बारिश और सूखे में भी दलहनी मोठ की फूल रहीं फलियां
खबर सार :-
नई दिल्ली, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), जोधपुर द्वारा विकसित मोठ की नई किस्मों का प्रतिफल सामने आ रहा है। उनकी मौजूदा अल नीनो वर्ष (खरीफ 2026) के दौरान 35 दिनों के लंबे सूखे को झेला है।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली, मोठ को दलहनी फसल में गिना जाता है। वैज्ञानिकों ने शोध कर दो नई किस्सों का प्रायागिक शानदार प्रदर्शन करवा दिया है। इसमें बंपर पैदावार की गुंजाइश है। अब तक यह सूखे में बेहतर फलियां दे रही हैं।
मोठ की खेती में पैदावार की बंपर गुंजाइश
फसलों की सीमाओं पर वैज्ञानिक काजरी ने बताया कि 10 जुलाई से 2 सितंबर के बीच फसल विकास के दौरान 3 अगस्त को 86 मिमी की अंतिम महत्वपूर्ण बारिश हुई। उसके बाद 7 सितंबर तक लगभग 35 दिनों तक कोई बारिश नहीं हुई। इस बीच खेत की वाष्पीकरण की दर 180 मिमी तक पहुंच गई तथा सतह की मिट्टी में नमी घटकर मात्र 5 से 6 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद 10 से 40 सेमी की निचली परत में मौजूद 16 प्रतिशत नमी का कुशल उपयोग करते हुए इन किस्मों ने बुवाई के 55 दिनों बाद भी शानदार फली विकास बनाए रखा।
35 दिनों बाद भी फली विकास बनाए रखा
काजरी कहते हैं कि किस्मों की प्रमुख विशेषता इनकी विकासात्मक अनुकूलन क्षमता है। शोध के बारे में बताया कि ये किस्में बुवाई के लगभग 30 दिनों बाद ही फूलने लगती है। इसके सहनशीलता के भी बेहतर परिणाम आ चुके हैं। यह प्रयोग का हिस्सा है, सफलता को साबित करने के लिए आईसीएआर पश्चिमी राजस्थान के शुष्क इलाकों में लगभग सवा महीने से फसल को निहारा गया है। बारिश न होने के बावजूद इन किस्मों ने हरियाली और वानस्पतिक वृद्धि बनाए रखने के साथ ही उनमें भरपूर फलियां भी विकसित हुईं। अब यह वैज्ञानिकांे के साथ ही किसानों व देश की अर्थ व्यवस्था को मजबूती देने में सहायक होगा।
कभी बारिश रुलाती तो कभी सूखा डराता
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की ओर से जानकारी दी गई है कि पश्चिमी राजस्थान के गर्म शुष्क क्षेत्रों में 10 लाख हेक्टेयर के करीब क्षेत्रफल में मोठ की खेती की जाती है। यहां मौसम में असमानता रहती है। इस कारण कभी यहां 150 से 250 मिमी बारिश होती है और कभी 20 से 30 दिनों तक सूखा झेलना पड़ जाता है।
इसके कारण फसल की उत्पादकता औसतन 350 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ही रह जाती है। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए नई दो किस्मों पर काम किया गया है। किसानों की चुनौती से निपटने के लिए संस्थान ने पिछले तीन वर्षों के दौरान चार उन्नत किस्म जैसे काजरी मोठ-4, काजरी मोठ-5, काजरी मोठ-6 और काजरी मोठ-7 जारी की हैं। इस खरीफ सत्र में कठिन परिस्थितियों में भी इन फसलों का उत्कृष्ट प्रदर्शन है।
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2047 तक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर) के सचिव तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट के अनुसार यह फसलें देश की खेती को समृद्धि देंगी साथ ही दलहनी फसलों की दुर्लभता को दूर करेंगी। काजरी की मोठ किस्में थार रेगिस्तान को अधिक समृद्ध बनाने और 2047 तक किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की सोच को जमीन पर उतारने में भी सफलता मिलेगी। डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि लंबे समय तक बारिश न होने के बावजूद फसल की वृद्धि और फली विकास बनाए रखने की यह क्षमता जलवायु-अनुकूल कृषि में आनुवंशिक सुधार की शक्ति को दर्शाती है। यह इसके लिए उचित प्रबंधन और सही समय पर बुवाई महत्व रखता है। खेत की नमी संरक्षण के साथ ये किस्में सूखे के संकट में भी किसानों को सुरक्षित पैदावार देने में पूरी तरह सक्षम हैं।
बर्बाद नहीं जाएगा किसान का बीज
किसानों को हर फसल में किसी न किसी परेशानी से गुजरना पड़ता है। कभी सूखा तो कभी अनचाही बरसात फसल को चौपट कर देती है। इन हालातों से निकालने के लिए आईसीएआर के तहत काम करने वाले केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान ने दलहनी फसल मोठ का विकास किया है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इसकी दो नई किस्मों पर सफलता हासिल की गई है। इनमें एक साथ कई खूबियां भी हैं। यह कम बारिश वाले इलाकों में भी अच्छी पैदावार वाली फसल है। वैज्ञानिकों की मेहनत से दलहन फसलों की खेती को मजबूती देने में यह कामयाब फसल है। एक साथ कई खूबियां इसमें पाई जा रही हैं। इनकी नई किस्में लंबे समय तक बारिश न होने के हालत में भी किसान को मायूस नहीं करती हैं।
बीज अच्छी किस्म के ही होने चाहिए
मोठ दलहन फसल एक दलहनी फसल है। इसे नाइट्रोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिकों ने इसकी पैदावार के लिए खेत की तैयारी में गोबर और कम्पोस्ट की खाद को सर्वोत्तम माना है। फिलहाल अभी किसानों को बीज लेने में ज्यादा भागदौड़ की जरूरत नहीं, उनको वैज्ञानिक या विष्वसनीय स्थानों से ही बीज खरीददारी करना चाहिए। खेतों में किसी प्रकार का खरपतवार मोठ की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। मोठ में दीमक हावी रहता है। इसकी जड़ें काटकर वह पौधों को नुकसान पहुंचाता है। जड़ें कट जाने से पौधा सूखने लग जाता है।
मोठ दहलनी फसल होने के कारण इसका लाभ किसान लें, वह अन्य कई फसलों की अपेक्षा मोठ की खेती कर मुनाफे में रहेंगे। वैज्ञानिकों की अथक परिश्राम और सोच का यह नतीजा है। सरकारी जिस स्तर पर किसानोें को ज्यादा लाभ और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रही है, दो किस्में किसानों को मिल जाना बड़ी उपलब्धियां हैं। किसी भी फसल का उत्पादन उसके बीजों पर भी निर्भर करता है। इसलिए बीज अच्छी किस्म के ही होने चाहिए।
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