खेती करना सीखिए, व्यर्थ बहाने छोड़िये, बिहार के सहरसा में किसान ने लिया दूना लाभ

खबर सार :-

जिला सहरसा के कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यहां किसानों ने आमदनी के अच्छे रास्तों में गन्ने के साथ आलू और हल्दी बोया है।
बिहार के सहरसा की अनोखी खेती: गन्ने के साथ आलू और हल्दी का समागम

खबर विस्तार : -

सहरसा, किसान केवल बीज, पानी और खाद के साथ जोताई के बारे में ही सुनना और देखना पसंद करने लगे हैं। उनको यदि लाभ नहीं मिल रहा है तो फिर वह अनोखी खेती में धन क्यों खपा रहे हैं। उनके खेत भी हरियाली से गुलजार हेैं। वह कहते हैं की खेती करने से किसानों की कमाई बढ़ी है। इससे उन्हें एक ही खेत से दोहरी फसल का लाभ भी मिला है। किसानों का अपना दिया तर्क कि गन्ने की खेती के दायरे को 20,000-25,000 हेक्टेयर तक लक्ष्य को बढ़ाना है।

जिला सहरसा कोसी प्रभावित रहता है। इसके कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यहां किसान शरदकालीन गन्ने की बुवाई पर सारा ध्यान केंद्रित कर चुके हैं। इसके लिए नर्सरी तैयार जोरशोर से चल रही हैं। 

गन्ना विकास विभाग ने शुरू किया इंटरक्रॉपिंग योजना 

गन्ना विकास विभाग ने इंटरक्रॉपिंग (सह-फसली खेती) योजना शुरू की है। इसको एक महत्वाकांक्षी योजना बताया जा रहा है। इसके तहत गन्ने के साथ आलू, हल्दी और अदरक भी उगाया जा सकता है। यह उपज को भी बढ़ाने में मदद करेगा। इस पहल का मुख्य उद्देश्य स्थानीय किसानों की लागत को कम करना है। जब लागत कम हो जाएगी, स्वतः लाभ बढ़ जाएगा। किसान की कमाई को दोगुना करना है।

इससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके। इस योजना के तहत, किसानों को रियायती दरों पर बीज और गन्ने की खेती के लिए आर्थिक सहायता दी जाएगी। योजना में बदलाव का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। 20,000-25,000 हेक्टेयर तक गन्ने की खेती का दायरा बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। गन्ने के उत्पादन को बढ़ाने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। उम्मीद है कि इस क्षेत्र में कोई नई चीनी मिल लगाई जाए। ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं। 

गन्ने की पंक्तियों के बीच लगभग 5 फीट चौड़ी दूरी हो

गन्ने के साथ आलू और हल्दी की सह-फसली (इंटरक्रॉपिंग) खेती करने से किसान एक ही खेत से कम लागत में दोगुना मुनाफा कमा सकते हैं। गन्ने के साथ हल्दी और आलू की खेती का तरीका बेहद सरल है। कतार की दूरी का ध्यान रखा जाता है। गन्ने की पंक्तियों के बीच लगभग 5 फीट (60 इंच) की चौड़ी दूरी रखी जाती है। सह-फसल की बुवाईः इस 5 फीट की खाली जगह में आलू या हल्दी (अथवा दोनों क्रमबद्ध तरीके से) की कतारें लगाई जाती हैं।

गन्ने की चौड़ी कतारों के बीच खाली पड़ी जमीन का पूरा उपयोग होता है। हल्दी की गंध और मौजूदगी से गन्ने की फसल में कीटों और रोगों का प्रकोप काफी कम हो जाता है, जिससे कीटनाशकों का खर्च बचता है। यह मॉडल उत्तर प्रदेश (लखीमपुर खीरी) और बिहार (सहरसा) जैसे क्षेत्रों में किसानों के बीच काफी सफल साबित हुआ है। शरद कालीन गन्ने की कतारों के बीच खाली पड़ी जगह का इस्तेमाल आलू, अदरक और हल्दी जैसी कम समय में तैयार होने वाली फसलों के लिए किया जाएगा।

जो लोग ऐसी खेती कर रहे हैं, वह लाभ भी उठा रहे

किसानों को लगातार इंटरक्रॉपिंग (सह-फसल खेती) के लिए प्रोत्साहित और प्रशिक्षित किया जा रहा है। जिसमें गन्ने के साथ आलू, अदरक और हल्दी जैसी फसलें उगाई जाती हैं। इस तकनीक को अपनाने से क्षेत्र के किसानों को काफी आर्थिक लाभ होगा और उनकी आय में वृद्धि होगी। शुभम कुमार, सहायक निदेशक, गन्ना विकास विभाग, सहरसा कहते हैं कि एक साथ तीनों फसलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जो लोग ऐसी खेती कर रहे हैं, वह लाभ भी उठा रहे हैं। 

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