भागलपुरी परवल के बिना उत्सव अधूरा, बरसात के बाद किसानों की चमक लौटी
खबर सार :-
भागलपुर के दियारा क्षेत्र में परवल की खेती पर किसानों का भरोसा इतरा कर बोलता है। कोई ऐसा उत्सव या समारोह नहीं होता, जिसमें यहां के परवल की पूछ नहीं होती है। बरसात के दिन अब जाने के बाद किसानों की व्यस्तता शूरू हो गई है। उनका ध्यान परवल की खेती की ओर बढ़ने लगा है।
खबर विस्तार : -
भागलपुर : गंगा और कोसी की बाढ़ तथा भीषण कटाव का सामना भले ही कुछ दिनों के लिए किया गया हो, लेकिन इसमें कई महीनों की खुशियां चकनाचूर हो जाती है। जितने दिन बारिश होती है या जितने दिन ज्यादा बारिश होती है, उतने दिन दियारा क्षेत्र की खेती पीछे हो जाती है। अब बाढ खत्म होते ही दियारा क्षेत्र के किसानों के चेहरों पर उम्मीद लौटने लगी है। यहां नदियों के किनारे की मिट्टी बेहद उपजाऊ मानी जाती है।
इसलिए उसमें पैदावार भी अच्छी होती है। नवरात्रि के बाद से दो नदियों की मुख्य धारा अपने निर्धारित मार्ग की ओर लौटने लगी हैं। यहां की परवल की खेती देश भर में प्रसिद्ध है। अपने बेमिसाल स्वाद के लिए भागलपुरी परवल की खेती ने एक बार फिर तटीय इलाकों में दस्तक दे दी है। दियारा की बेहद जरखेज और नमी से भरपूर मिट्टी में परवल की लताएं लगाने का प्रचलन यहां ज्यादा है। बीज बोकर परवल की खेती इस क्षेत्र में नहीं की जाती है।
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दियारा क्षेत्र में केवल परवल ही फेमस नहीं
किसान समय का मोल समझते हुए मजदूरों की बड़ी टोलियां लेकर खेतों को दुरुस्त करने में जुट गए हैं। अभी से यहां पर खेती के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं और आने वाले दिनों में गर्मी के समय जब सहालग शुरू होगी, तब लोगों के बीच परवल पहुंचने लगेगा। माना जाता है कि बाढ़ के बाद जमीन में बची प्राकृतिक नमी और रेतीली दोमट मिट्टी परवल की शुरुआती बढ़वार के लिए अमृत है। यद्यपि दियारा क्षेत्र में केवल परवल ही फेमस नहीं है। यहां खीरा, ककड़ी के अलावा भी कई फसली होती हैं जो सहालग के मौसम में काम आती है। किसान की इन फसलों को दूर-दूर से खरीदने के लिए लोग आते हैं।
होटल, गेस्ट हाउस और मंडप आदि के समारोह व उत्सव तब तक पूरे नहीं होते हैं, जब तक इस क्षेत्र के परवल को भोजन में परोसा नहीं जाता है। इसीलिए कई लोग संगठित होकर खेतों में काम करते हैं। एक दूसरे के वैचारिक आदान-प्रदान के जरिए आने वाली दिक्कतें पहले से ही दूर कर ली जाती हैं। जैसे खेतों में पानी का जमाव फसल को पूरी तरह से बर्बाद कर देता है। जलभराव न हो और जलनिकासी की उत्तम व्यवस्था हो। चूंकि इस खेती में बीज के बजाय पुरानी लताओं के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए किसान काफी पहले से ही उत्तमरोपण सामग्री जुटाने में लग जाते हैं।
दियारा भूमि का विस्तार से ब्लॉक में है। भागलपुर जिले में रिमोट सेंसिंग और जीआईएस तकनीक से अध्ययन भी किया गया है। लगभग 1073.04 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल को जिले का दियारा मानते है। पुरानी दियारा भूमि करीब 203.26 वर्ग किलोमीटर में फैली है। नई दियारा भूमि विशाल क्षेत्र लगभग 869.78 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। कई ब्लॉकों से मिलकर बनी दियारा की भूमि बारिश के दौरान बालू और मिट्टी बहाकर लाती है। दियारा की भूमि में जिस स्थान पर परवल जाता है, उसका कोई स्थाई तो नहीं होता है। यद्यपि यह क्षेत्र परिवार के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन बारिश और कटान के कारण स्थान बदलते रहते हैं। कोई निश्चित सरकारी आंकड़ा नहीं है।
बारिश और कटान के कारण स्थान बदलते रहते
यह पारंपरिक क्षेत्र जरूर माना जाता है। नदी की प्रकृति के अनुसार फसलों का रकबा प्रतिवर्ष बदलता रहता है। इन तमाम भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद गंगा और कोसी के तटीय क्षेत्रों में परवल की खेती लंबे समय से लाखों किसानों की आजीविका का मुख्य सहारा रही है। एक बात प्रचलन में जरूर कही जाती है कि दियारा की जमीन में कटान ज्यादा होता है। इसलिए किसानों को इसमें रिस्क भी उठाना पड़ता है। कई बार जोखिम के कारण लोगों की जान भी जा चुकी है। भागलपुर के साथ-साथ बिहार के अन्य प्रमुख तटीय जिलों जैसे कटिहार, बेगूसराय, पटना और वैशाली के दियारा इलाकों में भी परवल की बंपर खेती की जाती है।
यहां की कोसी नदी की धाराएं बदलती रहती हैं। इसके कारण सहरसा और माधोपुर जैसी स्थान में भी खेती के प्रभाव पर असर पड़ता है। उनकी मिट्टी बदल जाती है। स्थान भी बदल जाता है। यही कारण है की कठिनाई के दौर से किसानों को गुजरना पड़ता है। आने वाले दिनों में रबूज, खरबूज, ककड़ी, खीरा, कद्दू, करेला, मकई और कलाई (उड़द) जैसी अन्य नकदी और मौसमी फसलें भी बड़े पैमाने पर लहलहाती दिखेंगी। किसानों का कहना है कि यदि मौसम ने साथ दिया और समय पर सिंचाई व लत्तियों की देखरेख हो गई, तो इस बार भागलपुरी परवल देश की मंडियों में समय से पहुंचकर किसानों की झोली खुशियों से भर देगा।
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