उत्तर प्रदेश की जेलों में कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य और अवसाद दूर करने के लिए 'RISE' कार्यक्रम शुरू, 75 कारागारों के अधिकारी हुए शामिल

खबर सार :-

उत्तर प्रदेश की 75 जेलों में बंदियों का तनाव दूर करने और आत्महत्या रोकने के लिए RISE कार्यक्रम शुरू। KGMU के विशेषज्ञों ने जेल अधिकारियों को दी ट्रेनिंग।
UP Jail RISE Program: कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए नई पहल

खबर विस्तार : -

Lucknow:उत्तर प्रदेश के कारागार विभाग ने राज्य की जेलों में निरुद्ध बंदियों की मानसिक स्थिति को बेहतर करने, उनके तनाव को घटाने और आत्महत्या जैसी घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाने के उद्देश्य से एक विशेष मुहिम शुरू की है। सोमवार को लखनऊ स्थित कारागार मुख्यालय में 'राइज' (Reduce Inmate Suicide and Emotional Distress - RISE) नाम से एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए प्रदेश के कारागार मंत्री दारा सिंह चौहान ने दीप जलाकर सत्र की शुरुआत की। इस राज्यस्तरीय बैठक में उत्तर प्रदेश की सभी 75 जेलों के जेल अधीक्षक, जेलर, डिप्टी जेलर और वरिष्ठ विभागीय अधिकारियों ने हिस्सा लिया, जहाँ विशेषज्ञों ने बंदियों के पुनर्वास और मानसिक परामर्श की नई रूपरेखा साझा की।

मुख्य अतिथि के रूप में कारागार कर्मियों और अधिकारियों को संबोधित करते हुए जेल मंत्री दारा सिंह चौहान ने कहा कि जेलों के भीतर बंदियों के साथ बहुत ही सहज और सरल भाषा में संवाद स्थापित करना समय की मांग है। जेल में लंबे समय तक रहने के कारण कैदियों में अक्सर अकेलापन और अवसाद देखने को मिलता है। इसे दूर करने के लिए केवल बाहरी काउंसलर्स ही नहीं, बल्कि जेल के अपने कर्मचारियों का प्रशिक्षित होना आवश्यक है। चूंकि जेल स्टाफ हर दिन बंदियों की दिनचर्या और उनके व्यवहार को करीब से देखता है, इसलिए यदि जेल कर्मियों की क्षमता बढ़ाई जाए तो वे मानसिक रूप से परेशान कैदियों की पहचान समय रहते कर सकते हैं। इससे बंदियों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के प्रयासों को सही दिशा मिलेगी।

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सकारात्मक माहौल और जीवनशैली में बदलाव पर जोर

राज्य की जेलों में सुधारात्मक कदम उठाने की जानकारी देते हुए मंत्री ने बताया कि बंदियों को तनावमुक्त रखने के लिए जेलों के भीतर कई तरह की गतिविधियां चलाई जा रही हैं। जेल परिसर में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहारों का आयोजन किया जा रहा है। इसके साथ ही नियमित रूप से योग सत्र, खेलकूद प्रतियोगिताएं, श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ और कौशल विकास के काम सिखाए जा रहे हैं। इन आयोजनों का मकसद जेलों के भीतर एक सकारात्मक वातावरण तैयार करना है, ताकि बंदी खुद को अलग-थलग न महसूस करें और उनका ध्यान रचनात्मक कार्यों में लगा रहे।

मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर सख्त पहल

कार्याशाला में मौजूद कारागार महानिदेशक पी.सी. मीना ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि जेलों में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ वहां रह रहे लोगों के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक संतुलन का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है। 'राइज' कार्यक्रम की रूपरेखा इसी सोच के साथ तैयार की गई है। इस व्यवस्था के माध्यम से कैदियों के व्यवहार में आ रहे बदलावों, मानसिक तनाव और भावनात्मक समस्याओं को शुरुआती दौर में ही पहचान लिया जाएगा। इसके बाद जरूरत के हिसाब से संबंधित बंदी को तुरंत परामर्श (काउंसलिंग) और चिकित्सकीय मदद दी जाएगी, जिससे किसी भी तरह के बड़े हादसे को रोका जा सके।

केजीएमयू के विशेषज्ञों ने बताए पहचान के तरीके

कार्यक्रम के पहले तकनीकी सत्र में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के विशेषज्ञों ने जेल अधिकारियों को विस्तृत जानकारी दी। केजीएमयू के 'राइज' कार्यक्रम के प्रमुख शोधकर्ता (Principal Investigator) डॉ. राजीव मिश्रा ने एक प्रस्तुति (Presentation) के जरिए इस पूरी परियोजना के लक्ष्यों, काम करने के तरीकों और इससे होने वाले फायदों के बारे में समझाया। इसके बाद दिव्यांशी सिंह ने 'राइज डैशबोर्ड' (RISE Dashboard) का प्रदर्शन किया। यह एक डिजिटल प्रणाली है जिसके जरिए प्रदेश की सभी जेलों में चल रहे काउंसलिंग कार्यों, बंदियों की प्रगति और निगरानी की पूरी रिपोर्ट ऑनलाइन देखी जा सकेगी।

चिकित्सकीय दृष्टिकोण रखते हुए केजीएमयू के ट्रॉमा सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. संदीप चौधरी ने मानसिक तनाव के लक्षणों पर बात की। उन्होंने बताया कि जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक अवसाद में रहता है तो उसके व्यवहार में बदलाव आने लगते हैं। जेल अधिकारियों को यह समझना होगा कि किन लक्षणों को देखकर तुरंत डॉक्टरी सलाह या काउंसलर की मदद लेनी है। समय पर मिला परामर्श किसी व्यक्ति की जान बचा सकता है।

अधिकारियों के सवालों का समाधान और भावी रणनीति

दोपहर बाद आयोजित दूसरे सत्र में एक संवादात्मक बैठक हुई, जिसमें राज्यभर से आए जेल अधीक्षकों और जेलरों ने अपने व्यवहारिक अनुभव साझा किए। अधिकारियों ने जेलों में काउंसलिंग की व्यावहारिक चुनौतियों, कर्मचारियों की कमी और इस कार्यक्रम को जमीनी स्तर पर लागू करने से जुड़े सवाल पूछे। मंच पर मौजूद चिकित्सा विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों ने इन सभी सवालों के जवाब दिए और स्पष्ट निर्देश दिए कि 'राइज' पहल को हर जेल में प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जाए।

सत्र के समापन पर कार्यक्रम में आए सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र बांटे गए। इस अवसर पर कारागार विभाग की ओर से जेल मंत्री को स्मृति-चिह्न देकर सम्मानित भी किया गया। विभाग के उप महानिरीक्षक सुभाष चंद्र शाक्य ने आए हुए अतिथियों, केजीएमयू की टीम, मनोवैज्ञानिकों और सभी जेल अधिकारियों का धन्यवाद जताया। कार्यक्रम में अपर महानिरीक्षक धर्मेंद्र सिंह, पुलिस उप महानिरीक्षक प्रदीप गुप्ता, उप महानिरीक्षक डॉ. रामधनी और पी. एन. पांडेय सहित विभाग के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। उत्तर प्रदेश के कारागार विभाग में पिछले कुछ वर्षों से जेलों को केवल सजा काटने की जगह के बजाय 'सुधार गृह' के रूप में विकसित करने की दिशा में काम चल रहा है। जेलों के भीतर बंदियों द्वारा आत्महत्या या आपस में हिंसक झड़पों की घटनाओं को देखते हुए मानवाधिकार आयोग और अदालतों द्वारा समय-समय पर मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के निर्देश दिए जाते रहे हैं।

इससे पहले भी प्रदेश की विभिन्न जेलों में स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय डॉक्टरों की मदद से योग शिविर और अध्यात्म के कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं। हालांकि, किसी मेडिकल विश्वविद्यालय (जैसे केजीएमयू) के सहयोग से प्रदेश की सभी 75 जेलों के लिए एक केंद्रीकृत मानसिक स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली (RISE) तैयार करने और उसके लिए डिजिटल डैशबोर्ड बनाने का यह पहला व्यवस्थित प्रयास है। 'राइज' कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके जेलों में तनावमुक्त माहौल बनाना और असामयिक मौतों पर अंकुश लगाना है।

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