खूंटी के गांवों में रोजगार का नया जरिया बनी गेंदा फूल की खेती, रांची से लेकर गुमला तक महक रही खुशबू
खबर सार :-
खूंटी के गांवों में लोग अब अफीम की खेती और पलायन छोड़कर गेंदा फूलों की खेती को रोजगार का नया साधन बना रहे हैं। यहां के फूलों की खुशबू झारखंड के कई जिलों के बाजारों तक पहुंच रही है।
खबर विस्तार : -
खूंटी: झारखंड के खूंटी जिले के गांवों में खेतों में खिले केसरिया रंग के गेंदे के फूल न केवल प्राकृतिक सुंदरता बढ़ा रहे हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक नया अध्याय भी लिख रहे हैं। कभी रोजगार के अवसरों की कमी और पलायन की समस्या से जूझने वाले इन गांवों में गेंदे की खेती किसानों के लिए आय का एक नया जरिया बन गई है। इन फूलों की महक अब खूंटी से बाहर निकलकर झारखंड के कई अन्य जिलों—जैसे रांची, लोहरदगा और गुमला के बाजारों तक पहुंच रही है।
दशहरा के बाद अब दिवाली और छठ जैसे बड़े त्योहारों की तैयारियों के चलते गेंदे के फूलों की मांग तेजी से बढ़ रही है। घरों, मंदिरों, पूजा स्थलों, संस्थानों और सार्वजनिक कार्यक्रमों की सजावट में इन फूलों का विशेष महत्व है। त्योहारों के मौसम में बढ़ी हुई यह मांग खूंटी के किसानों के लिए बेहतर कमाई के अवसर लेकर आई है। खास बात यह है कि सीमित जमीन और कम संसाधनों के बावजूद, किसान इस खेती के जरिए अतिरिक्त आय अर्जित करने में सफल हो रहे हैं।
अफीम की खेती और पलायन रोकने के लिए फूलों की खेती
खूंटी जिले में आजीविका के एक विकल्प के तौर पर गेंदे की खेती को बढ़ावा देने की पहल लगभग 13 साल पहले शुरू हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासी बहुल गांवों में अफीम की अवैध खेती पर निर्भरता को कम करना और रोजगार की तलाश में होने वाले पलायन पर रोक लगाना था। 'प्रदान' (PRADAN) नामक संस्था ने किसानों को गेंदे की खेती के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि सीमित कृषि संसाधनों और रोजगार के अभाव से जूझ रहे ग्रामीण परिवारों को उनकी अपनी जमीन पर ही सम्मानजनक आजीविका मिल सके। धीरे-धीरे, यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने का एक बड़ा जरिया बन गई है। 'प्रदान' के साथ-साथ, झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) और कई अन्य संस्थाएं भी इस प्रयास में सहयोग कर रही हैं। दूर-दराज के गांवों के किसानों को 'खूंटी महिला कृषि बागवानी स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड' के माध्यम से इस खेती से जोड़ा जा रहा है। गेंदे की खेती किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है, क्योंकि यह यहां की स्थानीय मिट्टी और जलवायु के लिए बहुत अनुकूल है।
400 एकड़ में 15 लाख पौधे, 1500 परिवारों को जोड़ने का लक्ष्य
इस साल, जिले में लगभग 1,500 किसान परिवारों को गेंदे की खेती से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इस पहल के तहत लगभग 400 एकड़ जमीन पर खेती की गई है, जिसमें करीब 15 लाख पौधे लगाए गए हैं। अब फूल खिलने लगे हैं और किसान इनकी कटाई करने, इनसे मालाएं बनाने और इन्हें बाजार तक पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं। खूंटी से रांची, लोहरदगा और गुमला जैसे जिलों में फूलों की आपूर्ति होने से स्थानीय किसानों को एक बड़ा बाजार मिल रहा है। इससे न केवल कृषि गतिविधियों का दायरा बढ़ता है, बल्कि ग्रामीण उत्पादों को जिले के बाहर भी पहचान मिलती है। किसानों के लिए एक बड़ा फायदा यह है कि साल भर अलग-अलग मौकों पर फूलों की मांग बनी रहती है; हालांकि, त्योहारों और शादी-ब्याह के सीजन में यह मांग काफी बढ़ जाती है।
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₹25,000 से ₹30,000 तक की संभावित कमाई
गेंदे की खेती छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी एक मुनाफे वाला विकल्प बनकर उभर रही है। खूंटी-तोरपा सड़क के किनारे फूल और मालाएं बेचने वाले किसान जोंशन भेंगरा, सुनील भेंगरा और प्रमिला तिर्की बताते हैं कि इस तरह की खेती से छोटी जमीन पर भी अच्छी कमाई हो सकती है। उनके अनुसार, 10 डिसमिल जमीन पर गेंदे की खेती करने से लगभग ₹25,000 से ₹30,000 तक की कमाई हो सकती है। हालांकि, असल कमाई कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे कि पैदावार कितनी हुई, मौसम कैसा रहा, खेती में कितना खर्च आया और बाजार में उस समय क्या भाव चल रहा है। किसानों का कहना है कि दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ जैसे त्योहारों के साथ-साथ शादियों और अन्य धार्मिक या सामाजिक आयोजनों के दौरान फूलों की मांग काफी बढ़ जाती है। ऐसे मौकों पर किसानों को अपनी उपज के लिए बेहतर दाम मिल सकते हैं। फूलों की बिक्री से होने वाली कमाई छोटे किसानों को घर के खर्च चलाने और अन्य आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने में मदद कर सकती है।
ग्रामीण परिवारों के लिए आजीविका का नया आधार
गेंदे की खेती का असर सिर्फ किसानों की कमाई तक ही सीमित नहीं है; यह ग्रामीण परिवारों, खासकर महिलाओं के लिए आजीविका के नए अवसर पैदा करता है। परिवार के सदस्य फूलों की देखभाल, कटाई, छंटाई, माला बनाने और बिक्री संभालने जैसे कामों में हिस्सा लेते हैं। इससे गांवों में ही रोज़गार के मौके बनते हैं और खेती के प्रति लोगों की रुचि बढ़ती है। खूंटी में व्यावसायिक स्तर पर गेंदे की खेती को बढ़ावा देने वाली संस्था 'प्रदान' (Pradan) के स्टेट हेड, प्रेम शंकर बताते हैं कि इस पहल ने ग्रामीण इलाकों में खेती को लेकर एक नई उम्मीद जगाई है। जिन इलाकों में कभी अफीम की अवैध खेती और रोजगार की तलाश में पलायन जैसी समस्याएं थीं, वहां के किसान अब अपनी जमीन पर फूल उगाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहे हैं। यह पहल महिलाओं और ग्रामीण परिवारों की आजीविका के लिए एक नया आधार भी तैयार कर रही है।
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