आयुर्वेद में खपाएंगे पहाड़ों में उगे पौधे, वैज्ञानिक देंगे संरक्षण का ज्ञान

खबर सार :-

शिमला जिले में सरकार के प्रयास से कृषि में अब औषधि वाले पौधे उगाए जाएंगे। यह आयुर्वेद में इस्तेमाल किए जाएंगे। इनको व्यापार मेें स्तेमाल करने के लिए तीन करार किए गए हैं।
शिमला में हुए तीन करार, पहाड़ों की खेती से कमाएंगे वैद्य और किसान

खबर विस्तार : -

 शिमला : हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों में उगने वाले पौधों में कुछ के दिन बहुरने वाले हैं। शिमला की पहाड़ियों में ज्यादातर जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। इन पौधों का मूल्य न होने से यह खरपतवार बनकर रह जाते हैं। खेतों में भी उनकी फसल की अच्छी कीमत नहीं मिलने से मन भरने लगता है। इन तमाम परेशानियों का हल निकाल लिया गया है। पूर्व की तरह अब ऐसा नहीं होगा। किसानों को छोटे-छोटे पौधों से बड़ा मुनाफा होने वाला है।

अपने ही देश के बाजार अच्छी कीमत देंगे

पहाड़ियों पर उगने वाली जड़ी बूटियों को सीधे बाजार में मौका मिल जाएगा। किसानों के लिए अपने ही देश के बाजार अच्छी कीमत देंगे। किसानों की कमाई के साथ ही औषधि पौधों को भी बाजार मिलने से बढ़ावा मिलेगा। राज्य मेडीसिनल प्लांट, आयुष बोर्ड विभाग के तीन किसानों और तीन औषधि कंपनियों के साथ त्रिपक्षी समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। हाल ही में शिमला में एक राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के अंतर्गत कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

इसमें यह समझौता हुआ था। कंपनियों की शर्तों के अनुसार, वह जो माल खरीदेंगे, उनकी गुणवत्ता फिट होनी चाहिए। त्रिपक्षीय समझौते में इसकी अवधि 3 वर्ष रखी गई है। जिन स्थानों से कंपनियां माल उठाएंगी, वहां का किराया वह खुद ही वहन करेंगी। इन स्थानों पर किसानों के लिए आवागमन की सुविधाएं बेहतर होंगी। कंपनियों को माल की सप्लाई के लिए आवागमन का ध्यान रखना होगा।

यह भी पढ़ें :  धान को मिल रहा अमृत वरदान, हथिया नक्षत्र में खरीफ से रबी तक फायदा

कंपनियों को माल किसान से खरीदना होगा

बाजार का तौर तरीका सामान्य दुकानों की तरह ही होगा। कंपनियों को माल किसान से खरीदना होगा और भुगतान भी वह सीधे किसान को ही करेंगी। शर्तों के अनुसार, करुण, कुटकी, सुगंध वाला, आदि की खरीद करेंगे। अन्य औषधि जड़ी बूटियां भी संबंधित कंपनियों को भेज सकेंगे।  समझौते के अनुसार राज्य मेडिसिनल प्लांट बोर्ड किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन का प्रशिक्षण देगा। साथ ही गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री और अच्छी खेती करने के तरीके भी बतायेगा।

किसान अपनी खेती की सुरक्षा के साथ ही उसकी उन्नतशील तरकीबों के बारे में अनुभवी लोगों का मार्गदर्शन पाएगा। जिन जड़ी बूटियों का विक्रय किया जाएगा, उनको प्रचलित बाजार मूल्य के अनुसार, बुवाई से पहले ही समझ लिया जाएगा। क्रय करने के लिए गुणवत्तापूर्ण फसल लेने की बात समझौते में कही गई है। इसके लिए किसी प्रकार का विवाद न उपजे, किसी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में नमूने का परीक्षण कराया जाएगा। इस खेती और व्यवसाय के संबंध में शिमला जिले के चिडग़ांव निवासी कृपाल सिंह का करार सोलन के एमएस करण सिंह वैद्य के साथ हुआ है। इस औषधि फार्मर सोसायटी से करीब 500 किसानों के जुड़ने की जानकारी दी गई है।

बड़े पैमाने पर चल रहा औषधि कृषि कारोबार

इन किसानों के बारे में बताया गया है कि ये चीढ़गांव से डोडराक्वार तक करीब 100 हेक्टेयर जमीन में अतिश, चौराह, कुटकी, करू, मधमेधा, सुगंधवाला, जड़धूप और चुखरी का संरक्षण करते हैं। इसके साथ ही कई और औषधि वाली फसल बोई जाती हैं। 10 से 15 लाख रुपये की कमाई सोसायटी सालाना करती है। इस व्यापार को अभी और लाभ मिल सकता है। सीधे कंपनी को बिक्री से कारोबार बढ़ने की संभावना है।

इसी तरह से चंबा जिले के तीसा क्षेत्र के लोभी राम का एमिल फार्मास्यूटिकल इंडिया लिमिटेड के साथ करार हुआ है। कंपनी से करीब 30 से 40 किसान जुड़े हैं। इसमें कुटकी, अतिश, जंगली लहसुन, सालम पाईया, कुठ और चौराह प्रमुख है। किसान इसकी खेती और उसका संरक्षण करते हैं। एक और समझौता लाहौल-स्पीति के टोग चंद ठाकुर का करार श्री धनवंतरी हर्बल प्राइवेट लिमिटेड, बद्दी के साथ हुआ है। यह कंपनी भी  20 से 25 बीघा क्षेत्र में औषधीय जड़ी-बूटियां वाली खेती के बल पर की जा रही है। कुठ, मनु, बनककड़ी, गुगल धूप, चुरा, गुलाबजल, कुटकी, कालाजीरा, चुली, चुखरी और सुगंध जैसी जड़ी-बूटियों की खेती की जा रही है। यह काम अभी और बढ़ सकता है।

यह भी पढ़ें : खेतों में न भरने दें पानी, वैज्ञानिकों की सलाह पर करें घनी फसल की निगरानी
 

अन्य प्रमुख खबरें