Mritunjay Dixit
बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम आ चुके हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को अपेक्षा से कहीं अधिक बहुमत मिला है। नई सरकार के गठन की प्रक्रिया आरम्भ हो सके इसके लिए नीतीश जी अपना त्यागपत्र सौंप चुके हैं। राजग गठबंधन में सहयोगी रहे छोटे दलों की शक्ति में वृद्धि हुई है जबकि महागठबंधन में शामिल अधिकांश दलों और बहु प्रचारित जनसुराज की स्थिति खस्ता है। राजग गठबंधन में शामिल सभी दल चुनाव परिणामों को नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जोड़ी व सुशासन का कमाल कह रहे हैं वहीं महागठबंधन में शामिल सभी इन चुनाव परिणामों को वोट चोरी और चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर ख़ारिज करते दिखाई दे रहे हैं।
राजग की ऐतिहासिक विजय को मजबूत करने में चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोजपा, जीतन राम मांझी की हम और उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चिराग पासवान की पार्टी ने 29 सीटों पर चुनाव लड़ा और 65.2 प्रतिशत स्ट्राइक रेट के साथ 19 सीटों पर विजय प्राप्त करके बिहार के छोटे दलों की राजनीति में अपना बड़ा स्थान बना लिया। जीतन राम मांझी के नेतृत्व वाली पार्टी हम ने 83.3 प्रतिशत स्ट्राइक रेट के साथ 6 में से 5 सीटों पर विजय प्राप्त की और उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो ने भी अपना करिश्मा दिखाते हुए 66.6 प्रतिशत स्ट्राइक रेट के साथ 6 में से 4 सीटों पर विजय प्राप्त की।
राजग गठबंघन में शामिल चिराग पासवान जो स्वयं को प्रधानमंत्री मोदी का हनुमान कहते हैं, वह इस बार मोदी जी के मार्गदर्शन में तेजी से चमके हैं। विगत 2020 के चुनावों मे उन्होने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए 137 सीटों पर चुनाव लड़ा था और राजग गठबंधन को मुसीबत में डाल दिया था। इस बार हुए उन्होंने सूझ बूझ दिखाते प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में नीतीश जी के साथ खड़े होकर चुनाव लड़ा तो वातावरण बदल गया और राजग गठबंधन को पासवान समाज के एकमुश्त वोट मिलते चले गए।
जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने वीआईपी नेता मुकेश साहनी के साथ मछली पकड़ने के लिए तालाब में डुबकी लगाई तो महागठबंधन में शामिल कांग्रेस सहित सभी छोटे दलों के भाग्य का सितारा भी डूब गया। जो मुकेश साहनी उपमुख्यमंत्री पद के लिए तेजस्वी और राहुल गांधी के साथ झगड़ा कर रहे थे उनकी जमानत तक जब्त हो गई । उनका स्ट्राइक रेट 0 हो गया । वह 15 सीटों पर चुनाव लड़े और सभी हार गए। यही हाल कम्युनिस्ट पार्टियों का भी रहा । उनका ग्राफ भी पहले से बहुत अधिक गिर गया क्योंकि बिहार अब माओवादी आतंकवाद से मुक्त हो रहा है तथा उनके क्षेत्रों में विकास गति पकड़ रहा है।
चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर अपनी जनसुराज पार्टी के माध्यम से बिहार के युवाओं के लिए व्यापक बदलाव की बातें कर रहे थे और चर्चा का केंद्र बिंदु भी बने रहे किंतु फिर परिदृश्य से बुरी तरह से गायब ही हो गए ।प्रशांत किशोर ने मुख्यमंत्री बनने के लिए युवाओ को भड़काने का असफल प्रयास किया, मुस्लिम तुष्ठिकरण करने के लिए हरा गमछा और टोपी धारण कर ली, वक्फ कानून का विरोध किया किंतु सभी कुछ अप्रभावी रहा। बिहार की जनता ने उन्हें पूरी तरह से खारिज कर दिया।
बिहार के चुनावों में कई अन्य दल भी अपनी किस्मत आजमा रहे थे जिसमें बहिन मायावती के नेतृत्व वाली बसपा ने पहली बार राज्य की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 1.62 प्रतिशत मत प्राप्त किये और एक सीट पर मात्र 30 वोट से रोमांचंक विजय प्राप्त करने में सफलता प्रात की। ओवैसी की पार्टी एआइएमआइए के साथ गठबंधन न करने के कारण इस बार महागठबंधन को बहुत तीखा नुकसान उठाना पड़ा । ओवैसी ने 2020 विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी पांच सीट जीतकर महागठंबंघन को अपनी ताकत का एहसास करा दिया। बिहार चुनावों में इस बार लालू परिवार की फूट भी परिणामों का एक कारक बनी । तेज प्रताप यादव ने अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा जिससे परिवार समर्थक दो धड़ों में बंट गए । आम आदमी पार्टी बिहार में 81 सीटों पर चुनाव लड़ी और सभी पर उसकी जमानत जब्त हो गई। यूपी के कुछ छोटे दल भी बिहार में भाग्य आजमाने गए थे उनका हाल भी बुरा रहा।
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