असम के सोनापुर में बना देश का पहला एक्वा टेक पार्क, आधुनिक तकनीक से मछली पालन बन रहा बिजनेस माॅडल
खबर सार :-
असम के सोनापुर में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से मछली पालन को नया रूप दिया जा रहा है। देश के पहले एक्वा टेक पार्क में मछली पालन फायदेमंद बिजनेस माॅडल बनकर उभर रहा है।
खबर विस्तार : -
सोनापुर: कभी तालाबों और नदियों पर निर्भर रहा मछली पालन अब टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और एंटरप्रेन्योरशिप से एक नए दौर में जा रहा है। यह बदलाव असम के सोनापुर में भारत के पहले एक्वा टेक पार्क में साफ दिख रहा है, जहां कम पानी और रिसोर्स के साथ भी मॉडर्न तकनीकों का इस्तेमाल करके ज्यादा पैदावार की संभावना को पूरा करने की कोशिशें चल रही हैं। यहां मछली पालन सिर्फ रोजी-रोटी के जरिया से आगे बढ़कर ट्रेनिंग, सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट और एंटरप्रेन्योरशिप से जुड़ा एक फायदेमंद बिजनेस मॉडल बन रहा है।
यह तकनीक पानी की सीमित मात्रा को मैनेज और रीसायकल करके ज्यादा मछली प्रोडक्शन में मदद करती है। यह उन किसानों और युवाओं के लिए खास तौर पर फायदेमंद है जो उन इलाकों में छोटे पैमाने पर मछली पालन शुरू करना चाहते हैं, जहां बड़े तालाब या पानी के बहुत सारे साधन नहीं हैं। यह पार्क सिर्फ टेक्नोलॉजी दिखाने से कहीं आगे है; यह किसानों को ऑपरेशनल मैकेनिक्स समझाता है और उन्हें असल दुनिया के हालात में इसे इस्तेमाल करने के लिए तैयार करता है।
पौधों की खेती के साथ मछली पालन का जुड़ाव
इसी तरह, एक्वापोनिक्स मछली पालन को पौधों की खेती के साथ जोड़ता है। यह सिस्टम, जो मछली और पौधे दोनों पैदा करता है, पानी और साधनों के सही इस्तेमाल के लिए एक दूसरा मॉडल देता है। कलोंग-कपिली के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ज्योतिष तालुकदार के मुताबिक, जिस ऑर्गनाइजेशन ने एक्वा टेक पार्क बनाया है, यह ग्रुप 2007 से असम और नॉर्थईस्ट में एक्टिव है, और मॉडर्न और क्लाइमेट-रेजिलिएंट मछली पालन, नेचुरल फार्मिंग, कम्युनिटी डेवलपमेंट और बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन जैसे एरिया में काम कर रहा है।
अब तक 60,000 से ज्यादा किसानों को ट्रेनिंग
उन्होंने कहा कि ऑर्गनाइजेशन की कोशिशों से अब तक 60,000 से ज्यादा किसानों को ट्रेनिंग मिली है, जबकि 100,000 से ज्यादा युवाओं और महिलाओं को रोजगार और रोजी-रोटी के मौकों से जोड़ा गया है। असम में शुरू हुई यह पहल अब अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, त्रिपुरा और मेघालय के साथ-साथ बिहार और ओडिशा तक फैल गई है। तालुकदार के अनुसार, इसका मकसद एक्वा टेक पार्क को सिर्फ एक डेमोंस्ट्रेशन सेंटर से ट्रेनिंग, टेक्नोलॉजी, रिसर्च, इनोवेशन और एंटरप्रेन्योरशिप के लिए एक इंटीग्रेटेड हब में बदलना है।
पार्क में टेक्नोलॉजी के चुनाव पर भी जोर
इसका असली मकसद यह है कि किसान और युवा सिर्फ टेक्नोलॉजी को देखें ही नहीं, बल्कि उसे सीखें और अपनाएं और आखिर में इसका इस्तेमाल करके अपना बिजनेस शुरू करें। पार्क में टेक्नोलॉजी के चुनाव पर भी काफी जोर दिया जाता है। फिशरीज एक्सपर्ट अश्लेषा श्रबोर्नी ने बताया कि किसानों को उनके इलाके के खास हालात, मौजूद पानी, रिसोर्स और लोकल जरूरतों के आधार पर टेक्नोलॉजी चुनने की ट्रेनिंग दी जाती है। दूसरे शब्दों में, मकसद हर जगह एक ही टेक्नोलॉजी लागू करना नहीं है, बल्कि लोकल हालात के हिसाब से सॉल्यूशन बनाना है। यह पहल छोटे और मार्जिनल किसानों के लिए मॉडर्न फिश फार्मिंग को ज्यादा प्रैक्टिकल बनाना चाहती है।
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60,000 से ज्यादा किसानों को मिली ट्रेनिंग
इस मॉडल की नींव एक्वाकल्चर फील्ड स्कूल ने रखी थी। कलोंग-कपिली एक्वाकल्चर फील्ड स्कूल 10 जुलाई, 2021 को ICAR-CIFA और भारत सरकार की मान्यता वाली एक पहल के तौर पर शुरू हुआ। समय के साथ, इसे बड़ा किया गया और एक्वा टेक पार्क में बदल दिया गया। इस पार्क का उद्घाटन 12 जुलाई, 2025 को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने किया था। इसके डेवलपमेंट में NABARD, ICAR-CIFA, असम सरकार के फिशरीज डिपार्टमेंट और दूसरे पार्टनर ऑर्गनाइजेशन ने भूमिका निभाई है। कलोंग-कपिली के अनुसार, इस मॉडल में 60,000 से ज्यादा किसानों को ट्रेनिंग, 100,000 से ज्यादा युवाओं और महिलाओं को मजबूत बनाना, 3,050 से ज्यादा महिला सेल्फ-हेल्प ग्रुप को इकट्ठा करना और 420 से ज्यादा कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन (CRP) का डेवलपमेंट शामिल है।
मछली पालन को उद्यम बनाने की कोशिश
इसके अलावा, 350 से ज्यादा एक्वा-एंटरप्रेन्योर (मछली पालन से जुड़े उद्यमी) की ट्रेनिंग और चार किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के गठन के बारे में भी जानकारी दी गई। पार्क में मछली पालन के कामों में सोलर पावर जैसी रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी को शामिल करने पर भी जोर दिया जा रहा है। इस तरीके से भविष्य में उत्पादन लागत, ऊर्जा की उपलब्धता और टिकाऊ मछली पालन के बीच बेहतर संतुलन बनाने की संभावना है। असम और पूरे पूर्वोत्तर में बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार अपनी आजीविका के लिए खेती और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर हैं। इस संदर्भ में, एक्वा टेक पार्क पहल महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मछली पालन को केवल एक पारंपरिक गतिविधि से बदलकर टेक्नोलॉजी पर आधारित ग्रामीण उद्यम बनाने की कोशिश करती है।
पूर्वोत्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा
एक छोटे से तालाब से शुरू हुआ यह मॉडल अगर बड़े पैमाने पर किसानों तक पहुंचता है, तो मछली पालन युवाओं के लिए और यहां तक कि उन लोगों के लिए भी जिनके पास पानी, जमीन और संसाधनों की सीमित पहुंच है, उनके लिए रोजगार का एक अच्छा विकल्प बन सकता है। नतीजतन, सोनापुर पार्क मछली उत्पादन की तकनीकों को दिखाने वाले केंद्र से कहीं ज्यादा कुछ बन रहा है; यह एक ऐसी पहल के रूप में उभर रहा है जिसमें पूर्वोत्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने की क्षमता है।
FAQ
1. एक्वा टेक पार्क कहां विकसित हुआ है?
असम के सोनापुर में भारत के पहला एक्वा टेक पार्क विकसित किया गया है।
2. एक्वा टेक पार्क किसानों के लिए किस प्रकार मददगार साबित हो रहा है?
इस मॉडल में अब तक 60,000 से ज्यादा किसानों को मछली पालन की ट्रेनिंग दी गई है।
3. यह माॅडल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए किस तरह उपयोगी है?
यह मॉडल मछली पालन में रुचि रखने वाले युवाओं के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी बन सकता है।
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