यूपी में बांसकार समाज के हुनर को मिलेगा व्यापक बाजार, सरकार करेगी हरसंभव सहयोगः ब्रजेश पाठक
खबर सार :-
उत्तर प्रदेष में बांस का उपयोग बढ़ने से पर्यावरण संरक्षण के साथ रोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण को मिलेगा बढ़ावा। सरकार इसके बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। यह बात आज उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ने कही है।
खबर विस्तार : -
लखनऊ, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने बांस को भारत की समृद्ध लोक परंपरा, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बताया है। उन्होंने कहा कि बांसकार समाज ने पीढ़ियों से अपनी मेहनत, हुनर और कारीगरी के माध्यम से इस परंपरा को जीवंत रखा है। उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक बुधवार को लखनऊ में अखिल भारतीय बांसकार महासंघ के तत्वावधान में आयोजित ‘बांसकार समाज महासम्मेलन’ को संबोधित कर रहे थे।
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उन्होंने समाज के लोगों का उत्साह बढ़ाया और कहा कि आवश्यकता है कि इस पारंपरिक कौशल को आधुनिक तकनीक और बाजार से जोड़कर बांसकार समाज के लिए रोजगार एवं आर्थिक उन्नति के नए अवसर सृजित किए जाएं। उत्तर प्रदेश में बांस की वस्तुएं आज भी बड़े पैमाने पर बिक रही हैं। इनको उद्योग के स्वरूप तक पहुंचानेे के लिए सरकार से मांग की जा रही है।
बांस का उपयोग बढ़ने से पर्यावरण को लाभ होगा
आज भी माना जा रहा है कि यदि उत्तर प्रदेश में बांस का उपयोग बढ़े तो इससे पर्यावरण का संरक्षण होगा और इसके साथ ही रोजगार के नए द्वार खुल सकते हैैं। इसके अलावा आर्थिक सशक्तिकरण को भी बांस के चलन से बढ़ावा मिल सकता है। डिप्टी सीएम ने समाज के लोगों से कहा है कि सरकार इसके बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। बांस की उपयोगिता पर संदेह नहीं किया जा सकता है। आज जहां नदियों पर पुल बने हुए हैं, कभी उनसे निकलने का रास्ता बांस ही से बनाया जाता था।
खुद इस बात को श्री पाठक ने कहा कि जन्म से लेकर जीवन के विभिन्न संस्कारों तक बांस का उपयोग हमारी सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। यह किसी भी परिपेक्ष्य मे कहा हो, लेकिन बांस झूले में, चूल्हे में, खप्पर में छप्पर में चारपाई में सगाई में बांस का उपयोग किया जाता है। समय बदला जरूर है, लकिन बांस पारंपरिक उपयोग से आगे बढ़कर पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन का प्रभावी माध्यम बन सकता है। इस बात को भी याद रखना होगा।
प्लास्टिक पर से लोगों की निर्भरता कम पड़ जाएगी
हम इससे दूर हुए तो नुकसान भी उठाया है। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती है और बांस इसका प्राकृतिक एवं पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बन सकता है। उन्होंने इतिहास याद करा दिया और कहा कि बांस से बोतल भी बनती रही है। इसके आकर्षक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। कारीगरी की चीजें इसमें भी उपलब्ध हैं। सरकार की ओर से बृजेष पाठक ने कहा कि केंद्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार बांस के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर रही है। इसके अंतर्गत पारंपरिक हुनर को आधुनिक बाजार से जोड़ा जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में सरकार पारंपरिक व्यवसाय जैसे मिट्टी के दीपक, बर्तन और मूर्तियां बनाने के लिए योजनाओं का लाभ दे रही है। इनको और प्रोत्साहन की जरूरत है। यह सरकारी योजना है। जब तक जमीन पर उसे लागू नहीं किया जाएगा, बांस आधारित उत्पादों और उद्योग बड़े स्तर पर नहीं होगा। उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने बांसकार समाज की कारीगरी की सराहना की। कहा कि हमारी सांस्कृतिक विरासत है। इसको सहेजने की जरूरत बताई है।
उत्पादों की विक्री होने से रोजगार के नए द्वार खुलेंगे
नई पीढ़ी को इससे जोड़ना और कारीगरों को उचित बाजार उपलब्ध कराने पर उन्होंने जोर दिया है। दरअसल, इस कार्यक्रम में विधायक एवं अध्यक्ष, राज्य सफाई कर्मचारी आयोग डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल, असम के अध्यक्ष, राज्य सफाई कर्मचारी आयोग बैजनाथ बांसफोड़, पूर्व विधायक एवं अध्यक्ष, बांस शिल्प कला बोर्ड, मध्य प्रदेश घनश्याम पीरोनिया, प्रदेश अध्यक्ष, डॉ. अंबेडकर महासभा प्रमोद सरोज, मंत्री, डॉ. अंबेडकर महासभा ट्रस्ट अमरनाथ प्रजापति, परदेसी प्रसाद वर्मा ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए उपमुख्य मंत्री से यह मांग की कि कई कार्याें में एक ही जगह पर इसको पाया जा सकता है।
इसके अन्य वस्तुओं से लाभ ज्यादा हैं। इसके बाद भी यह हमसे दूर हो रहा है। सरकार इसकी रक्षा के लिए प्रयास करे। सम्मेलन में बांसकार समाज की ओर से रखी गई विभिन्न मांगों और सुझावों का उल्लेख भी हुआ है। बांस का उपयोग लाभकारी है। इसके उदाहरण भी हैं। कभी यह गांवों में टेंट व्यवसाय में इस्तेमाल किया जाता था। आज हम लोहे की पाइप में उसे देखते हैं। यह उस पाइप से ज्यादा मजबूत है। उससे सस्ता है। टिकाऊ है, इसके बाद भी लोग बांस से दूर हो रहे हैं।
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