Bihar Assembly Election : वैसे तो बिहार में मानसून आ चुका है लेकिन बारिश भी सियासी जमीन की गरमी को शांत नहीं कर पा रही है। बिहार में सत्ता पक्ष, विपक्ष और चुनाव आयोग की तिकड़ी ने सूबे की राजनीतिक भट्ठी को और धधका दिया है। विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने आने वाले विधानसभा चुनावों का बहिष्कार करने की संभावना जताकर सियासी बहस को नई दिशा दे दी है। लेकिन क्या यह सच में उनकी गंभीर मंशा है या फिर सिर्फ चुनावी रणनीति का हिस्सा? फिलहाल यह कहना अभी मुश्किल है।
बिहार में विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद पिछले कुछ दिनों से चल रहा है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग बीजेपी के इशारे पर काम कर रहा है और लाखों मतदाताओं के नाम गैरकानूनी तरीके से काटे जा रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर तेजस्वी यादव ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अगर चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं होगा और मतदाता सूची में धांधली होगी, तो हम चुनाव बहिष्कार पर विचार कर सकते हैं। हम अपने सहयोगी दलों से इस पर चर्चा करेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों की बात मानी जाए तोयह एक दबाव बनाने की रणनीति हो सकती है। बिहार में पिछले लोकसभा चुनाव में महागठबंधन (त्श्रक्ए ब्वदहतमेेए स्मजि) को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में अगर विपक्ष चुनाव से हटता है तो यह सीधे तौर पर उनकी हार स्वीकारने जैसा होगा। फिलहाल कांग्रेस और वाम दलों के किसी बड़े नेता ने इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट राय नहीं दी है, जिससे स्पष्ट है कि इंडिया गठबंधन में एकराय नहीं है।
बीजेपी और जदयू ने तेजस्वी के बयान को हार का डर बताया है। बीजेपी के नेता नीरज कुमार ने कहा कि जब 2024 के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन सिर्फ 4 सीटों पर सिमट गया, तो अब उन्हें 2025 के विधानसभा चुनाव में और भी बुरी हार का अंदेशा है। इसलिए वे मैदान छोड़ने की बात कर रहे हैं।
इससे पहले, विपक्ष की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि आधार, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेजों को वैध माना जाए।
एक तरफ जहां तेजस्वी यादव मतदाता सूची में हेराफेरी के आरोपों को लेकर जनता का समर्थन हासिल करना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर छक्। इसे विपक्ष की कमजोरी बता रहा है। अगर विपक्ष वास्तव में चुनाव बहिष्कार करता है तो यह बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आ सकता है। लेकिन फिलहाल यह मामला सियासी बयानबाजी तक ही सीमित लगता है। अगस्त में मतदाता सूची का ड्राफ्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि कितने नाम हटाए गए हैं। उसके बाद विपक्ष की रणनीति साफ होगी। फिलहाल, बहिष्कार की धमकी को राजनीतिक दबाव समझना ही उचित होगा।
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