भागलपुर का कदवा दियारा बना गरुड़ का सुरक्षित ठिकाना, किसान कर रहे देखभाल
खबर सार :-
कभी गरुड़ पक्षी गांव-गांव दिखाई पड़ा करते थे। लेकिन इनकी संख्या कम होती जा रही है। जबकि भागलपुर के नदवा दियारा में इनकी संख्या बढ़ रही है।
खबर विस्तार : -
भागलपुर, रेशम और उपजाऊ मिट्टी के लिए दुनिया भर में भागलपुर मशहूर है। इस मिट्टी की और भी खासियत है। भागलपुर का नवगछिया अनुमंडल के तहत आने वाला कदवा दियारा इलाका गरुड़ या हरगिला को पसंद आ रहा है। इसे संकटग्रस्त प्रजाति के ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क के रूप में भी जानते हैं। इनके लिए यह इलाका एक बेहद महत्वपूर्ण और सुरक्षित आश्रय स्थल के रूप में उभरा है। कदवा दियारा इलाके में इनकी संख्या सात सौ से अधिक बताई जा रही है।
यह भी पढ़ें: कहीं भूखे न रह जाएं हाथी और बाघ: छिन सकता है वन्य जीवों के रहने का ठिकाना
किसानों ने पक्षियों को आवश्यक माना
यहां आकर यह काफी दिनों से चहलकदमी कर रहे हैं। यह बेहद कम संख्या में हैं। पूरी दुनिया में यह कम संख्या के कारण उंगलियों पर गिने जाने लगे हैं। इन दुर्लभ पक्षियों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब इसी क्षेत्र में रहने लगा है। इनके बारे में कहा गया है कि यह विश्वभर की कुल आबादी में से 700 से अधिक गरुड़ पक्षी अकेले कदवा दियारा इलाके में रह रहे हैं। यह इलाका छोड़कर कहीं नहीं जाते हैं। इस प्रजाति के लिए भागलपुर पूरे एशिया का एकमात्र संरक्षण केंद्र है।
असम के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा प्रजनन स्थल यही बन कर उभरा है। फिलहाल तो माना जाता रहा है कि पक्षी खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन कदवा दियारा में ऐसा नहीं है। यह पक्षी किसानों के लिए सहायक बन रहे हैं। स्थानीय किसानों ने इन पक्षियों को कृषि में अपने लिए आवश्यक माना है। यह वफादार साथी के रूप में रह रहे हैं। ये गरुड़ किसानों के खेतों के लिए प्राकृतिक रक्षक (बायो-शील्ड) की प्रक्रिया निभा रहे हैं। खेतों में फसलों को बर्बाद करने वाले हानिकारक कीटों और चूहों को गरुड़ चबा जाते हैं।
मक्का की खेती में बने हुए हैं पहरेदार
किसानों को बड़ा फायदा यहां के बोए जाने वाले मक्का में मिल रहा है। मक्का उत्पादक किसानों को एक पहरेदार मिला है। किसानों ने बताया कि पहले उन्हें अपनी मक्का की फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए बड़ा अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता था। इसकी रक्षा में हर सात दिन में महंगे और हानिकारक कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता था। अब यह परेशानी दूर हो गई। बेवजह पैसा नहीं जाता है। जब से गरुड़ों का बसेरा इन खेतों में बढ़ा है, तब से कीटनाशकों के छिड़काव की जरूरत खत्म हो गई है।
ग्रामीणों की कोशिश इनको बसाने की
यह पक्षी पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं। साथ ही किसानों की जेब के लिए भी एक बड़ी राहत भी हैं। स्थानीय निवासी प्रिंस यादव ने इन पक्षियों के बारे में महत्वपूर्ण बातेें बताईं। ये पक्षी यहां कई वर्षों से रह रहे हैं। जब यहां आए तो सिर्फ दो पीपल के पेड़ पर घोंसला बनाकर रहने लगे थे। 2006 के बाद से ग्रामीणों ने इनका सहयोग किया। उसके बाद से इनकी आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि होने लगी। एक दिलचस्प बात यह भी है कि कुछ ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास उनके पंख को लेकर है। वह बताते हैं कि जब गरुड़ अपने पंख फड़फड़ाते हैं, तो उससे हवा उत्पन्न होती है। इसमें औषधीय गुण होते हैं। यह बीमारियों को दूर रखते हैं।
देवताओं की तरह पूजते हैं लोग
कदवा दियारा के लोग गरुड़ को एक पक्षी मानते हैं। इनको देवताओं की तरह पूजते भी हैं। गरुड़ मुख्य रूप से मछली खाना पसंद करते हैं। इनको दलदली और जलीय क्षेत्रों में रहना ज्यादा पसंद है। यह पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने में भी मददगार बन रहे हैं। इनका संरक्षण ग्रामीण ही करते हैं। जब कभी कोई छोटा पंक्षी पेड़ से नीचे गिर जाता है, तो ग्रामीण उसे बचाते हैं। वह वन विभाग और विशेषज्ञों की देखरेख में उसके बड़े होने तक पूरी सुरक्षा करते हैं।
निगरानी की हमेशा रहती है जरूरत
स्थानीय पर्यावरणविद एवं पक्षीविद दीपक कुमार “झुन्नू” मानते हैं कि “कदवा, नवगछिया के बड़ा गरुड़ (हरगिला) हमारी गंगा तटीय जैव-विविधता और प्राकृतिक विरासत की पहचान हैं। इनके संरक्षण के लिए हर व्यक्ति को साथ आना होगा। इनके घोंसलों और प्रजनन स्थलों की नियमित निगरानी करनी होगी। साथ ही ग्रामीणों, महिलाओं, युवाओं और विद्यालयों का भी योगदान होना चाहिए। उन्होंने बताया कि कदवा में बड़ा गरुड़ संरक्षण स्थल के लिए एक स्थायी जन-अभियान का रूप दिया जाना चाहिए। इससे हरगिला संरक्षण की एक मजबूत मिसाल के रूप में क्षेत्र का नाम सबसे पहले आया करेगा।
यह भी पढ़ें: कठोर हो रही है मिट्टी तो कर लें सुधार, दलहन फसलें हैं मिट्टी का उपचार
अन्य प्रमुख खबरें
-
lucknow : खेती में तलाश रहे अपार संभावनाएं, खेतों में प्रयोग करेंगे वैज्ञानिक
2026-11-03
-
ग्वालियर में बनेगा आलू टिश्यू कल्चर एवं एरोपोनिक लैब, स्थापना की अड़चनें कर लीं दूर
2026-11-03
-
बंजर भूमि में कर रहीं फूलों की खेती, कश्मीरी महिलाएं कृषि में हुईं दक्ष
2026-11-01
-
दियारा के किसानों को मिली उम्मीद, भागलपुर में शुरू की परवल की तैयारी
2026-11-01
-
गुना में लोकप्रिय हो रही गुलाब की खेती, 8 लाख फूल उत्पादन की तैयारी
2026-10-30
-
UP के कई जिलों में बारिश के आसार, दिल्ली-एनसीआर में yellow-alert
2026-10-30
-
दो गुना आमदनी के लिए जूझ रहा किसान, सरकार ने दिया हर मदद का भरोसा
2026-10-29
-
Helicopter से पकड़े जा रहे काले हिरन, मध्य प्रदेश सरकार ने बुलाई अफ्रीका से टीम
2026-10-28
-
वैज्ञानिक उन्नतशील किस्मों के बीजों पर करें शोध: सूर्य प्रताप शाही
2026-10-27
-
खेत बचाओ अभियान बन रहा जन-आंदोलन, पटना में सफलता के लिए भरी हुंकार
2026-10-26
-
चक्रवात का असरः छत्तीसगढ़ में 28-29 अक्टूबर को भारी बारिश के आसार
2026-10-26
-
विदेशों में बिक रहे बाजरा के बिस्कुट, ऑनलाइन मिल रहे ऑर्डर
2026-10-24
-
भोपाल में हुआ राष्ट्रीय फिशरीज इन्वेस्टर्स एंड एक्सपोर्टर्स कॉन्क्लेव, किसानों की आय पर किया मंथन
2026-10-23
-
बिहार के सहरसा की अनोखी खेती: गन्ने के साथ आलू और हल्दी का समागम
2026-10-23
-
कृषि क्षेत्र में बनाई जा रही हैं ठोस रणनीतियां, वैज्ञानिक और अधिकारी निकालेंगे हल
2026-10-22