केरल के मतदाताओं ने ठोका वामपंथियों के ताबूत में आखिरी कील
Hari Mangal
पिछले माह सम्पन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के अधिकांश परिणाम चौंकाने वाले आये। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की करारी हार और भाजपा की ताजपोशी, असम में भाजपा का सत्ता में नवीनीकरण, तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके का पहले ही चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुये बहुमत हासिल करने का मामला भले ही चर्चा का विषय बना हुआ है लेकिन केरल के मतदाताओं ने तो वामपंथियों के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है। सत्तारूढ़ एलडीएफ गठबंधन की हार के बाद अब देश के किसी भी राज्य में वामपंथियों की सरकार नहीं बची है। ऐसा लगभग 50 वर्ष के बाद हुआ है।
केरल में बनी पहली वामपंथी सरकार
आजादी के बाद शुरू हुये पहले विधानसभा चुनाव में कांगेस का बोलबाला था लेकिन 1957 के विधानसभा चुनाव में वामपंथियों ने केरल में कांग्रेस को परास्त कर अपनी सरकार बनायी। इएमएस नंबुदरीपाद ने 5 अप्रैल 1957 को केरल के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह एक विश्व स्तरीय घटना मानी जाती है क्योंकि इसके पहले भारत या विश्व के किसी देश में वामपंथी ‘लोकतांत्रिक प्रक्रिया’ से सत्ता में नहीं आये थे। केरल की यह वामपंथी सरकार बहुत दिन तक नहीं चल सकी। केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार ने 31 जुलाई 1959 को राज्य में बिगड़ती कानून व्यवस्था को आधार बनाकर संविधान के अनुच्छेद 356 के सहारे वामपंथी सरकार को बर्खास्त कर दिया। किसी लोकतांत्रिक सरकार की यह बर्खास्तगी आज भी विवाद का विषय बनी हुयी है। सत्ता से हटने बाद भी वामपंथी केरल में अपनी पैठ बनाते रहे और 1967 के चुनाव में वामपंथियों का संयुक्त मोर्चा पुनः सत्ता में आया। नम्बुदरीपाद 6 मार्च 1967 को पुनः मुख्यमंत्री बने लेकिन सीपीआई और सीपीआई(एम) में वर्चस्व और कार्यशैली को लेकर टकराव पैदा हो गया। यह टकराव बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार के आरोप-प्रत्यारोप तक पंहुच गया।
आखिरकार मोर्चा में शामिल अन्य दलों ने समर्थन वापस ले लिया जिसके कारण नंबुदरीपाद को 24 अक्टूबर 1969 को पद से त्यागपत्र देना पड़ा। 1970 से 1977 तक वामपंथी कांग्रेस से गठबंधन करके राज्य की सत्ता में बने रहे। केरल के इतिहास को देखें तो 1982, 1991, 2001,और 2011 के चुनाव को छोड़ कर शेष अवधि में वामपंथी ही सत्ता में किसी न किसी रूप में काबिज रहे। 2016 से पी विजयन सत्ता में थे जिन्हें 2026 के चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा है। उनके गठबंधन को 140 सीटों के विधानसभा में मात्र 35 सीटें मिली है जबकि 2021 के चुनाव में 99 सीटें मिलीं थी। अनुमानतः केरल में वामपंथी या उनका गठबंधन 35 से 40 वर्ष सत्ता में रह चुका हैं।
पश्चिम बंगाल में बनी वामपंथी सरकार
केरल में 1967 के बाद से वामपंथी सत्ता में आते जाते रहे लेकिन पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने 1977 में सत्ता संभाली और 2011 तक लगातार शासन किया। 1977 से 2000 तक ज्योति बसु और उनके पद छोड़ने के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्या 2000 से 2011 तक बंगाल की सत्ता पर काबिज थे। 2011 के चुनाव में ममता बनर्जी के सत्ता में आने बाद से वामपंथियों का पराभव होता गया और 2026 के चुनाव में वाममोर्चा मात्र 2 सीट पर सिमट गया। माना जा रहा है कि पश्चिम बंगााल में वामदल अपनी आखिरी सांसे ले रहा है। पश्चिम बंगाल एक मात्र ऐसा राज्य है जहां वामपंथ लगातार 34 वर्षो तक सत्ता में रहा है।
वामपंथ का गढ़ त्रिपुरा
पश्चिम बंगाल की तरह त्रिपुरा भी वामपंथ का गढ़ हुआ करता था। 1978 में पहली बार वामपंथी मोर्चे ने इस राज्य में सत्ता संभाली लगातार 10 वर्षो तक नृपेन चक्रवर्ती राज्य के मुख्यमंत्री रहे। वामपंथियों के लिये यह दशक स्वर्णिम युग कहा जाता है क्योंकि तीन-तीन राज्यों, केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में उनकी सरकारें निर्वाचित हो रहीं थी। त्रिपुरा में 1988 में सत्ता से बाहर होने के बाद वामपंथी मोर्चा पुनः 1993 में सत्ता में आया और 2018 तक सत्ता में बना रहा। फरवरी 2018 में हुये चुनाव में भाजपा ने वाममोर्चा के शासन को न केवल समाप्त किया अपितु 2023 के विधानसभा में भी अपनी सत्ता बरकरार रखी। 2023 के चुनाव में वाममोर्चा और कांग्रेस गठबंधन को मात्र 13 सीटें मिली जिसमें वाममोर्चा की 11 सीटें थी जबकि 60 सीटों की विधानसभा में भाजपा को अकेले 32 सीटें मिली हैं। एक प्रकार से त्रिपुरा में भी वाममोर्चा का प्रभाव हो रहा है।
वामपंथियों से होता मोहभंग
2011 में पश्चिम बंगाल, 2018 में त्रिपुरा और अब 2026 के चुनाव में केरल से वामपंथी मोर्चा सत्ता से बाहर हो गया। भारतीय राजनीति के पिछले 50 वर्षो के इतिहास में यह पहला अवसर जब वामपंथी देश के किसी भी राज्य में सत्ता नहीं होंगे। यह एक संयोग ही कहा जायेगा कि जिस केरल राज्य में जनता ने सबसे पहले वामपंथी विचारधारा की स्वीकार्यता पर अपनी मुहर लगायी थी उसी राज्य की जनता ने वामपंथियों के ताबूत में आखिर कील ठोकते हुये उसे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। एक और उल्लेखनीय तथ्य यह है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने केरल में 3 विधानसभा सीटें जीत कर वामपंथियों सहित तमाम सेकुलर पार्टियों की नींद उड़ा दी है क्योंकि 2016 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपनी पहली उपस्थिति दर्ज कराते हुये मात्र तीन सीटें ही जीती थी।
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