धान की खेती में वरदान साबित होगा ‘एजोला’, यूरिया की होगी बचत और बढ़ेगी पैदावार, जानें फायदे
खबर सार :-
कटिहार में जिला कृषि विभाग ने किसानों से धान की खेती में ‘एजोला’ का इस्तेमाल करने की अपील की है। ‘एजोला’ के इस्तेमाल से धान की पैदावार में वृद्धि होगी और यूरिया की भी बचत होगी। जानें इसके फायदे और इस्तेमाल करने का सही तरीका-
खबर विस्तार : -
कटिहार: जिला कृषि विभाग ने धान की खेती की बढ़ती लागत और रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए एक अनोखी पहल शुरू की है। कटिहार के जिला कृषि अधिकारी-सह-परियोजना निदेशक (ATMA) ने किसानों से अपनी धान की फसल में 'एजोला' (Azolla) जैव-उर्वरक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने का आग्रह किया है।
प्राकृतिक जैव-उर्वरक और हरी खाद के रूप में काम करने वाला एजोला किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है; यह न केवल यूरिया की बचत करता है, बल्कि मिट्टी की सेहत में भी सुधार करता है और फसल की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि करता है।
यूरिया की आवश्यकता में कमी
कृषि विभाग के अनुसार, एजोला धान की फसल को प्रति हेक्टेयर लगभग 25 से 30 किलोग्राम प्राकृतिक नाइट्रोजन प्रदान करता है, जिससे रासायनिक नाइट्रोजन यानी यूरिया की आवश्यकता 20 से 25 प्रतिशत तक कम हो जाती है। इसके नियमित इस्तेमाल से पौधों में कल्ले अधिक निकलते हैं, पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और खेत हरे-भरे रहते हैं। इसके अलावा, यह मिट्टी की जैविक उर्वरता और सूक्ष्मजीव गतिविधियों को बढ़ाता है और साथ ही खरपतवार को प्राकृतिक रूप से रोकने का काम भी करता है।
धान की रोपाई के 7 से 10 दिन बाद खेत में फैलाएं अजोला
वैज्ञानिक तरीके से इसके इस्तेमाल के बारे में सलाह दी जाती है कि धान की रोपाई के 7 से 10 दिन बाद प्रति हेक्टेयर लगभग 300 से 500 किलोग्राम ताजा एजोला पूरे खेत में समान रूप से फैलाया जाना चाहिए। इस दौरान खेत में पानी का स्तर 5 से 10 सेंटीमीटर बनाए रखना जरूरी है ताकि अजोला पूरे क्षेत्र में तेजी से फैल सके। लगभग 15 से 20 दिनों के भीतर, यह प्राकृतिक रूप से सड़-गल जाता है और फसल को नाइट्रोजन प्रदान करता है।
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एजोला के इस्तेमाल में सावधानी जरूरी
किसानों को एजोला का इस्तेमाल करते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। एजोला डालने से ठीक पहले या बाद में खरपतवार नाशक (herbicides) का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। खेत में पानी का स्तर स्थिर रखना चाहिए, तेज बहाव से बचना चाहिए और केवल स्वस्थ, शुद्ध अजोला कल्चर का ही इस्तेमाल करना चाहिए। अंत में, जिला कृषि अधिकारी ने किसानों से खेती की लागत कम करने, उच्च गुणवत्ता वाली फ़सल उगाने और बेहतर आय अर्जित करने के लिए इस किफायती, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल जैव-तकनीक को अपनाने का आह्वान किया है।
हवा से फसल को देता है नाइट्रोजन
एजोला एक छोटा जलीय पौधा है जिसे वैज्ञानिक रूप से फर्न की श्रेणी में रखा गया है। इसकी पत्तियों में 'एनाबेना' (Anabaena) नाम का एक सूक्ष्मजीव पाया जाता है, जो एक तरह का नीला-हरा शैवाल (blue-green algae) है। यह सूरज की रोशनी में हवा से नाइट्रोजन को सोखकर फसल को नाइट्रोजन देता है, ठीक वैसे ही जैसे हरी खाद काम करती है।
पांच दिनों में दोगुना हो जाता है एजोला
एजोला की एक खास बात यह है कि सही हालात मिलने पर यह सिर्फ पांच दिनों में अपना बायोमास (वजन) दोगुना कर सकता है। अगर इसे पूरे साल उगाया जाए, तो यह प्रति हेक्टेयर 300 टन से ज्यादा ऑर्गेनिक मैटर (जैविक पदार्थ) दे सकता है, जिससे प्रति हेक्टेयर 40 किलोग्राम नाइट्रोजन मिल सकता है। एजोला में 3.5% नाइट्रोजन और कई तरह के ऑर्गेनिक कंपाउंड होते हैं जो मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को बढ़ाते हैं।
धान की पैदावार में 15% तक की बढ़ोतरी संभव
इसे धान के खेतों में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। धान की रोपाई से पहले खेत में दस टन ताजा अजोला डाला जाता है। पानी का स्तर 2 से 4 इंच होना चाहिए। इसके साथ ही, इस पर 30 से 40 किलोग्राम सुपरफॉस्फेट भी बिखेरा जाता है। इसके बढ़ने के लिए 30°C से 35°C का तापमान बहुत अच्छा होता है। अजोला के इस्तेमाल से धान की पैदावार में 5% से 15% तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
एजोला की विशेषताएं
1. एजोला पानी में तेजी से बढ़ता है।
2. एजोला में प्रोटीन, जरूरी अमीनो एसिड, विटामिन (विटामिन A, विटामिन B-12 और बीटा-कैरोटीन) के साथ-साथ कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम, आयरन, कॉपर और मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
3. सूखे वजन के आधार पर, इसमें 20–30% प्रोटीन, 20–30% फैट, 50–70% मिनरल सॉल्ट, 10–13% फाइबर और साथ ही बायोएक्टिव पदार्थ और बायो-पॉलिमर होते हैं।
4. इसमें मौजूद उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन और ऊपर बताए गए पोषक तत्वों के कारण, पशु इसे आसानी से पचा सकते हैं।
5. एजोला को उगाने का खर्च बहुत कम होता है।
6. इससे हर हफ़्ते प्रति वर्ग मीटर औसतन 15 किलोग्राम पैदावार मिलती है।
7. सामान्य परिस्थितियों में, यह फर्न तीन दिनों में अपनी मात्रा दोगुनी कर लेता है।
8. यह पशुओं के लिए एंटीबायोटिक का काम करता है।
9. यह पशुओं के लिए एक बेहतरीन चारा है और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने के लिए हरी खाद के तौर पर भी उपयुक्त है।
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