उत्पादन बढ़ाने के लिए बार-बार बोया एक ही फसल, श्रीअन्न के साथ कम हुई उर्वरा शक्ति

खबर सार :-

मिट्टी की ताकत ही उसकी उर्वरा शक्ति है। यह फसल चक्र के जरिए बनती रहती है। न रसायन की जरूरत और न ही अतिरिक्त खर्च करने की, लेकिन ज्यादा उत्पादन के लिए बारबार खाद के जरिए एक ही फसल बोते गए। इससे मिट्टी की ताकत कम हो गई। इसमें श्रीअन्न के उत्पादन पर प्रभाव पड़ा है। इन परिस्थितियों में मिट्टी को उसकी जरूरत वाली उर्वराशक्ति नहीं मिल सकी।
फसल चक्र अपनाना छोड़ा, इसलिए कम हुई मिट्टी की ताकत

खबर विस्तार : -

लखनऊ, किसान मिट्टी की उर्वरकता और उत्पादन को लेकर परेशान रहते हैं। लेकिन उन्होंने मिट्टी की उर्वरता के लिए ध्यान ही नहीं दिया हैं। अलग-अलग फसलों की पोषण जरूरतें अलग होती हैं। इससे मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है। फसल बदलने से कीटों और बीमारियों का जीवन चक्र टूट जाता है और उनका प्रकोप कम होता है। रसायनों का उपयोग भी खेतों में कम हो जाता है।

मटर, मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा है बढ़ाती

फसल चक्र खरपतवारों के विकास को रोकने में मदद करता है। अनावश्यक खेत की ऊर्जा खरपतवार में नहीं जाती है। इससे मिट्टी की सेहत सुधरती है और फसल का उत्पादन बढ़ता है। कुछ इन जैसे ही तरीके में खरीफ मौसम में सोयाबीन उगाने के बाद रबी मौसम में चना या गेहूं उगाने पर किसानों का ध्यान कम हुआ है। अनाज वाली फसलों के बीच में दलहन (फलीदार) फसलें जैसे मटर या मूंग उगाना, जो मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती हैं, यह अपने नियमित समय पर चक्रानुसार बोने से मिट्टी की सेहत में सुधार आता है। करीब 10 सालों में इस नियम पर तेजी से गिरावट आई है।

दरअसल फसल चक्र एक ही खेत में अलग-अलग मौसमों या वर्षों में सुनियोजित तरीके से अलग-अलग प्रकार की फसलें उगाने की कृषि पद्धति है। व्यवहारिक और ऐतिहासिक व्यवस्था में जाकर भी इसको समझने की जरूरत है। परदादा के समय या उनसे पहले घर में चना, आलू, टमाटर, उड़द, मूंग, अरहर, गेहूं, जौ, ज्वार, लोबिया, दोबिया, सन, ढैंचा, अलसी आदि फसलें उनके बीज और जरूरत भर की सब्जी या अनाज अपने ही खेत में उत्पादित होता रहा है। 

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हर मौसम में फसलों को बारी-बारी से बदल देते थे

 फसल चक्र का ही कारण रहा है कि अपने रोपण विधि में वह तीन से दस वर्षों की अवधि में हर मौसम में फसलों को बारी-बारी से बदल देते थे। चार साल की फसल चक्र योजना बनाई जाती थी। इसकी शुरूआत दलहन से शुरू होकर जड़ वाली सब्जियों, फलों और पत्तेदार सब्जियों की ओर बढ़ जाती थी। इससे मिट्टी में सूक्ष्मजीवों का स्तर बेहतर बनता था। वर्तमान में इसके मायने बदल दिए और फसल चक्र केवल अंधाधुंध फसलें चुनकर बोने तक सीमित हो गया है।

इसमें गहन कौशल और मिट्टी में नाइट्रोजन के स्तर का महत्वपूर्ण संतुलन शामिल भुला दिया गया।  मिट्टी की ताकत ही उसकी उर्वरा शक्ति है। यह फसल चक्र के जरिए बनती रहती है। न रसायन की जरूरत और न ही अतिरिक्त खर्च करने की, लेकिन ज्यादा उत्पादन के लिए बारबार खाद के जरिए एक ही फसल बोते गए। इससे मिट्टी की ताकत कम हो गई। इसमें श्रीअन्न के उत्पादन पर प्रभाव पड़ा है। इन परिस्थितियों में मिट्टी को उसकी जरूरत वाली उर्वराशक्ति नहीं मिल सकी। 

चराने के लिए न भेड़ हैं और न ही बकरियां

फसल चक्र में पशुओं का भी बड़ा योगदान रहता था। इनमें ज्यादा भेड़ और बकरियां चराने के दौरान  मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है। मिट्टी में पानी को सोखने की क्षमता भी बढ़ती है। यह प्रकिया पौधों और फसलों के विकास के लिए फायदेमंद साबित होता है। प्राकृतिक चीजों को उनके अपने तरीके से ही रहने की आदत होती है। इसलिए मिर्च और टमाटर मिट्टी से भरपूर मात्रा में नाइट्रोजन ग्रहण करते हैं। इनके उचित भोजन की व्यवस्था के लिए ही किसान अगले मौसम में सोयाबीन जैसी नाइट्रोजन स्थिरीकरण वाली फसल लगाते रहे हैं। एक खेत में पहली बार बोई गई फसल को कई वर्षों तक उसी खेत में नहीं बोया जाता है। 

मिट्टी में पोटैशियम का स्तर बढ़ा सकती फसलें

फसल चक्र से मिट्टी में जड़ों को नेचर के अनुसार बदलाव करने में आराम मिलता है। मिट्टी की सूक्ष्मजीव विविधता बढ़ाने के लिए जरूरी होता है। इसमें किसान को चाहिए कि वह नाइट्रोजन और कार्बन की अधिक मात्रा वाली फसलों को विपरीत अनुपात वाली फसलों के साथ बारी-बारी से बोएं। मटर और चने की फसल से अगले मौसम में गेहूं की पैदावार अधिक हो सकती है।

ऐसा कई शोधों में पता चला है। मिट्टी में खोए पोषक तत्वों की भरपाई और उपजाऊ बनाने के लिए 15 साल पहले या 20 साल पहले के ही तौरतरीके अनाने होंगे। पारंपरिक फसलों में हमने कई फसलों को दूर कर दिया। इनमें मक्का भी शामिल है। इसे कहीं और से मंगाया जाने लगा है। जबकि कुछ फसलें मिट्टी में पोटेशियम का स्तर बढ़ा सकती हैं, जिसका उपयोग मटर या मक्का जैसी फसलें कर सकती हैं।

फसल चक्र अपनाने में दिलचस्पी कम होने का नतीजा खराब निकल रहा है। मृदा संरचना में सुधार और अपरदन में कमी लाकर इस समस्या से निपटने में मदद मिल सकती है। शोध से पता चलता है कि 60 प्रतिशत भाग नदियों, झीलों और नालों में बह जाता है। मिट्टी को सिंचाई के लिए दिए जाने वाला जल भी महत्व रखता है। तालाबों, नदियों और झीलों का जल भी महत्वपूर्ण है। इसमें अलग-अलग पोषक तत्व होते हैं। 

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