त्वचा की टीबी को न समझें साधारण बीमारी, किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के नए अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

खबर सार :-

केजीएमयू के नए शोध में यह खुलासा हुआ है कि स्किन टीबी के मरीजों में दवा-प्रतिरोधी (डीआर) टीबी का खतरा बढ़ रहा है। जानिए इसके लक्षण, आधुनिक जांच और इलाज के बारे में।
स्किन टीबी के मरीजों में बढ़ा डीआर-टीबी का खतरा, केजीएमयू शोध

खबर विस्तार : -

लखनऊ: क्षय रोग यानी टीबी को आम तौर पर केवल फेफड़ों से जुड़ी बीमारी माना जाता है, लेकिन यह संक्रमण शरीर के अन्य अंगों को भी अपनी चपेट में ले सकता है जिसमें त्वचा भी शामिल है। चिकित्सा भाषा में इसे एक्स्ट्रा-पल्मोनरी टीबी कहा जाता है। हाल ही में किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के त्वचा रोग विभाग द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि स्किन टीबी के मरीजों में दवा-प्रतिरोधी यानी डीआर-टीबी का खतरा लगातार बढ़ रहा है। यह शोध प्रतिष्ठित 'इंडियन जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी, वेनेरोलॉजी एंड लेप्रोलॉजी' में प्रकाशित हुआ है।

इस अध्ययन के दायरे में वर्ष 2019 से 2022 के बीच स्किन टीबी के कुल 54 मरीजों को शामिल किया गया जिनकी उम्र 20 से 40 वर्ष के बीच थी। इनमें से सात मरीजों के भीतर दवा-प्रतिरोधी टीबी की पुष्टि हुई और राहत की बात यह रही कि ये सभी मरीज एचआईवी निगेटिव थे। शोध के दौरान यह बात सामने आई कि छह मरीजों पर टीबी की सबसे असरदार दवा काम नहीं कर रही थी, जिसके बाद उन्हें बहु दवा-प्रतिरोधी (एमडीआर) टीबी की दवाएं दी गईं। इसके अलावा एक अन्य मरीज पर भी मुख्य टीबी-रोधी दवा का असर नहीं देखा गया, जिसका इलाज तय मानकों के आधार पर किया गया।

उपचार प्रक्रिया शुरू होने के लगभग एक महीने के भीतर ही इन सभी मरीजों की सेहत में सकारात्मक सुधार नजर आने लगा और कोर्स पूरा करने वाले मरीजों के त्वचा के घाव पूरी तरह ठीक हो गए। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन सात मरीजों में स्किन टीबी के चार अलग-अलग प्रकार मौजूद थे, जिनमें तीन को ल्यूपस वल्गैरिस, दो को स्क्रोफूलोडरमा, एक को ट्यूबरकुलर एब्सेस और एक अन्य मरीज को ट्यूबरकुलर चैंक्र की समस्या थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे मामलों में समय रहते उचित कदम न उठाए जाएं, तो स्थिति काफी जटिल हो सकती है।

आधुनिक जांच और विशेषज्ञों की राय

स्किन टीबी के मामलों में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि इस संक्रमण में बैक्टीरिया की संख्या सामान्य रूप से काफी कम पाई जाती है। इस वजह से पारंपरिक कल्चर जांच के जरिए टीबी के जीवाणु और दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का पता लगाना कठिन हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में आधुनिक मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक टेस्ट ही सबसे सटीक और बेहतर परिणाम देते हैं।

केजीएमयू के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के संस्थापक प्रभारी प्रो. सूर्यकांत का कहना है कि स्किन टीबी को केवल त्वचा तक सीमित मानकर दवा-प्रतिरोध की संभावना को नजरअंदाज करना गंभीर भूल साबित हो सकता है। बीमारी की सही स्थिति जानने के लिए जीन एक्सपर्ट, हिस्टोपैथोलॉजी, कल्चर और ड्रग ससेप्टिबिलिटी टेस्टिंग जैसी जांचें बहुत जरूरी हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि दवा प्रतिरोधी टीबी की जल्द पहचान रोग नियंत्रण की दिशा में एक अहम कदम है और इस जन-अभियान में समाज के हर वर्ग को अपनी सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए।

उधर, केजीएमयू की प्रोफेसर डॉ. पारुल वर्मा ने बताया कि दवा-प्रतिरोधी स्किन टीबी के लक्षण आम स्किन टीबी जैसे ही प्रतीत होते हैं, जिससे बाहरी तौर पर दोनों में अंतर करना मुश्किल होता है। इसलिए सीबीएनएएटी और कल्चर टेस्ट कराना आवश्यक हो जाता है। यदि ऐसे मरीजों को सामान्य टीबी की दवाएं दी जाएं तो कोई लाभ नहीं मिलता और संक्रमण दिमाग या छाती जैसे महत्वपूर्ण अंगों तक फैल सकता है। विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. स्वास्तिका सुविर्या ने स्पष्ट किया कि भारत में टीबी के जीवाणुओं में जेनेटिक बदलाव आने के कारण वे दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं। ऐसे में भविष्य में होल जीनोम सीक्वेंसिंग जैसी उन्नत तकनीक इन मामलों की सटीक पहचान में बहुत मददगार साबित होगी।

त्वचा के घाव और लंबी अवधि का इलाज

श्वसन रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योति बाजपेयी ने आम जनता को सचेत करते हुए कहा कि त्वचा पर दिखने वाले किसी भी घाव या अल्सर को मामूली समझकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। यदि किसी सामान्य इलाज के बाद भी घाव चार से छह हफ्ते के भीतर ठीक नहीं होता है, तो उसकी वजह स्किन टीबी भी हो सकती है। ऐसे मामलों में तुरंत इसकी विशेष जांच करानी चाहिए।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

चिकित्सकों के अनुसार, स्किन टीबी का इलाज सामान्य मामलों की तुलना में काफी लंबा चल सकता है और इसका कोर्स 9 से 18 महीने तक हो सकता है। यदि मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है तो यह संक्रमण दोबारा लौटकर आ सकता है। इसके अलावा, यदि कोई मरीज बीच में ही दवा का कोर्स अधूरा छोड़ देता है, तो उसमें डीआर-टीबी होने का जोखिम और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए बीमारी के शुरुआती चरण में ही इसकी पहचान करना और तय समय तक पूरा इलाज लेना ही बचाव का एकमात्र सुरक्षित उपाय है।

ये भी पढ़ें:- किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की अपील: H1N1 को लेकर घबराएं नहीं, यह सामान्य मौसमी इन्फ्लुएंजा है

अन्य प्रमुख खबरें