फ्लोरीकल्चर मिशन का डोडा की महिलाओं ने लिया लाभ, 35 वाला फूल 50 में बेचा

खबर सार :-

जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले की रहने वाली महिलाएं बंजर भूमि में फूलों की खेती कर अच्छी कमाई कर रही हैं। उनको अब उन्नतशील पौधों की भी जानकारी होने का भी लाभ मिल रहा है।
बंजर भूमि में कर रहीं फूलों की खेती, कश्मीरी महिलाएं कृषि में हुईं दक्ष

खबर विस्तार : -

नई दिल्ली/डोडा, फेस्टिव सीजन नवरात्रि में महिलाओं ने अच्छी कमाई की है। यह महिलाएं जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले की रहने वाली हैं। इनको त्योहारों, पर्वाें और उत्सवों में अच्छी कमाई मिल रही है। नवरात्र में इन्होंने पैंतीस रूपये किलो बिकने वाले फूल को 60 रूपये किलो में बेचा है। खास बात यह है कि यह फ्लोरीकल्चर कर विकास इन्होंने बंजर भूमि में किया है।

महंगाई में वह आर्थिक रूप से मजबूत हो रहीं

महिलाएं पुरूषों से कम नहीं रह सकती हैं। वह आज हर काम कर सकती हैं। कभी खेती में सहयोग करती थीे, आज उन्नतशील खेती कर रही हैं। इस महंगाई में वह आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की फ्लोरीकल्चर मिशन की पहल जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में नतीजा दिखाने लगी है। यहां की महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत माध्यम उदाहरण देखा जा रहा है। भद्रवाह के सार्तिंगल गांव और अथखर घाटी क्षेत्र में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाएं अब किसी पर निर्भर नहीं हैं। वह जनबल भी मजबूत हैं। इनके साथ स्वयं सहायता समूह की महिलाएं काम कर रही हैें।

व्यावसायिक फूल खेती के जरिए कृषि क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। इनकी आय भी अब इस काम अच्छी होने लगी है। इन महिलाओं में परिवर्तन  सीएसआईआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन के सहयोग से आया है। इनको बंजर भूमि पर गेंदे की खेती का प्रशिक्षण दिया गया। इसका नेतृत्व एनआरएलएम की क्लस्टर कोऑर्डिनेटर नादिया फारूक कर रही हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की फ्लोरीकल्चर मिशन योजना काफी दिनों से यहां चलाई जा रही है। इसके तहत महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण पौधे, आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया।

आईआईआईएम के रूरल ऑफिसर ने प्रोत्साहित किया

दरअसल में नादिया के नेतृत्व में उनके क्लस्टर की पांच महिलाओं ने परीक्षण लिया और फिर उन्होंने बंजर भूमि पर गेंदे के पौधे लगाए। पहली बार में ही इनका यह प्रयोग बेहद सफल साबित हुआ। अब इनका तैयार किया फूल वहीं बिक जाता है। इसमें पारंपरिक फसलों से लाभ भी ज्यादा है। साथ ही जमीन भी बंजर वाली लगाई जा रही है। यह महिलाएं अन्य फसलों पर भी ध्यान दे रही थीं, लेकिन इसको उसमें ज्यादा फायदा नहीं हुआ। इन्होंने मक्का की भी खेती की। इसकी जानकारी भी जुटाई। गेंदा इनकी पसंद तब बना, जबकि आईआईआईएम के रूरल ऑफिसर ने प्रोत्साहित किया। उनका मार्गदर्शन सरकार की ओर से था।

उन्होंने बताया कि इस फेस्टिव सीजन नवरात्रि में फूलों से अच्छी कमाई की। गेंदा 30-35 रुपए प्रति किलो बिकता रहता हैं। फेस्टिव सीजन में इसकी डिमांड ज्यादा हो जाती है। इसलिए यह 60 रुपए प्रति किलो तक भी बिका। इस क्षेत्र में सरकार की योजना उम्मीद पिछले आठ वर्षों लोगों को जानकारियां दे रही है। कभी एक छोटे कारोबार से अपनी उद्यमशील यात्रा शुरू की आज मुकाम पर है। इसके साथ कई लोग दूसरों को जागरूक कर रही हैं। अपनी पारंपरिक खेती के साथ गेंदे की भी खेती करें। यहां की महिला किसान स्थानीय हैं। यह महिला सशक्तिकरण की प्रेरणादायक उदाहरण भी बन रही हैं।

परिवार को अब आर्थिक दिक्कतें नहीं उठानी पड़तीं

इन लोगों के साथ ऐसी भी महिलाएं हैं, जिन्होंने बाजार में 3 लाख रुपए से अधिक मूल्य के गेंदे के फूल बेच कर औरों को दक्ष करने की कोशिश की है। इस कारोबार से उनके परिवार को अब आर्थिक दिक्कतें नहीं उठानी पड़ती हैं। इनके लिए फ्लोरीकल्चर विभाग की ओर से बीज भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं। प्रशिक्षण और नियमित जागरूकता कार्यक्रमों में पहुंच कर यह लोग जानकारी भी हासिल करती हैं। 

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