Hari Mangal
बांग्लादेश में आगामी 12 फरवरी को होने वाले 13वें संसदीय चुनाव के लिये नामांकन पत्र दाखिल किये जा चुके हैं। नामांकन पत्रों की जांच सहित अन्य प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद 20 जनवरी को नाम वापस लिये जा सकेंगे। मतदान 12 फरवरी को होना है परन्तु चुनाव की घोषणा के बाद बांगलादेश में बदलते हालात और कटघरें में खड़ी होती सरकार के कारण निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव पर संशय बढता जा रहा है।
अनिश्चितता और आशंकाओं के बीच जब संसदीय चुनावों की घोषणा हुयी तो वैश्विक स्तर पर कयास लगाये गये कि नोबल पुरस्कार विजेता और अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में चल रही अंतरिम सरकार जनभावनाओं के अनुरुप पारदर्शितापूर्ण चुनाव करायेगी लेकिन चुनावी घोषणा के बाद जिस तरह से बांग्लादेश के हालात बदले वह यह बताने के लिये पर्याप्त है कि सरकार कट्टरपंथियों के दबाव में काम कर रही है। चुनाव घोषणा के अगले दिन जुलाई 2024 के छात्र आन्दोलन के अग्रणी नेताओं में से एक शरीफ उस्मान हादी को बिजोयनगर में गोली मार दी गई। 32 वर्षीय हादी इंकलाब मंच का सक्रिय सदस्य था तथा आगामी संसदीय चुनाव में वह ढाका-8 संसदीय सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था। इलाज के बीच 18 दिसम्बर को हादी की सिंगापुर के एक अस्पताल में मौत हो गई। हादी की मौत के बाद बांग्लादेश की राजधानी सहित अनेक स्थानों पर हिंसा,आगजनी और अराजकता फैल गई। इस हिंसा में अल्पसंख्यक हिन्दुओं, दो मीडिया संस्थानों सहित कई अन्य संस्थानों,भवनों को निशाना बनाया गया।
5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के बाद गठित कार्यकारी सरकार का रुख भारत विरोधी बना हुआ है। इसके पीछे दो महत्वपूर्ण कारण है। पहला शेख हसीना को भारत में शरण मिलना और मृत्युदंड की सजा मिलने के बाद भी प्रत्यार्पण न करना तथा दूसरा बांग्लादेश में चीन, पाकिस्तान के साथ ही जमाते-ए-इस्लामी जैसे कट्टपंथियों का सरकार में बढता बढता प्रभाव। 18 दिसम्बर को हादी की मौत के बाद बांग्लादेश के अल्पसंख्यक इसलिये निशाना बनाये गये क्योंकि सोशल मीडिया पर प्रचार किया गया कि हादी के हत्यारे भारत में प्रवेश कर गये हैं। सरकार की रहस्यमय चुप्पी ने इसे और हवा दी लेकिन जब वैश्विक स्तर पर जब सरकार की आलोचना शुरु हुई तो जांच में लगी पुलिस ने कहा कि अभी वह इस पर कुछ नहीं कह सकते हैं। मामला थोड़ा ठंढ़ा पडता उसके पहले पुलिस ने कहा कि हादी के हत्यारे मेघालय के रास्ते भारत चले गये हैं। यद्यपि मेघालय के बीएसएफ अधिकारी और आई.जी पुलिस ने इसका खंडन करते हुये झूठा आरोप करार दिया।
भारत और बांग्लादेश के बीच चल रहे आरोप-प्रत्यारोप के बीच हादी के भाई शरी्फ उमर हादी ने इकबाल मंच द्वारा आयाजित एक कार्यक्रम में अंतरिम सरकार की आलोचना करते हुये कहा कि उस्मान हादी की हत्या सरकार ने करवायी है, अब इसे मुद्दा बना कर चुनाव टालने की कोशिश की जा रही है। उमर हादी ने साफतौर कहा कि मोहम्मद यूनुस सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है और सुरक्षा प्रदान करने में विफल रहने के लिये अंततः उसे मुकदमें का सामना करना पड़ेगा चाहे आज अथवा एक दशक बाद। हादी के भाई उमर हादी के बयान के चंद दिनों बाद हादी का हत्यारोपी फैसल करीम मसूद ने एक वीडियो जारी कर खुद को दुबई में बताते हुये कहा कि हादी की हत्या में जमात-ए-इस्लामी का हाथ है। मसूद ने अपनी भूमिका से इन्कार करते हुये कहा कि वह बांग्लादेश में नहीं दुबई में है। उसके परिवार को राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। फिलहाल इस वीडियो के वायरल होने के बाद अंतरिम सरकार का भारत विरोधी दुष्प्रचार एक बार फिर बेनकाब हो गया है।
यूसुफ सरकार पर कट्टरपंथियों के दबाब में काम करने का आरोप लगता रहा है। इससे भारत ही नहीं बांग्लादेश के राजनीतिक दल भी पीड़ित है। निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराये जाने के मुख्य चुनाव आयुक्त के तमाम दावों के बीच बांग्लादेश वर्कर्स पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया है। पार्टी के केन्द्रीय समिति ने एक प्रस्ताव पारित करके कहा है कि उसने पहले चुनाव लड़ने की योजना बनाई थी क्योंकि उसे भरोसा था कि भयमुक्त वातावरण, सभी राजनैतिक दलों को समान अवसर के साथ ही मतदाताओं, उम्मीदवारों को पर्याप्त सुरक्षा मिलेगी लेकिन देश में घटती घटनाओं ने चुनाव पर अनिश्चितता का माहौल बना दिया है। चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि वह राजनीतिक दबाव के चलते निष्पक्षता बनाये रखने में विफल है। पार्टी की ओर से बताया गया कि राजनैतिक दल के रूप में पंजीकृत होने के बावजूद उनके केन्द्रीय कार्यालय पर सरकार समर्थित भीड़ का कब्जा है लेकिन चुनाव आयोग, पुलिस प्रशासन, सेना तथा अदालतों को याचिकायें दिये जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
मुख्य चुनाव आयुक्त नसीरुद्दीन भले ही दावा कर रहे हैं कि संसदीय चुनाव लोकतंत्र के स्थापित मानदंडों के अनुरूप और पारदर्शी होंगे लेकिन सरकार के निर्णय इस पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। अंतरिम सरकार बनने के तीन सप्ताह बाद ही 28 अगस्त 2024 को जमात-ए-इस्लामी, उसके छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिविर और अन्य संगठनों पर लगी पाबंदी हटा ली गई। जमात-ए-‘इस्लामी संगठन पर शेख हसीना सरकार ने 2013 में आतंकवाद विरोधी कानून के तहत पाबंदी लगाई थी और 2023 में बांग्लादेश की सर्वोच्च अदालत ने जमात के चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। दरअसल जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामी राजनीतिक पार्टी है जो सदैव से भारत की विरोधी रही है। 6 दिस्मबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद गिराये जाने के बाद जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों और उसके छात्र संगठन ने बांग्लादेश में व्यापक पैमाने पर हिंसा और विरोध प्रदर्शन करते हुये हिन्दुओं उनकी सम्पत्तियों तथा मंदिरों को निशाना बनाया था। अब 2026 के संसदीय चुनाव में जमात-ए-इस्लामी के साथ नेशनल सिटिजन पार्टी भी आ गई है जो पिछले वर्ष शेख हसीना के विरुद्ध चले आन्दोलन के नेतृत्व वाले छात्र नेताओं ने बनाई है। अब जमात फिलहाल मजबूत स्थिति में है।
बांग्लादेश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी आवामी लीग पर मई 2025 पर प्रतिबंध लगा दिया गया। दरअसल जुलाई-अगस्त 2024 में हुये आन्दोलन और विरोध प्रदर्शन के बीच बांग्लादेश में सरकार गिरने के बाद शेख हसीना ने देश छोड़ दिया। इसी बीच मई 2025 में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने एंटी-टेररिज्म एक्ट के तहत शेख हसीना की आवामी लीग पार्टी की गतिविधियों पर रोक लगा दी। इसी आधार पर चुनाव आयोग ने भी पार्टी का पंजीकरण निलंबित कर दिया। अंतरिम सरकार ने दावा किया कि 2024 में देश में हुये हिंसक प्रदर्शन के लिये आवामी लीग के लोग जिम्मेदार हैं। स्थानीय स्तर हुये प्रदर्शन के बाद सरकार की ओर से साफ कर दिया गया है कि आम चुनावों में आवामी लीग हिस्सा नहीं ले सकेगी क्योंकि उसकी गतिविधियों पर प्रतिबंध है तथा पंजीकरण निलंबित है। सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रतिबंध हटाने पर विचार नहीं किया जा रहा है। ऐसे में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेटे और आवामी लीग के प्रमुख रण्नीतिकार सजीब वाजेद का कहना कि बांग्लादेश के चुनाव में आवामी लीग को बाहर रखना कोई सुधार नहीं अपितु लोकतंत्र को कमजोर करने की सोची समझी रणनीति है, सच के करीब लगता हैं
अब चुनाव में 42 दिन का समय बचा हुआ है लेकिन जिस तरह से अंतरिम सरकार कट्टरपंथियों के दबाव में निर्णय ले रही है उससे यह तो स्पष्ट है कि आने वाला समय बांग्लादेश की राजनीति के लिये बहुत शुभ नहीं होगा। आवामी लीग चुनाव से बाहर रही, जिसकी अब पूरी सम्भावना है, तो आने वाले समय में देश में विरोध प्रदर्शन, हिसां और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ सकता है।
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