हिंदुत्व को विराट परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता

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हिंदू धर्म को अपने आचरण स्वभाव एवं विचारों में लाने वाले सभी मत- पंथ हिंदुत्व का अंग है। व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय चारित्य से युक्त समाज हिंदुत्व का अनन्य भाग है । हिंदुओं में दया, करुणा एवं बंधुता की भावना को बढ़ाने में हिंदुत्व का महनीय योगदान है।

हिंदुत्व को विराट परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता

पारंपरिक एवं व्यवहारिक शब्दों में सिंधु प्रदेश के निवासी " हिंदू " कहलाए थे। ' हिंदुत्व' शब्द का सबसे पहले अनुप्रयोग राष्ट्रवादी चिंतक, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को दमनात्मक शासकीय व्यवस्था के काल में ' प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' बताएं एवं तत्कालीन परिस्थितियों में इसके लिए कालजई व चिरस्थाई ' 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' किताब लिखे। अपने लेखों, कार्यक्रमों , विचारों एवं बौद्धिक व्याख्यान से राष्ट्रवाद की भावना की लौ एवं अलख को ऊर्जित करने वाले स्वातंत्र्य वीर, प्रखर चिंतक एवं राष्ट्रवादी विचारक विनायक दामोदर सावरकर ने किया था।

शाब्दिक आशय में' हिंदुत्व' जीवन जीने का तरीका या आत्मा ( शरीर पर मन का नियंत्रण) की स्थिति से है जो सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक भावना पर आधारित है। ' हिंदुत्व' एक भू- सांस्कृतिक अवधारणा है। वैश्विक स्तर पर मानव कल्याण एवं लोक कल्याण की भावना का उन्नयन करने में हिंदुओं का महत्तर योगदान रहा है।

विकसित भारत की क्षमता का मापांक

सभी विचारधाराओं एवं वैश्विक स्तर की सभी संस्कृतियों के प्रति समरस एवं अमृत विचार को उन्नयन करने में' हिंदुत्व' ने महनीय भूमिका निभाया है। ' हिंदुत्व' एक समावेशी संकल्पना है, जो " सबको शाश्वत एवं सतत प्रत्यय" दिया है।' हिंदुत्व' अपने विराट अवधारणा एवं गुण के आधार से समाज व्यवस्था एवं शासकीय संरचना में संतुलन एवं सद्भाव का विकास कर रहा है, जो मानवीय समुदाय एवं वैश्विक व्यवस्था में तादात्म्य स्थापित करके भू- राजनीतिक एवं भू - सामरिक संरचना में अनुशासित योगदान दे रहा है। समेकित रूप से हिंदुत्व सार्वभौमिक अवधारणा है।

हिंदू धर्म का मौलिक तत्व ' हिंदुत्व' है। हिंदू धर्म एवं हिंदुत्व एक दूसरे के पूरक है। यह व्यक्तियों में बौद्धिक ईमानदारी, सामाजिक समावेशिता ,राष्ट्रीय जिम्मेदारी एवं राष्ट्रीय मूल्यों के प्रत्यय जोड़ रहा है। हिंदुत्व की विचारधारा युवाओं को आत्मनिर्भर एवं स्वालंबी बना रही है। इस विरोचित प्रत्यय से भारत अपनी संकल्पित क्षमता , ऊर्जा एवं नवोन्मेष के द्वारा" विकसित भारत@2047" को प्राप्त कर लेगा। भारत में हिंदुत्व के क्षितिजीकरणों के लिए अपार एवं असीमित क्षमताएं है। भारत में इस प्रत्यय के लिए सांस्कृतिक विविधता एवं बौद्धिक विमर्श की " उर्वरा भूमि" है। यह विकसित भारत के लिए संकल्पित एवं प्रतिबद्ध क्षमता का मापांक है। वर्तमान में हर वैश्विक विशेषज्ञ एवं वैश्विक अभिकरण ' हिंदुत्व' के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रख रहे हैं। भारत वैश्विक स्तर पर अग्रणी राष्ट्र है, जो अपने मूल्यों एवं आदर्शों को सुरक्षित कर रहा है। भारत के वैचारिक मूल्य, बौद्धिक ईमानदारी एवं सच्चरित्र का वैश्विक स्तर के अभिकरण प्रशंसा कर रहे हैं।

' हिंदुत्व' उदारवाद, समाजवाद, व्यक्तिवाद ,वैज्ञानिक समाजवाद एवं आदर्शवाद के सदृश एक दर्शन है, जो संपूर्ण समाज के आनंद ( सुख एवं दुख की सापेक्ष स्थिति) को प्रदान करने वाला भारतीय दृष्टिकोण का गत्यात्मक दर्शन है । ' हिंदुत्व' के अंतर्गत शासक (सरकार) एवं शासित ( जनता) के बीच अधिकार, कर्तव्य एवं संविधानवाद पर संकेंद्रण होता है। यह संवैधानिक वैधता के अंतर्गत कार्य करने वाली संस्थात्मक निकाय है। हिंदुत्व जीवन जीने का तरीका, राष्ट्रीय परंपरा का गौरव, मानवीय मूल्यों का अकादमिक संयोजन, राष्ट्रबोध की धारणा एवं माननीय मूल्य का संयोजन है। इसमें भौतिकवाद, सनातन धर्म, अस्पृश्यता विहीन समाज, उत्पीड़न विभिन्न समाज, शोषण विभिन्न समाज, देशभक्ति ,भारतबोध एवं भारतीयता का जयघोष है। यह भारतीय, भारतीय भावना एवं भारतीय मूल्यों का योग है।

सनातन धर्म एवं भारतीयता का प्रतिनिधित्व

' हिंदुत्व' की अवधारणा हिंदू राष्ट्र एवं हिंदू समाज में एकता ,समरसता, हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति के बारे में जाग्रत करने का निरंतर प्रयासरत संकल्पना है। ' हिंदुत्व ' की विचारधारा भारत के प्रगति के लिए काम कर रहा है। ' हिंदुत्व ' से समर्पित भाव से व्यक्ति - निर्माण के महत्ती कार्य को लक्षित कर स्वयंसेवक देश समाज के सभी क्षेत्रों - सेवा, विद्या, इतिहास, विद्यार्थी मजदूर एवं राजनीति में ' राष्ट्र सर्वोपरि ' की भावना को मूल मंत्र मानकर देश के चतुर्दश विकास के लिए प्राणप्रण से जुड़े हैं। देश की आर्थिक समृद्धि व राजनीतिक स्थिरता देने के लिए ' हिंदुत्व' को मजबूत आयाम देना होगा। इस विचार के द्वारा भारत को वैश्विक स्तर का मार्गदर्शक होना है। भारत को वैश्विक स्तर के लिए मार्गदर्शन के साथ-साथ अपने परंपराओं, संस्कृति एवं सांस्कृतिक विरासत का उन्नयन करना होगा।' हिंदुत्व' राष्ट्र- निर्माण में महत्ती भूमिका में उन्नयन के साथ कर्तव्य भावना को मजबूत कर रहा है। ' हिंदुत्व' "सबको" जोड़कर राष्ट्र - निर्माण में पाथेय प्रदान कर रहा है।

' हिंदुत्व' स्वस्थ समाज के विषय को मजबूती से उठा रहा है स्वस्थ समाज का आशय ' संगठित समाज' से होता है। भारत को सबल होकर" सबकी चिंता" करनी है। भारत की परंपरागत संस्कृति के आधार पर अत्यंत परम वैभव संपन्न, शक्ति संपन्न एवं सौभाग्यशाली राष्ट्र- राज्य के रूप में बनाना है। भारत संपूर्ण वैश्विक व्यवस्था में सुख, शांतिपूर्वक जीवन जीने के सौंदर्य को प्रदान करने वाला शक्ति संपन्न राष्ट्र- राज्य है। शक्ति का गुरुत्व" सबको जोड़ने वाला प्रत्यय" है। शक्ति संपन्नता का आशय शक्ति संचय को उन्नयन करना है। हिंदुत्व के अंतर्गत " सभी धर्मों का उन्नयन बिना किसी द्वेष, पूर्वाग्रह एवं भेदभाव के हो रहा है।"

हिंदुत्व ईसाई एवं इस्लाम की तरह कोई पंथ नहीं हैं ,बल्कि सामाजिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों का सार्थक अवधारणा है। इसके मौलिक विषय वस्तु में आध्यात्मिक स्वतंत्रता है। उन समस्त मार्गों एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण जो अन्यों की आध्यात्मिक स्वतंत्रता को स्वीकार एवं सम्मान करें एवं उन्नयन के लिए प्रोत्साहित करें, सभी के सार्थक समूह को ' हिंदुत्व ' कहते हैं। ' हिंदुत्व ' की अवधारणा भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर अमृत रूपी तत्व के रूप में समाहित है। यह हमारे पार्थिव भू - भाग पर मुख्य परंपराओं, सांस्कृतिक मूल्यों ,मानवीय संस्कारों, अनुशासन एवं मौलिक विचारों का विवेकी प्रतिनिधित्व करता है। ' हिंदुत्व' "सनातन धर्म एवं भारतीयता का प्रतिनिधित्व " कर रहा है। यह समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए"सेतु विचार" का कार्य कर रहा है एवं समकालीन में वायु देवता के  सदृश सक्रिय है । हिंदुवाद के समरूप संस्कृति हिंदुत्व है।

लेखक इतिहास एवं सामयिक विषयों पर गंभीर विचार रखते हैं। हिंदुत्व पर उनके निम्न सुझाव है:- 
1.हिंदुत्व भू- सांस्कृतिक संकल्पना है। यह सामयिक परिदृश्य में ' स्वस्थ समाज' एवं ' संगठित समाज' के उन्नयन में महत्व भूमिका निभा रहा है।
2. हिंदुत्व सामाजिक, सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक एवं नैतिक संकल्पना है। इसके मौलिक विषय वस्तु में ' आध्यात्मिक स्वतंत्रता' है।
3. हिंदुत्व निरंतर प्रवाहमान जीवन दर्शन है, जो समाज में एकता, समरसता एवं मौलिक मूल्यों की बढ़ोतरी कर रहा है।

डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय, राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति केशव कुंज झंडेवाला, नई दिल्ली

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