सोमनाथ से सत्ता तक: आस्था की राजनीति और भाजपा का स्थायी प्रयोग

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आडवाणी की रथ यात्रा से लेकर मोदी की सोमनाथ यात्राओं तक, भाजपा ने इस मंदिर को अपनी वैचारिक निरंतरता का आधार बनाया है। यह गठजोड़ किसी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं, लेकिन हर चुनावी मौसम में, हर राष्ट्रवादी भाषण में उसकी उपस्थिति साफ दिखाई देती है। जब तक आस्था राजनीति की सबसे असरदार भाषा बनी रहेगी, सोमनाथ भाजपा की उस भाषा का सबसे मजबूत शब्द बना रहेगा।

सोमनाथ से सत्ता तक: आस्था की राजनीति और भाजपा का स्थायी प्रयोग
     श्याम यादव

 Somnath Temple and Indian Politics : सोमनाथ भारतीय राजनीति में अब केवल इतिहास या आस्था का विषय नहीं है। वह एक राजनीतिक संकेतक है—ऐसा संकेतक, जो यह बताता है कि सत्ता किस स्मृति को जीवित रखना चाहती है और किसे भुला देना चाहती है। आज़ादी के बाद जिस सोमनाथ को राष्ट्र निर्माण की बहस के बीच सावधानी से रखा गया था, वही सोमनाथ अब खुली राजनीतिक अभिव्यक्ति का मंच बन चुका है। फर्क बस इतना है कि तब सवाल धर्म और राज्य की दूरी का था, आज सवाल धर्म और सत्ता के विलय का है।

1947 के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर देश में तीखी बहस हुई थी। सरदार पटेल और के.एम. मुंशी इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न मानते थे, जबकि प्रधानमंत्री नेहरू राज्य को धार्मिक प्रतीकों से दूर रखने के पक्ष में थे। 1951 में जब मंदिर का लोकार्पण हुआ और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद उसमें शामिल हुए, तब यह स्पष्ट हो गया कि धर्म और राजनीति की यह खींचतान आगे और गहरी होगी। यही वह ऐतिहासिक बिंदु था, जिसे बाद में भाजपा ने अपनी वैचारिक पूंजी में बदला।

जनसंघ के दौर में यह विचार हाशिये पर था। तब देश की मुख्यधारा राजनीति धर्मनिरपेक्षता के दायरे में खुद को सुरक्षित महसूस करती थी। लेकिन 1980 के बाद स्थितियां बदलने लगीं। भाजपा की स्थापना के साथ यह समझ बन चुकी थी कि केवल नीतियों और कार्यक्रमों से सत्ता तक पहुंचना मुश्किल है। भावनाओं को छूना होगा, और भारत में सबसे गहरी भावना आस्था है। 1984 के चुनाव में सिर्फ दो सीटें जीतने वाली भाजपा के लिए यह झटका नहीं, संकेत था कि रास्ता बदलना होगा।

1990 की आडवाणी रथ यात्रा उसी बदले हुए रास्ते की पहली खुली घोषणा थी। सोमनाथ से अयोध्या तक निकली यह यात्रा किसी धार्मिक अनुष्ठान की तरह नहीं, बल्कि राजनीतिक अभियान की तरह संचालित की गई। रथ यात्रा के बाद देश में जो हुआ, वह दर्ज इतिहास है, सांप्रदायिक तनाव, हिंसा, सरकारों का गिरना। लेकिन इन सबके बीच भाजपा का ग्राफ लगातार ऊपर जाता रहा। 1989 में 85 सीटें, 1991 में 120 और 1996 में 161 सीटें। यह केवल चुनावी आंकड़े नहीं थे, यह इस बात का प्रमाण थे कि धर्म अब राजनीति की सबसे प्रभावी भाषा बन चुका है।

इस पूरी प्रक्रिया में सोमनाथ एक स्थायी संदर्भ बना रहा। वह यह बताने के लिए इस्तेमाल किया गया कि “हमने इतिहास में अपमान सहा” और “अब हम उसे सुधार रहे हैं।” यह सुधार मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं रहा, यह स्मृति निर्माण तक फैल गया। इतिहास के जटिल अध्यायों को सरल कथा में बदला गया—टूटा, लूटा, फिर खड़ा किया गया। इस कथा में सवालों के लिए जगह नहीं थी, केवल विश्वास के लिए स्थान था।

2014 के बाद यह राजनीति और अधिक आत्मविश्वास के साथ सामने आई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आस्था और सत्ता के बीच की औपचारिक दूरी लगभग समाप्त हो गई। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी सोमनाथ यात्राएं निजी धार्मिक कर्मकांड नहीं रहीं। वे सार्वजनिक आयोजनों में बदलीं, जिनका सीधा राजनीतिक अर्थ निकाला गया। हर तस्वीर, हर वक्तव्य यह संदेश देता रहा कि अब राज्य धर्म से असहज नहीं है, बल्कि उसे मंच दे रहा है।

सरकारी आंकड़ों में इसे विकास का नाम दिया गया। धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हजारों करोड़ की परियोजनाएं शुरू हुईं। सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट की आय में भारी वृद्धि हुई, गुजरात में तीर्थाटन से होने वाली आमदनी कई गुना बढ़ी। विकास और आस्था को एक ही फ्रेम में रखकर पेश किया गया। सवाल उठाने वालों को संस्कृति-विरोधी और आस्था-विरोधी बताया गया। इस तरह बहस को नैतिकता से बाहर कर दिया गया।

भाजपा बार-बार कहती रही कि वह धर्म नहीं, संस्कृति की राजनीति करती है। लेकिन व्यवहार में संस्कृति का अर्थ वही निकला, जो बहुसंख्यक आस्था के अनुकूल था। अल्पसंख्यक सवाल धीरे-धीरे राष्ट्रीय विमर्श से बाहर होते गए। धर्मनिरपेक्षता एक संवैधानिक मूल्य से अधिक एक असुविधाजनक शब्द बन गई। राष्ट्रवाद की परिभाषा इतनी संकरी होती चली गई कि उसमें सवाल पूछने की गुंजाइश ही नहीं बची।

सोमनाथ, काशी और अयोध्या, ये तीनों स्थल अब धार्मिक से अधिक राजनीतिक स्थलों में बदल चुके हैं। यहां होने वाली हर गतिविधि का सीधा संबंध चुनावी राजनीति से जुड़ जाता है। आस्था को वोट में बदला जाता है और वोट को वैधता में। यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें लोकतांत्रिक बहस धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जाती है।

आखिरकार प्रश्न यह नहीं है कि भाजपा ने धर्म की राजनीति की या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या भारत की राजनीति ने धर्म को सत्ता की सबसे आसान भाषा बनने दिया। सोमनाथ इस पूरी प्रक्रिया का सबसे पुराना और सबसे भरोसेमंद प्रतीक है। वह बताता है कि इतिहास कैसे वर्तमान में बदला जाता है और आस्था कैसे नीति का विकल्प बन जाती है।

सोमनाथ आज भी समुद्र के किनारे खड़ा है—शांत, भव्य और अडिग। लेकिन उसके चारों ओर खड़ी राजनीति लगातार शोर करती है। यह शोर आस्था का नहीं, सत्ता का है। और जब तक यह शोर चुनाव जिताने की क्षमता रखेगा, सोमनाथ से सत्ता तक की यह यात्रा यूँ ही चलती रहेगी, बिना आत्मालोचना के, बिना विराम के।

                                                                                                                                                                                                                                                                                                               
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