केजीएमयू में 9वीं आर्थ्रोस्कोपी कॉन्क्लेव संपन्न: 50 से अधिक डॉक्टरों ने सीखा रिवर्स शोल्डर रिप्लेसमेंट का तरीका

खबर सार :-

केजीएमयू के ऑर्थोपेडिक सर्जरी विभाग में दो दिवसीय 9वीं आर्थ्रोस्कोपी कॉन्क्लेव और कैडेवरिक कार्यशाला में देशभर से आए 50 से अधिक डॉक्टरों को कंधे की चोटों के इलाज और रिवर्स शोल्डर रिप्लेसमेंट का प्रशिक्षण दिया गया।
KGMU आर्थ्रोस्कोपी कॉन्क्लेव 2026: रिवर्स शोल्डर रिप्लेसमेंट ट्रेनिंग

खबर विस्तार : -

लखनऊ: लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के ऑर्थोपेडिक सर्जरी विभाग द्वारा आयोजित 9वीं केजीएमयू आर्थ्रोस्कोपी कॉन्क्लेव और 9वीं कैडेवरिक कार्यशाला का रविवार को समापन हो गया। इस दो दिवसीय आयोजन में विशेष रूप से कंधे की आर्थ्रोस्कोपी और कैडेवरिक अभ्यास पर ध्यान केंद्रित किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य रोटेटर कफ की चोटों, बार-बार कंधा उतरने की समस्या और कंधे के जोड़ को बदलने की आधुनिक विधियों, विशेष रूप से 'रिवर्स शोल्डर रिप्लेसमेंट' तकनीक पर देश भर के चिकित्सा विशेषज्ञों को व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना था। यह पूरा कार्यक्रम केजीएमयू की कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद के दिशा-निर्देश में आयोजित किया गया। उन्होंने मरीजों की देखभाल की गुणवत्ता बढ़ाने और डॉक्टरों के कौशल को लगातार बेहतर बनाने के लिए ऐसे अभ्यासों को बढ़ावा दिया है।

खिलाड़ियों और सैनिकों के लिए आर्थ्रोस्कोपी बेहद फायदेमंद

आयोजन के अध्यक्ष प्रोफेसर आशीष कुमार ने कार्यक्रम के दौरान बताया कि हाल के सालों में देश में खेल गतिविधियों में लोगों की रुचि और भागीदारी बढ़ी है। इसके साथ ही खिलाड़ियों में हड्डियों, मांसपेशियों और लिगामेंट से जुड़ी चोटें भी अधिक देखने को मिल रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि खिलाड़ियों के इलाज का मुख्य लक्ष्य केवल चोट को ठीक करना नहीं होता, बल्कि उन्हें पूरी तरह से फिट करके सुरक्षित रूप से खेल के मैदान में वापस भेजना होता है।

उन्होंने आगे बताया कि आर्थ्रोस्कोपी या 'की-होल सर्जरी' खिलाड़ियों और सुरक्षा बल के जवानों के लिए काफी उपयोगी साबित हो रही है। इन दोनों ही क्षेत्रों के लोगों को अपनी शारीरिक क्षमताओं को बनाए रखने के लिए जल्द से जल्द अपनी ड्यूटी या खेल पर लौटना होता है। इस आधुनिक तकनीक से सर्जरी करने पर शरीर में बहुत छोटे चीरे लगाने पड़ते हैं। इससे अंदरूनी ऊतकों को कम नुकसान पहुंचता है, सर्जरी के बाद दर्द कम होता है और मरीज बहुत तेजी से ठीक होकर अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस लौट पाता है।

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कंधे के जटिल इलाज के लिए रिवर्स शोल्डर रिप्लेसमेंट तकनीक

आयोजन के सचिव प्रोफेसर कुमार शांतनु ने कंधे के इलाज की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला में 'रिवर्स शोल्डर रिप्लेसमेंट' तकनीक पर विशेष सत्र रखे गए। भारत सहित पूरी दुनिया में इस तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और सही मरीजों में इसके परिणाम काफी अच्छे देखे गए हैं।

यह तकनीक उन मरीजों के लिए एक नया जीवन लेकर आती है जिनका रोटेटर कफ पूरी तरह खराब हो चुका हो या जिन्हें गंभीर अर्थराइटिस (गठिया) की समस्या हो। आम तौर पर किए जाने वाले शोल्डर रिप्लेसमेंट में ऐसे मरीजों को पूरा लाभ नहीं मिल पाता, क्योंकि कंधे की सामान्य हलचल में रोटेटर कफ की मुख्य भूमिका होती है। रिवर्स शोल्डर रिप्लेसमेंट में कंधे की बॉल और सॉकेट की बनावट की जगह को आपस में बदल दिया जाता है। इस बदलाव से कंधे की दूसरी मांसपेशी (डेल्टॉयड मसल) की मदद से हाथ को आसानी से उठाया और घुमाया जा सकता है। प्रोफेसर शांतनु ने कहा, "रिवर्स शोल्डर रिप्लेसमेंट अब केवल अधिक उम्र के मरीजों तक सीमित नहीं रह गया है। यह कंधे की जटिल समस्याओं से जूझ रहे अलग-अलग उम्र के मरीजों के लिए इलाज का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और असरदार विकल्प बन चुका है।"

कैडेवरिक प्रशिक्षण से डॉक्टरों को मिला व्यावहारिक अनुभव

कंधे की बनावट बेहद जटिल होती है, इसलिए इसकी सर्जरी के लिए बहुत अधिक सावधानी और सटीकता की आवश्यकता होती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कैडेवरिक प्रशिक्षण यानी मानव शरीर के अंगों पर अभ्यास का विशेष महत्व है। इस प्रशिक्षण के दौरान युवा और नया सीख रहे डॉक्टरों को मानव शरीर की असली बनावट पर सर्जरी करने की सही जगह, कट लगाने के तरीके और उपकरणों के सही इस्तेमाल का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ। इस राष्ट्रीय कार्यशाला में दिल्ली, मुंबई और देश के कई प्रमुख चिकित्सा संस्थानों से आए वरिष्ठ आर्थ्रोस्कोपी विशेषज्ञों ने अध्यापकों के रूप में अपना योगदान दिया। देश के लगभग हर राज्य से आए 50 से अधिक प्रतिभागी डॉक्टरों ने इसमें भाग लिया और सर्जरी की बारीकियों को समझा।

विश्वविद्यालय की रैंकिंग और शिक्षा स्तर में सुधार

केजीएमयू के मीडिया प्रभारी प्रोफेसर के.के. सिंह ने बताया कि इस तरह की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कार्यशालाएं किसी भी मेडिकल संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता को दर्शाती हैं। इनसे विश्वविद्यालय के शिक्षकों और डॉक्टरों का ज्ञान और कौशल बढ़ता है। प्रोफेसर सिंह ने कहा, "यह आयोजन केवल नई सर्जिकल तकनीक सिखाने तक सीमित नहीं है। यह केजीएमयू की शैक्षणिक छवि को मजबूत करता है। इससे नैक (NAAC) मूल्यांकन में विश्वविद्यालय के बेहतर प्रदर्शन में मदद मिलती है और एनआईआरएफ (NIRF) रैंकिंग में भी संस्थान का स्थान सुधरता है।" ऑर्थोपेडिक विभाग के अध्यक्ष ने बताया कि उनका विभाग नियमित रूप से इस तरह के राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करता रहता है। इसका उद्देश्य नई तकनीक को बढ़ावा देना और केजीएमयू को हड्डी रोग की सर्जरी के प्रशिक्षण का एक बड़ा केंद्र बनाना है। उन्होंने एनाटॉमी विभाग के सहयोग की भी सराहना की, जिसके बिना इस कैडेवरिक अभ्यास का आयोजन संभव नहीं था।

किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) का ऑर्थोपेडिक सर्जरी विभाग उत्तर भारत में हड्डी और जोड़ों के आधुनिक इलाज के लिए जाना जाता है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हर साल नई तकनीकें आ रही हैं, जिनमें बिना बड़ा चीरा लगाए की जाने वाली 'की-होल सर्जरी' (आर्थ्रोस्कोपी) प्रमुख है। पहले जहां कंधे और घुटने की गंभीर चोटों के बाद मरीजों को ठीक होने में कई महीने लग जाते थे, वहीं अब आर्थ्रोस्कोपी और नई रिप्लेसमेंट तकनीकों की मदद से मरीज बहुत कम समय में ठीक हो जाते हैं।

केजीएमयू पिछले कई वर्षों से लगातार कैडेवरिक कार्यशालाओं का आयोजन कर रहा है। इन आयोजनों का मुख्य मकसद देश भर के युवा सर्जनों को आधुनिक तकनीकों का सीधा प्रशिक्षण देना है ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर मरीजों को बेहतर और सुरक्षित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करा सकें। इस वर्ष की 9वीं आर्थ्रोस्कोपी कॉन्क्लेव का समापन "कौशल को बढ़ाना, इलाज को बेहतर बनाना" के संकल्प के साथ हुआ, जिससे आने वाले समय में खेल चोटों से पीड़ित खिलाड़ियों और जटिल जोड़ों के दर्द से जूझ रहे मरीजों को सीधा लाभ मिलेगा।

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