दी जाती है। किसी भी सामान्य वायरल संक्रमण में बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक दवाएं नहीं लेनी चाहिए। बुखार होने पर डॉक्टर के निर्देशानुसार पैरासिटामोल ली जा सकती है, जबकि सर्दी और खांसी के लिए कफ सिरप या एंटी-एलर्जिक दवाएं डॉक्टर की सलाह से ही उपयोग करनी चाहिए। ओसेल्टामिविर जैसी एंटीवायरल दवाएं विशेष रूप से गंभीर या उच्च जोखिम वाले मरीजों में डॉक्टर की देखरेख में ही दी जानी चाहिए।
स्वाइन फ्लू और मौसमी इन्फ्लूएंजा का सफर
चिकित्सकीय इतिहास के अनुसार वर्ष 2009 में एच1एन1 वायरस ने वैश्विक स्तर पर गंभीर रूप ले लिया था, जिसके बाद से यह लगातार एक मौसमी वायरस के रूप में समाज में सक्रिय है। वायरस में होने वाले लगातार जेनेटिक बदलावों के कारण यह हर साल नए रूप में सामने आ सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के संक्रमणों से निपटने के लिए पैनिक होने के बजाय जागरूकता सबसे बड़ा हथियार है। सही समय पर पहचान, डॉक्टर की सलाह और सुरक्षात्मक उपायों के पालन से अधिकांश मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं। मौसमी इन्फ्लूएंजा से बचाव के लिए टीकाकरण एक प्रभावी उपाय माना गया है, हालांकि यह संक्रमण को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं देता, लेकिन बीमारी की गंभीरता को काफी हद तक कम कर सकता है।
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