Hari Mangal
कोलकाता में 8 जनवरी को केन्द्रीय आर्थिक खुफिया एजेंसी “प्रवर्तन निदेशालय” ने राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पैक के दफ्तर और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर धनशोधन के एक मामले में तलाशी ली। ईडी का कहना है कि करोड़ो रुपये के कोयले के अवैध खनन और तस्करी के मामले में की जा रही एक जांच के क्रम में एक साथ 10 ठिकानों पर यह तलाशी की कार्यवाही की गई। कोलकाता में आई-पैक के दफ्तर और उसके निदेशक के घर पर ईडी के तलाशी की सूचना मिलते ही राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने पुलिस और प्रशासनिक काफिले के साथ पहले निदेशक प्रतीक जैन के घर फिर आई-पैक के दफ्तर पहुंच कर तलाशी में यह कह कर बाधा डाली कि ईडी के अधिकारी तृणमुल कांग्रेस के चुनाव से संबंधित आंकड़े और दस्तावेज अपने कब्जे में लेने का प्रयास कर रहे हैं। इतना ही नहीं जांच एजेंसी के अनुसार मुख्यमंत्री कई दस्तावेज और इलेक्ट्रानिक उपकरण सहित महत्वपूर्ण साक्ष्य अपने साथ लेकर चलीं गईं।
प्रवर्तन निदेशालय केन्द्र सरकार के वित्त मंत्रालय के अन्तर्गत गठित एक खुफिया आर्थिक एजेंसी है जो आर्थिक कानूनों को लागू करती है। देश के किसी भी राज्य में धनशोधन (मनी लांड्रिंग), विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लघन (फेमा) और भगोड़े आर्थिक अपराधियों से जुड़े मामलों की जांच करना और उनकी सम्पत्तियों को जब्त करने का अधिकार इस एजेंसी को है।
प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने 8 जनवरी को 10 स्थानों पर एक साथ तलाशी अभियान शुरू किया जिसमें 4 स्थान दिल्ली में थे। कोलकाता में केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों की उपस्थिति में इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पैक) से संबंधित स्थानों पर छापामारी अभियान शुरू किया गया। ईडी अधिकारियों का कहना है कि केन्द्रीय जांच ब्युरो (सीबीआई) द्वारा नवम्बर 2020 में दर्ज की गई प्राथमिकी से इस मामले के तार जुड़े है जिसमें पश्चिम बंगाल के आसनसोल और उसके आसपास के कुनुस्तोरिया और काजोरा क्षेत्रों में ईस्टर्न कोलफील्ड्स की खदानों से संबंधित कई करोड़ रुपये के कोयले की चोरी का आरोप लगाया गया था। मामले की चल रही जांच में स्थानीय कोयला व्यापारी अनूप मांझी ऊर्फ लाला मामले का मुख्य संदिग्ध अभियुक्त है। धनशोधन से जुड़े इस मामले में ईडी अधिकारी इससे पहले 2021 में तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे है, से भी पुछताछ कर चुकी है। ईडी का दावा है कि अवैध कोयला व्यापार से अर्जित हुये धन के लाभार्थियों में तमाम लोग शामिल है। अधिकारियों का कहना है कि आई-पैक के निदेशक प्रतीक जैन के खिलाफ कोयला घोटाले से जुड़े हवाला लेनदेन और नगद लेनदेन के संबंध में उनके खिलाफ विशिष्ट साक्ष्य है।
प्रवर्तन निदेशालय की टीम द्वारा की गई कार्यवाई को जिस प्रकार राजनीतिक तूल दिया गया है वह हैरान करने वाला हैं। फर्म का राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सीधा जुड़ाव सामने आया है। आई-पैक पिछले कई चुनावों से तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक परामर्श दाता है और अब मुख्यमंत्री बता रहीं है कि फर्म के निदेशक प्रतीक जैन पार्टी के आईटी सेल के प्रमुख भी है। कारण जो भी हो,राज्य की मुख्यमंत्री को जैसे ही तलाशी की सूचना मिली वह सत्ता का शक्ति प्रदर्शन करते हुये अपने अधिकारियों के काफिले के साथ प्रतीक जैन के घर पहुंच कर तलाशी को राजनीतिक स्वरूप देने का प्रयास किया।
ममता बनर्जी ने तलाशी को राजनीति से प्रेरित और असंवैधानिक बताया लेकिन तलाशी में शामिल प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी अपना पक्ष रखते हुये यह समझाने का प्रयास करते रहे कि यह कार्यवाई पूरी तरह से कोयला घोटाले और उससे जुड़े आर्थिक अपराध से अर्जित की गई आय की खोजबीन के लिये की गई है। इसका राजनीति से कोई सरोकार नहीं है लेकिन मुख्यमंत्री बिना कुछ सुने जैन के घर से कुछ दस्तावेज लेकर चलीं गईं। मुख्यमंत्री आई-पैक के दफ्तर भी गईं जहां तलाशी अभियान चल रहा था। मुख्यमंत्री ने यहां से भी कई दस्तावेज, हार्डडिस्क, इलेक्ट्रनिक उपकरण अपने साथ ले गईं। ईडी के अधिकारी यह सब कुछ बेबस होकर देखते रहे क्योंकि उनके पास मुख्यमंत्री की इस कार्यवाई को रोकने का कोई विकल्प नहीं था।
आई-पैक छापेमारी को लेकर ईडी और राज्य सरकार आमने सामने है। ईडी जहां कानून का सहारा ले रही है वहीं आगामी चुनाव को देखते हुये मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे केन्द्र बनाम राज्य अथवा भाजपा बनाम तृणमूल कांग्रेस का स्वरुप देने का प्रयास कर रहीं है। 9 जनवरी को तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने जहां दिल्ली में गृह मंत्रालय के बाहर धरना दिया वहीं ममता बनर्जी ने खुद की अगुवाई में कोलकाता में जुलूस मार्च निकाल कर शक्ति प्रदर्शन किया। ईडी अधिकारियों के विरुद्ध थाने में प्राथमिकी भी दर्ज करायी गई है। ईडी ने कोलकाता उच्च न्यायालय में याचिका दायर करके ईडी के कामकाज में मुख्यमंत्री तथा राज्य के अधिकारियों द्वारा किये गये हस्तक्षेप की सीबीआई जांच कराने की मांग की है तो दूसरी ओर राज्य सरकार ने अपनी रिट में ईडी द्वारा जब्त किये गये अभिलेख और उपकरणों को तत्काल वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया है।
ममता बनर्जी द्वारा ईडी के कामकाज में हस्तक्षेप का यह पहला मामला नहीं है। राज्य में जब भी किसी बड़े घोटाले में केन्द्रीय जांच एजेंसी ने हाथ डाला तब ममता बनर्जी बचाव में सामने आ जाती हैं। दो वर्ष पूर्व अक्टूबर 2023 में राशन घोटाले में तत्कालीन मंत्री ज्योतिप्रिया मल्लिक को ईडी ने गिरफ्तार करके 20 घंटे तक पूछताछ की तब ममता उसके बचाव में सामने आयीं थीं। अगस्त 2022 में कुख्यात पशु तस्कर तथा तृणमूल कांग्रेस नेता अनुव्रत मंडल को सीबीआई ने गिरफ्तार किया तब भी मुख्यमंत्री बचाव में उतरीं। 23 जुलाई 2022 को स्कूल भर्ती घोटाले में ईडी ने ममता सरकार में शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार करके 50 करोड़ नगद ओर सोना बरामद किया था। शिक्षा मंत्री मुख्यमंत्री के करीबी मंत्रियों में शुमार थे तब भी ईडी की कार्य प्रणाली सरकार की ओर से सवाल उठाये गये थे।
ममता केवल प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की जाने वाली कार्यवाई का ही विरोध नहीं करती हैं बल्कि इनके निशाने पर दूसरी महत्वपूर्ण संघीय एजेंसी सीबीआई भी है। ममता सरकार ने नवम्बर 2018 में सीबीआई को प्रदत्त “सामान्य सहमति” का आदेश वापस ले लिया है अर्थात अब सीबीआई को पश्चिम बंगाल का कोई केस दर्ज करने से पहले राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक होती है। यद्यपि जिन मामलों में उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जांच का आदेश करता है उनमें सरकार की सहमति की आवश्यकता नहीं होती है। सामान्य सहमति वापस लिये जाने के पहले से चल रहे मामलों में भी सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं हैं।
फरवरी 2019 में सामने आये शारदा चिट फंड घोटाले में जांच कर रही सीबीआई और कोलकाता पुलिस का सीधा टकराव हुआ था जब सीबीआई टीम तत्कालीन पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के बंगले पर पूछताछ करने गई तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर थाने ले गई। इस घटना के बाद मौके पर पहुंची ममता बनर्जी ने सबके साथ सीबीआई कार्यालय पर धरना दिया था। इसी प्रकार 17 मई 2021 को नारद न्यूज पोर्टल के एक स्टिंग ऑपरेशन में फंसे ममता सरकार के दो मंत्रियों , एक विधायक सहित चार लोगों की गिरफ्तारी पर ममता ने सड़क से लेकर सीबीआई कार्यालय तक विरोध प्रदर्शन करते हुये 6 घंटे तक सीबीआई दफ्तर के बाहर धरना दिया था।
ममता सरकार ईडी की कार्यवाई को भले ही राजनीतिक स्वरुप देने का प्रयास कर रही है लेकिन सच तो यह है कि जो कुछ हुआ उसे न तो सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है और न तर्क-वितर्क के सहारे उसका औचित्य सिद्ध किया जा सकता हैं।
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