यूपी में मशरूम के प्रति बढ़ा किसानों का रुझान, अयोध्या के उत्सव ने डेढ़ लाख से बनाया करोड़ों का कारोबार
खबर सार :-
यूपी में मशरूम के प्रति किसानों में रुझान बढ़ा है। अयोध्या के उत्सव ने मशरूम की खेती कर सफलता की नई इबारत लिखी है। वे अब अन्य किसानों को भी मशरूम की खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
खबर विस्तार : -
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में मशरूम की खेती अब किसानों के लिए सिर्फ एक वैकल्पिक फसल नहीं रही, बल्कि कम जमीन और कम निवेश में अच्छी कमाई का जरिया बन गई है। साल 2024-25 में राज्य में लगभग 51,000 मीट्रिक टन मशरूम का उत्पादन हुआ, जो देश के कुल 4.27 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का लगभग 13 प्रतिशत है।
कम समय में ज्यादा पैदावार, कम जमीन की जरूरत और नियंत्रित माहौल में खेती की सुविधा के कारण किसानों और युवाओं में इसकी लोकप्रियता बढ़ी है। अयोध्या के सोहावल इलाके के किसान उत्सव सिंह की कहानी इस बदलाव का एक बेहतरीन उदाहरण है। 1 लाख से 1.5 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी से शुरू करके उत्सव ने अपने कारोबार को इतना बढ़ाया है कि अब उनके उत्पादन का मूल्य 1 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है।
2019 में शुरू की मशरूम की खेती
अयोध्या के सोहावल ब्लॉक के धहराउरा गांव के रहने वाले और महेश सिंह के बेटे उत्सव सिंह ने 2019 में मशरूम की खेती शुरू की। MCA करने के बाद उनके पास नौकरी या कोई और कारोबार करने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने बड़े पैमाने पर खेती करने का फैसला किया। खेती-बाड़ी वाले परिवार में पले-बढ़े उत्सव पारंपरिक फ़सलों के बजाय ऐसी खेती करना चाहते थे जिसमें कम जगह में ज्यादा कीमत वाली उपज मिल सके। इसलिए, उन्होंने मशरूम की खेती को चुना। शुरुआत में मशरूम उत्पादन के बारे में जानकारी न होने पर, उत्सव ने सोशल मीडिया और अन्य उपलब्ध साधनों से इसकी तकनीकें सीखीं। इस विचार पर उनके परिवार की शुरुआती प्रतिक्रिया उत्साहजनक नहीं थी; उन्हें अनुभव और विशेषज्ञता की कमी के कारण आर्थिक नुकसान का डर था। हालांकि, जब उत्सव ने उन्हें पूरी बात समझाई, तो परिवार सहमत हो गया और उन्होंने लखनऊ में शुरुआती ट्रेनिंग ली।
फूस के शेड में मशरूम का उत्पादन शुरू किया
इसके बाद, सर्दियों के चार महीनों का फायदा उठाते हुए एक छोटे से फूस के शेड में मशरूम का उत्पादन शुरू किया गया। शुरुआती निवेश ₹1 लाख से ₹1.5 लाख के बीच था और पहली फसल में लगभग 30 क्विंटल मशरूम का उत्पादन हुआ। उत्सव ने अपनी उपज बेचने के लिए स्थानीय थोक बाजार (मंडी) से संपर्क किया। उत्पाद को अच्छा रिस्पॉन्स मिला और लागत निकालने के बाद अच्छी कमाई हुई। इस शुरुआती सफलता ने न सिर्फ उनका आत्मविश्वास बढ़ाया, बल्कि उनके परिवार को भी इस काम की संभावनाओं के बारे में यकीन दिलाया।

ट्रेनिंग लेने के बाद उत्पादन का दायरा बढ़ाया
इसके बाद, उत्सव ने सिर्फ प्रैक्टिकल अनुभव पर निर्भर रहने के बजाय टेक्निकल जानकारी हासिल करने को प्राथमिकता दी। उन्होंने मशरूम की खेती की वैज्ञानिक तकनीकों को समझने के लिए सोलन (हिमाचल प्रदेश) के चंबाघाट स्थित डायरेक्टरेट ऑफ मशरूम रिसर्च (DMR) में ट्रेनिंग ली। फिर उन्होंने धीरे-धीरे प्रोडक्शन का दायरा बढ़ाया। जो काम एक छोटी सी फूस की झोपड़ी से शुरू हुआ था, वह अब लगभग 1.5 एकड़ में फैले एक बड़े ऑपरेशन में बदल गया है, जिसमें खेती के लिए 35 शेड हैं। अब सालभर प्रोडक्शन सुनिश्चित करने के लिए एयर-कंडीशंड शेड का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह भी पढ़ें:- कुलंजन की खेती के कई फायदे, आमदनी का श्रोत है फसल की जड़
लगातार बढ़ रही बटन मशरूम की मांग
उत्सव के अनुसार, अभी मौसमी प्रोडक्शन लगभग 450 से 500 क्विंटल है, जबकि सालभर चलने वाले सिस्टम से बाजार में सप्लाई के लिए हर महीने लगभग 80 क्विंटल मशरूम मिलता है। उनके बिजनेस का सालाना प्रोडक्शन मूल्य 1 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। बताया जाता है कि इस काम से लगभग 250 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है। अयोध्या के अलावा, उनके मशरूम लखनऊ, गोरखपुर, बस्ती, अंबेडकर नगर और सिद्धार्थनगर समेत कई जिलों में सप्लाई किए जाते हैं। उत्सव का कहना है कि बाजार में बटन मशरूम की मांग लगातार बढ़ रही है। थोक और खुदरा कीमतें आम तौर पर 120 से 220 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच होती हैं, हालांकि बाजार की स्थितियों और मौसम के आधार पर कीमतें बदलती रहती हैं।
दूसरे किसानों को भी दे रहे जानकारी
मशरूम की खेती में सफलता के बाद उत्सव अब दूसरे किसानों और युवाओं को भी यह जानकारी और अनुभव बांटने के लिए ट्रेनिंग दे रहे हैं। अभी राज्य के लगभग 15 जिलों में ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं। आस-पास के गांवों और दूसरे जिलों के किसान और युवा खेती की तकनीकों, शेड बनाने, तापमान कंट्रोल करने और बाजार की स्थितियों के बारे में सीखने के लिए उनसे मिलने आते हैं। उत्सव का कहना है कि उन्होंने अपनी यूनिट शुरू करने के लिए अब तक कोई सरकारी मदद नहीं ली है। हालांकि, राज्य में मशरूम प्रोडक्शन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाओं के जरिए आर्थिक मदद और टेक्निकल सपोर्ट दिया जा रहा है।
200-स्क्वायर-फुट के शेड से शुरुआत
राज्य में छोटे किसानों को मशरूम की खेती से जोड़ने के लिए, इस योजना में 200-स्क्वायर-फुट के शेड का मॉडल भी शामिल किया गया है। 'मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर' (MIDH) के तहत, अलग-अलग कैटेगरी में योग्य लाभार्थियों को 40% से 50% तक सब्सिडी दी जा रही है। 200-स्क्वायर-फुट की प्रोडक्शन यूनिट के लिए ₹1 लाख तक की आर्थिक मदद का प्रावधान है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में अब तक ऐसी लगभग 80 मशरूम प्रोडक्शन यूनिट लगाई जा चुकी हैं।
मशरूम प्रोडक्शन की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने के लिए कम्पोस्ट और स्पॉन (बीज) बनाने वाली यूनिट्स को भी योजना में शामिल किया गया है। पिछले साल, ऐसी 30 यूनिट्स को 40% सब्सिडी देने की मंजूरी दी गई थी। इससे प्रोडक्शन के लिए जरूरी सामान की लोकल सप्लाई सिस्टम को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। राज्य के कई जिलों जैसे लखनऊ, प्रयागराज, सहारनपुर, मिर्जापुर, जौनपुर, हरदोई, बस्ती, मेरठ, प्रतापगढ़, रायबरेली और सोनभद्र के किसान मशरूम की खेती अपना रहे हैं। हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट किसानों को प्रोडक्शन के तरीकों, यूनिट चलाने, क्वालिटी स्टैंडर्ड्स और दूसरी तकनीकी बातों के बारे में ट्रेनिंग दे रहा है।
कंट्रोल्ड टेम्परेचर और ह्यूमिडिटी जरूरी है
मशरूम प्रोडक्शन में मौसम और पर्यावरण की स्थितियों की अहम भूमिका होती है। सितंबर के आखिर से अक्टूबर तक का समय मौसमी खेती के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, और यह चक्र आम तौर पर मार्च के पहले हफ्ते तक चलता है। प्रोडक्शन के दौरान टेम्परेचर और ह्यूमिडिटी के बीच संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है; आमतौर पर, 20°C से 30°C का टेम्परेचर और 80% से 90% के बीच ह्यूमिडिटी का लेवल सबसे अच्छा माना जाता है। साफ-सफाई या प्रोडक्शन के तरीकों में थोड़ी सी भी लापरवाही पैदावार पर असर डाल सकती है। इसीलिए इस सेक्टर में आर्थिक मदद के साथ-साथ तकनीकी ट्रेनिंग भी उतनी ही जरूरी है। मशरूम प्रोडक्शन को बढ़ाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए रोजगार के नए मौके भी बन सकते हैं। चूंकि इसके लिए बड़े खेतों की जरूरत नहीं होती, इसलिए कम जमीन वाले किसान और ग्रामीण परिवार भी छोटे स्तर पर यह काम कर सकते हैं। सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स के ज़रिए ग्रामीण महिलाओं को प्रोडक्शन, पैकेजिंग और प्रोसेसिंग के कामों में शामिल करने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है। होटलों, रेस्टोरेंट, रिटेल मार्केट और फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री से मांग बढ़ने के कारण लोकल मार्केटिंग के मौके भी बेहतर हुए हैं।
किसानों को रोजगार के नए तरीकों से जोड़ना लक्ष्य
बागवानी और कृषि विपणन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह ने कहा कि राज्य सरकार पारंपरिक फसलों के साथ-साथ किसानों को कमाई के नए जरिया से जोड़ने की दिशा में काम कर रही है। कम जमीन की जरूरत और नियंत्रित स्थितियों में खेती की संभावना को देखते हुए, मशरूम उत्पादन को किसानों के लिए एक फायदेमंद गतिविधि के तौर पर बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि 'मिशन फाॅर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर' के तहत मशरूम प्रोडक्शन यूनिट्स के लिए 40 से 50 प्रतिशत तक सब्सिडी का प्रावधान है। छोटे किसानों के लिए 200-वर्ग-फीट के शेड मॉडल के तहत 1 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद दी जाती है। उत्पादन क्षमता बढ़ाने की कोशिशों के साथ-साथ किसानों को ट्रेनिंग और तकनीकी मार्गदर्शन देने पर भी जोर दिया जा रहा है।
यह भी पढ़ें:- हल्दी की खेती पर सरकारी ध्यान, किसानों की आय में हो रही वृद्धि
अन्य प्रमुख खबरें
-
प्रदेश के हर नागरिक के सुख-दुख में ढाल बनकर खड़ी है योगी सरकारः कृषि मंत्री
2026-09-27
-
शिमला में हुए तीन करार, पहाड़ों की खेती से कमाएंगे वैद्य और किसान
2026-09-26
-
धान की फसल में बालियां निकलने का समय, जरूरी है उचित फसल प्रबंधनः एनआईबीएसएम
2026-09-26
-
सीड पार्क रोड के लिए काटे जाएंगे वृक्ष, निश्चित सीमा में ही उर्वरक पाएंगे किसान
2026-09-26
-
लखनऊ समेत कई जिलों में हो रही बारिश, 27 तक मौसम खराब रहने के आसार
2026-09-25
-
कभी हल्की धूप तो कभी फुहार, हथिया नक्षत्र का यही प्रभाव
2026-09-24
-
कृषि समृद्धि में MP का डंका, खाद्यान्न उत्पादन में रच रहा नए कीर्तिमान
2026-09-23
-
पीली पड़ रही धान की फसल पर बारिश मेहरबान, महंगाई के कारण नहीं हुई सिंचाई
2026-09-23
-
कुलंजन की खेती के कई फायदे, आमदनी का श्रोत है फसल की जड़
2026-09-20
-
किसान और गरुड़ पक्षी में निभ रही दोस्ती, मक्का अब हो गया सुरक्षित
2026-09-20
-
खेत की मिट्टी को केंचुए का इंतजार, फसलों में कमजोर हो रही पैदावार
2026-09-20
-
एक साथ कई लाभ वाली फसल है जौ, बीज पर भी लें अनुदान
2026-09-19
-
असम के बक्सा में हाथी-बाघ पर आफत, जंगली घास छीन रही भोजन
2026-09-18
-
ड्रोन से खेतों के कीट मारेंगे किसान, जैविक खेती छोड़ी तो ब्लैक लिस्ट में नाम
2026-09-18
-
जोधपुर गया औरैया के 50 किसानोें का दल, पांच दिन सीखेंगे उन्नतखेती
2026-09-16