जौ के बिना ये सब खाली-भोजन की थाली, पूजा की वेदी, खेत में हरियाली

खबर सार :-

जिन किसानों का ध्यान जौ की खेती की ओर गया है, वह बिलकुल सही सोच रहे हैं। क्योंकि जौ लाभकारी, स्वास्थ्यवर्धक के अलावा सरकारी प्रोत्साहन वाली योजना में भी शामिल किया गया है।
एक साथ कई लाभ वाली फसल है जौ, बीज पर भी लें अनुदान

खबर विस्तार : -

लखनऊ, आने वाले दिनों में अब हमारी खेती लहलहाएगी। हम अपने खेतों में जब जौ की बोनी करेंगे और उत्पादन लेने तक खेत की देखभाल करेंगे। जौ के बारे में हम सभी लोग जानते हैं कि यह एक प्रतिष्ठित और प्राचीन अनाजों में शुमार है। इसका आटा पोषक तत्वों से भरपूर होता है।

कई प्रोडक्ट भी जौ के आटे से बनाए जाते

स्वास्थ्य वर्धक फसलों में इसका नाम आता है। प्राचीन अनाजों में खाए जाने वाला जौ आज हमारी खेती में कम दिखाई पड़ता है। यह पैदावार में कमजोर नहीं होने के बाद भी हमसे दूर किया गया है। इसके कई कारण भी हो सकते हैं। जबकि यह एक किफायती और आसानी से उपलब्ध होने वाला अनाज है। स्वास्थ्य के लिए उत्तम आटे से रोटी और स्वादिष्ट व्यंजन तक इससे बन सकते हैं। यहां तक की कई प्रोडक्ट भी जौ के आटे से बनाए जाते हैं।

फाइबर का एक प्रभावशाली स्रोत भी इसे हम कह सकते हैं। इसे हम आमतौर पर परिष्कृत अनाजों के रूप में भी जानते हैं। यह किसी भी आहार में आसानी से शामिल कर लिया जाता है। सेहत के प्रति अगर हम तनिक भी ध्यान दे रहे हों तो इसकी रोटियां खाना बेहद लाभकारी होता है। वैसे तो यह कोई शोध नहीं है, पहले भी बताया जा चुका है कि यह पारंपरिक फसलों में उगाया जाता रहा है। इसका इतिहास भी रहा है।

बनवाएं दलिया, रोटी और सत्तू 

प्राचीन मिस्र के लोग रोटी जौ से ही बनाते थे। ग्रीस के लोग भी इसकी रोटी खाना पसंद करते थे। हमारे यहां भी पारंपरिक खेती में यह बोया जाता रहा है। वर्तमान में हम यदि बात करें तो जौ और चने का सत्तू काफी महंगा बिकता है। कुछ खास मौके पर यह आसानी से नहीं मिल पाता है। जौ की खेती करने के लिए ठंडी और शुष्क परिस्थितियां बेहतर मानी गई हैं। इसमें कई किस्म भी आने लगी हैं। अब आने वाले समय में बिना छिलके वाली फसल के रूप में भी उपलब्ध हो चुकी है।

शरद ऋतु में इसको बोना सबसे अच्छा मौसम माना जाता है, जबकि कुछ लोग इसे वसंत ऋतु में भी बोना पसंद करते हैं। खेती के लिए यह आवश्यक होता है कि इसमें जल निकासी बेहतर हो और ज्यादा ठंडक वाले मौसम में इसे बोने से बचें। बुवाई के लिए हमारी परंपरागत खेती ही बेहतर है। स्वास्थ्य के लिहाज से बताया गया है कि इसमें फाइबर होता है और यह कब्ज को दूर करने में मदद करता है। इसके साथ ही ब्लड शुगर लेवल अचानक नहीं बढ़ने देता है। वजन को नियंत्रित करने में यह मदद करता है। शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में भी सहायक होता है। अक्टूबर में इसकी रोटी, दलिया या सत्तू के रूप में अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं।

सरकार कर रही जौ के किसानों का प्रोत्साहन

सरकार की ओर से जौ पर न्यूनतम समर्थन मूल्य सीजन 2026-27 के लिए 2,150 प्रति क्विंटल निर्धारित है। पिछले वर्ष की तुलना में 170 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई थी। इससे किसानों को अपनी फसल की सही और लाभकारी कीमत सुनिश्चित सरकारी स्तर पर कर दी गई। इसके साथ ही मुफ्त मिनीकिट और बीज सब्सिडी योजनाएं संचालित कह जा रही हे। विभिन्न राज्यों के कृषि विभागों द्वारा जौ की बुवाई के लिए उन्नत किस्म के बीजों पर भारी सब्सिडी दी जा रही है।

उत्तर प्रदेश में भी यूपी सरकार के कृषि विभाग द्वारा किसानों को मुफ्त मिनी बीज किट उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके साथ ही सामान्य और संकर बीजों की ऑनलाइन बुकिंग करने पर 50 फीसदी तक का अनुदान दिया जा रहा है। किसान सरकारी बीज गोदामों से इसे प्राप्त करने के लिए भी यूपी एग्रीकल्चर पोर्टल पर ऑनलाइन बुकिंग कर सकते हैं।

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