स्वाद ही नहीं, सेहत का खजाना है इमली, पेट की बीमारियों की दवा है इमली

खबर सार :-

खट्टापन होने के बाद भी इमली को खाने और दवाओं के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यह भारत में भी बड़े पैमाने पर मिलता है। यह दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका तथा अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी व्यापक रूप से होती है।
पित्त दोष के लिए रामबाण है इमली, जान लें गुण सभी तो आयुर्वेद है इमली

खबर विस्तार : -

नई दिल्ली: खट्टापन के लिए जानी जाने वाली इमली रसोई से बाहर निकले तो दवाओं का भंडार है। इसे खट्टापन घोलने वाले खट्टे फल के रूप में पहचान मिली है। इमली सिर्फ स्वाद नहीं बढ़ाती, बल्कि यह सेहत का खजाना भी है। इसका वैज्ञानिक नाम टैमारिंडस इंडिका है। इसमें विटामिन-सी, एंटीऑक्सीडेंट, फाइबर और आयरन का भंडार होता हैं। आयुर्वेद में इसे पेट की दवाओं का खजाना माना गया है। यह इमली पाचन, कब्ज और पित्त दोष के लिए तो रामबाण है। 

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उष्णकटिबंधीय अफ्रीका में उत्पत्ति

इमली के बारे में नमामि गंगे ने एक्स पर पोस्ट किया है। आम आदमी को पोस्ट के माध्यम से इमली की उत्पत्ति से लेकर उसके लाभ तक की जानकारी दी है। इसमें बताया कि इमली की उत्पत्ति उष्णकटिबंधीय अफ्रीका मानी जाती है। लोगों के लिए यह चौंकने वाली जानकारी है। क्योंकि, इमली भारत में बड़े पैमाने पर बिना उगाए उग जाती है। कुछ लोग इसके पौधे उगाते भी हैं। बहरहाल, जो जानकारी दी है, उसमें यह दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका तथा अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी व्यापक रूप से होती है। 

कई मिट्टियों में लेता है आकार

इसे भारत के मैदानी एवं पठारी क्षेत्रों में सामान्य बताया गया है। इसका पेड़ बड़ा, दीर्घायु एवं सदाबहार से अर्ध-सदाबहार माना गया है। इमली के बारे में बताया गया है कि यह जैव-भौगोलिक क्षेत्र दक्कन प्रायद्वीप, मध्य उच्चभूमि, गंगा का मैदानी क्षेत्र, पूर्वी एवं पश्चिमी घाट, अर्ध-शुष्क एवं शुष्क है। यह खट्टा फल उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ज्यादा मिलता है। इसके बारे में शुष्क से लेकर आर्द्र जलवायु तक अच्छी तरह विकसित होने का माध्यम माना गया है। 

बलुई-दोमट मिट्टी है इसकी पसंद

इमली के पेड़ विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाए जा सकते हैं। यह अच्छी जल निकासी वाली दोमट एवं बलुई-दोमट मिट्टी में सर्वोत्तम वृद्धि करता है। इमली का पौधा सूखापन के साथ उच्च तापमान भी झेल सकता है। यह हमारे देश में प्राचीन काल से ही पाया जाता है। इमली का फूल अप्रैल से जून तक आते हैं। इसमें फल दिसंबर से अप्रैल तक आते हैं। कुछ प्रकार की इमली में ज्यादा खट्टापन तो कुछ में हल्का मीठापन भी पाया जाता है। 

इमली के वृक्ष बड़े होते हैं। पक्षियों और गिलहरियों के लिए यह रहने का अच्छा ठिकाना बना रहता हैं। इसकी जडें मिट्टी के कटाव को कम करती हैं। यह कार्बन अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सड़कों के किनारे लगाए गए इमली के वृक्ष शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में छायादार वृक्ष के रूप में भी प्रचलित हैं। 

चटनी और अचार में होता इस्तेमाल

इमली गूदेदार होता है। इसका उपयोग भोजन, पेय पदार्थ, चटनी, अचार तथा विभिन्न व्यंजनों में किया जाता है। खट्टे स्वाद के लिए इसे पसंद किया जाता है। इसमें विटामिन एवं खनिज भरपूर होते हैं। इसकी पत्तियों, छाल एवं फल को आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा में इस्तेमाल किया जाता है। यह पाचन, ज्वर तथा अन्य रोगों के उपचार में काम आता है। लकड़ी भी इसकी मजबूत होने के कारण कृषि उपकरण, फर्नीचर, हस्तशिल्प में इस्तेमाल की जाती है। 

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