कहीं भूखे न रह जाएं हाथी और बाघ: छिन सकता है वन्य जीवों के रहने का ठिकाना

खबर सार :-

असम के बक्सा में भारत और भूटान सीमा से सटे मानस राष्ट्रीय उद्यान में वन जीवन के संरक्षण की तस्वीर बदल रही है। यहां पशुओं के लिए 16 नई वनस्पितियां तैयारी की जा रही हैं।
असम के बक्सा में हाथी-बाघ पर आफत, जंगली घास छीन रही भोजन

खबर विस्तार : -

बक्साः असम के बक्सा में जंगली क्षेत्र पर इन दिनों पशुओं के रहने और उनके खाने के लिए वनस्पतियां कम हो रही हैं। जो वनस्पतियां बची हुई हैं, उन पर जंगली वनस्पतियां हावी हो रही हैं। इनके विस्तार की कोई सीमा नहीं है। यह प्रचलित वनस्पतियों को दबाकर अपना अधिकार बना रही हैं। इससे वन्य प्राणियों को बड़ी संकटों से गुजरना पड़ सकता है। वन विभाग को वन्य प्राणियों की चिंता सता रही है। भारत और भूटान सीमा से सटे इस मानस राष्ट्रीय उद्यान में वन जीवन के संरक्षण की तस्वीर बदल रही है। 

दौरे पर गई थी यूपी की एक टीम

यहां पर कई वन्य जीवों का विचरण रहता है। इस वनस्पति से हाथी, गैंड़ा और बाघ जैसे बड़े पशु अपना पेट भरते हैं। उनको रहने की व्यवस्था भी इन वनस्पतियों से मिल जाती है। कई दुर्लभ पक्षियों का भी यहां विचरण होता है। वन विभाग में इन वनस्पतियों के संरक्षण के लिए कई योजनाएं शुरू कर दी हैं। पीआईबी लखनऊ के नेतृत्व में एक टीम असम दौरे पर पहुंची थी। इसमें मीडिया प्रतिनिधि के लोग भी शामिल थे। मानस राष्ट्रीय उद्यान में संरक्षण के तौर तरीकों के बारे में उनके कई महत्वपूर्ण सवाल थे।

जिस वनस्पति की बात चल रही है, वह केवल उनके लिए घास नहीं, बल्कि एक आवास भी है। घास का संरक्षण करना अब इसलिए महत्वपूर्ण हो रहा है, क्योंकि वन्य जीव के रहने की जगह कम हो रही है। वन प्राणी इधर-उधर विचरण करते रहते हैं। अधिकारियों के मुताबिक हर वर्ष करीब 6ः30 वर्ग किलोमीटर की दायरे से इनकी मानस में घास भूमि कम पड़ रही है। वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी भी घास की प्रजातियां हैं जो बहुत तेजी के साथ फैल रही हैं। इससे कई नुकसान भी हो सकते हैं। 

इस भूमि को जंगल की थाली भी हैं कहते

यद्यपि कृषि यंत्रों के जरिए इनको नष्ट करने की कोशिश की जा रही है। यहां की भूमि के बारे में धार्मिक मान्यताएं भी हैं। इस भूमि को लोग अलग-अलग तरह से परिभाषित करते हैं। देवी और देवता के रूप में इसको देखा जाता है। हिंदुओं में इसकी आस्था महत्व रखी है। मानस में जंगल की थाली भी इस भूमि को कहते हैं। यही कारण है कि जरूरत वाले क्षेत्रों में घास भूमि के पुनर्जीवन की कोशिश की जा रही है। खुले प्राकृतिक माहौल में गैंड़े, हाथी और बाघ के अलावा कई और बड़े पशु यहां रहते हैं। इनकी प्राकृतिक आवासों को दुर्लभ बंगाल फ्लोरिकन से लेकर कई भारतीय प्रचलित पशुओं के लिए यह स्थिति की पारिस्थितिकी तंत्र की तरह काम करता है। 

16 प्रजातियों की विशेष घास की नर्सरी होगी तैयार

वन अधिकारी ने बताया कि एक तंत्र को मजबूत करने के लिए यहां 16 प्रजातियों की विशेष घास की नर्सरी तैयार की जा रही है। इस नर्सरी में कई प्रजातियों को प्लांट में अलग-अलग लगाया गया है। इस घास को पार्क के उन हिस्सों में लगाया जाता है, जहां घास भूमि की पुनर्जीवन की जरूरत होती है। शाकाहारी वन्य जीव इनको खाते भी हैं। यह 16 प्रजातियां हैं। मानस नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर युवराज सिंह ढींगरा ने बताया कि इस क्षेत्र में बहुत दुर्लभ वन्य जीव भी यहां के हिस्सा हैं। यह स्थान प्राकृतिक विरासत के रूप में प्रचलित है। असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स की महिला सिपाहियों ने भी यहां पहुंचकर वनस्पतियों के प्रति चिंतित रहीं। इसे बचाने के लिए वह सक्रिय भूमिका में थीं। उन्होंने अलग-अलग प्लॉट ओर जंगल में इनके इस्तेमाल की प्रक्रिया की सराहना की। 

 दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में चल रही बसाने की कोशिश

बंगाल फ्लोरीकन के संरक्षण के लिए मानस से उत्तर प्रदेश के दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में इसे बसाने की कोशिश चल रही है। यदि सब ठीक-ठाक रहा तो उत्तर प्रदेश के कई प्राणी उद्यान में इसको पहुंचने में सफलता मिलेगी। मानस राष्ट्रीय उद्यान का नाम मानस नदी के नाम पर पड़ा है। भारत-भूटान सीमा पर यह स्थित है और भौगोलिक स्थिति के लिए खास पहचान भी है। बता दें की भूटान के रॉयल मानस नेशनल पार्क से यह सटा हुआ है। इसके लिए काफी भौगोलिक क्षेत्र विस्तृत है, ताकि पारिस्थितिकी तंत्र पर किसी प्रकार की दिक्कत ना हो। इसके संरक्षण के लिए किसी प्रकार की पार्क सीमाओं में बाधा नहीं है।

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