अंकों की अंधी दौड़ और सहमा हुआ बचपन

Dharmesh Yadav Dharmesh Yadav

अर्धवार्षिक परीक्षाओं के दौरान बच्चों पर बढ़ते अंकों के दबाव, तुलना और तनाव पर एक शिक्षक-प्रधानाचार्य का अनुभवपरक चिंतन। जानिए अभिभावक बच्चों का आत्मविश्वास और सीखने की सहजता कैसे बनाए रख सकते हैं।
अंक नहीं, बच्चों का आत्मविश्वास बचाइए

​सितंबर का यह पखवाड़ा आते ही विद्यालयों के गलियारों और परिवारों के भीतर एक अजीब सी खामोशी और तनाव की परत जमने लगती है। कक्षाओं में पाठ्यक्रम दोहराने की हड़बड़ी है, तो घरों में एक अघोषित, दमघोंटू सन्नाटा। कारण वही चिर-परिचित अर्धवार्षिक परीक्षाएं।

​गत ढाई दशकों से अधिक समय से चाक-डस्टर हाथ में थामे, सरस्वती वंदना के समवेत स्वरों से लेकर विद्यालय के प्रांगण में बच्चों के खिलखिलाते चेहरों को निहारते हुए मैंने शिक्षा को केवल किताबों में नहीं, जीवंत मानवीय संबंधों में घटते देखा है। एक शिक्षक और प्रधानाचार्य के रूप में अपने इस 25 वर्ष के शैक्षिक जीवन के अनुभव से आज जब मैं प्रातः वंदना सत्र के समय कतारों में खड़े बच्चों की आँखों को पढ़ता हूँ, तो मन भीतर तक आंदोलित हो उठता है। बस्तों का भौतिक भार तो उनकी कोमल पीठ पर पहले से था, लेकिन इन दिनों उनकी मासूम आँखों में जो अंकों का अदृश्य और भारी दबाव तैर रहा होता है, वह किसी भी संवेदनशील शिक्षक की आत्मा को झकझोरने के लिए काफी है।

सवाल यह उठता है कि क्या परीक्षा का उद्देश्य भैया-बहनों के भीतर सीखने का स्वाभाविक कौतूहल और संस्कार जगाना था, या उन्हें भय, हीनभावना और आत्म-संदेह के चौराहे पर लाकर खड़ा कर देना? आज हमारा पूरा समाज, विशेषकर अभिभावक वर्ग, एक ऐसी अंधी दौड़ का बंधक बन चुका है जहाँ बालक के समग्र व्यक्तित्व, उसके संस्कारों और मानवीय संवेदनाओं को प्रगति-पत्रक (Report Card) के दो अंकों के प्रतिशत में समेटने की आत्मघाती भूल की जा रही है।

​विद्या मंदिर की माटी और बालक को तराशने का मर्म

​विद्या मंदिर की जो परंपरा हमने जली-संवारी है, उसका मूल ध्येय कभी केवल किताबी तोते तैयार करना नहीं रहा। यहाँ हमारी साधना यह रही है कि बालक केवल सूचनाओं का भंडार न बने, बल्कि उसका 'पंचकोशीय विकास'—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय—संभव हो सके। एक कुम्हार जिस तरह चाक पर रखी मिट्टी को भीतर से सहारा देकर बाहर से हल्के हाथों से थपथपाता है, ठीक उसी तरह एक शिक्षक कक्षा में हर उस बालक को निखारता है जिसे दुनिया शायद औसत मानकर छोड़ देती है।

​अपने पच्चीस वर्षों के अनुभव में मैंने ऐसे सैकड़ों बच्चों को देखा है जो गणित के जटिल सूत्रों में अटक जाते थे, लेकिन वंदना सत्र में जब वे एकाग्र होकर शंख बजाते या सुरीले कंठ से ध्येय-गीत गाते, तो पूरा वातावरण दिव्यता से भर उठता था। कुछ ऐसे थे जो इतिहास की तिथियां भूल जाते थे, परंतु घोष दल में जब वे लयबद्ध कदमताल करते या खेल के मैदान में कबड्डी-खो-खो की व्यूहरचना करते, तो उनका अनुशासन और नेतृत्व अद्वितीय होता था।

​जब वही बच्चे वर्षों बाद समाज में एक ईमानदार नागरिक, संवेदनशील चिकित्सक, कर्तव्यनिष्ठ सैनिक या आदर्श अभिभावक बनकर सामने आते हैं और चरण स्पर्श करते हैं, तब यह पक्का विश्वास हो जाता है कि जीवन में काम अंकों का प्रतिशत नहीं, विद्यालय में गढ़े गए संस्कार और जीवन-मूल्य आते हैं।

​तुलना का धीमा ज़हर: जब घर ही बन जाए कुरुक्षेत्र

​भारतीय परिवारों में परीक्षा का वास्तविक तनाव स्वयं परीक्षा के प्रश्नपत्र से नहीं उपजता, बल्कि वह उस अंधी तुलना से पैदा होता है जो रोज़ शाम भोजन की थाली के साथ परोसी जाती है। "पड़ोस वाले भैया के अंक देखे?", "रिश्तेदारी में उस बिटिया ने पूरे जिले में टॉप किया है"—यह वह मीठा ज़हर है जो अनजाने में बच्चे के आत्मगौरव की नींव हिला देता है।

​अभिभावक बंधुओं को यह समझना ही होगा कि सृष्टि की रचना में किसी एक वृक्ष की दो पत्तियां भी समरूप नहीं हैं। हर बालक ईश्वर की एक अनूठी और मौलिक कृति है। जब आप अपने बच्चे की तुलना किसी अन्य से करते हैं, तो आप अनजाने में उसके भीतर के नैसर्गिक गुण का अपमान कर रहे होते हैं। एक शिक्षक के रूप में मैंने अनुभव किया है कि जब बालक को यह महसूस होता है कि उसके माता-पिता का स्नेह उसकी मेहनत या चरित्र पर नहीं, केवल उसके रिपोर्ट कार्ड के 90% पर टिका है, तो वह भीतर से टूटने लगता है। वह झूठ बोलने लगता है, अंतर्मुखी हो जाता है और धीरे-धीरे अपने ही घर में अकेला पड़ जाता है।

​अर्धवार्षिक परीक्षा: जीवन की अंतिम सीमा नहीं, केवल प्रगति का आईना

​हमारी सनातन दृष्टि कहती है—‘सा विद्या या विमुक्तये’—विद्या वह है जो बंधनों, संकोचों और भय से मुक्ति दिलाए। परंतु यदि परीक्षा ही भय का सबसे बड़ा कारण बन जाए, तो हमें रुककर अपनी पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार करना होगा।

​परीक्षा केवल इस बात का आकलन है कि बालक ने पिछले छह महीनों में जो पढ़ा, उसका कितना हिस्सा वह समझ पाया और कहाँ उसे शिक्षक व अभिभावक के अतिरिक्त संबल की आवश्यकता है। यह बच्चे का चरित्र-प्रमाण पत्र नहीं है। यदि गणित में बीस नंबर कम आ गए, तो इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि वह बालक जीवन की दौड़ में पिछड़ गया। इसका सीधा सा अर्थ केवल इतना है कि उस विशेष विषय में उसे हमारे थोड़े और समय, स्नेह और मार्गदर्शन की दरकार है।
​परीक्षा के इन दिनों में अभिभावकों से शिक्षक का आत्मीय संवाद

​गत ढाई दशकों में हजारों अभिभावकों से हुई चर्चाओं के आधार पर, इस अर्धवार्षिक परीक्षा सत्र में मैं अभिभावकों के सामने कुछ व्यावहारिक और हृदयस्पर्शी बातें रखना चाहता हूँ:
​घर के वातावरण को तपोवन बनाएं, कारागार नहीं: परीक्षा के दिनों में घर में टीवी बंद करने के फरमानों और डांट-फटकार की जगह शांति और आत्मीयता का माहौल दें। जब बच्चा तनाव में हो, तो एक कप गर्म दूध के साथ सिर पर फेरा गया हाथ किसी भी टॉनिक से ज्यादा काम करता है।

​संवाद की मेज से अंकों का पहरा हटाएं: रात को भोजन करते समय केवल यही न पूछें कि "आज कितना याद किया?" बल्कि उससे पूछें कि "आज विद्यालय में क्या अच्छा लगा?" या "क्या मन में कोई उलझन है?" बच्चे को यह भरोसा होना चाहिए कि विफलता की स्थिति में भी उसका परिवार उसके साथ खड़ा रहेगा। ​मैदान से दूरी न बनवाएं: कई माता-पिता परीक्षा आते ही बच्चों का खेलना-कूदना पूरी तरह बंद करा देते हैं। 25 वर्षों का मेरा अनुभव साक्षी है कि जो बच्चा शाम को आधा घंटा खुली हवा में दौड़ता है या प्राणायाम करता है, उसकी एकाग्रता और ग्रहण करने की क्षमता कमरे में बंद रहने वाले बच्चे से कहीं अधिक होती है। ​प्रयास की पूजा करें, परिणाम की नहीं: बच्चे के परिश्रम, उसकी नियमितता और उसकी सत्यनिष्ठा की प्रशंसा करें। यदि उसने अपना सौ प्रतिशत दिया है, तो अंक चाहे जो भी आएं, उसके आत्मबल को झुकने न दें।

​गढ़ना ही हमारी साधना है :

​कक्षा-कक्ष के श्यामपट्ट पर सफेद चाक से अक्षर उकेरते हुए मैंने यह सीखा है कि हर बच्चा किसी कच्चे घड़े की तरह है। यदि उस पर अत्यधिक दबाव डालेंगे, तो वह पकने से पहले ही चटक जाएगा।विद्या मंदिर का परिवेश और एक सच्चे शिक्षक की तपस्या यही है कि हम उस घड़े को अपनी ममता की छाया और अनुशासन की आंच में ऐसा तपाएं कि वह जीवन के हर झंझावात को सहने योग्य बन सके।

​आइए, इस सितंबर जब हमारे भैया-बहन अपनी उत्तर-पुस्तिकाओं पर अपने परिश्रम का हिसाब लिख रहे हों, तब हम समाज और परिवार के रूप में उनके कंधों पर अपेक्षाओं का पहाड़ न लादें। उनके बस्तों से अंकों का डर उतारिए, ताकि उनकी आँखों में आत्मनिर्भरता, सेवाभाव और राष्ट्रभक्ति का प्रकाश जगमगा सके। अंक तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन जो बचपन और आत्मविश्वास एक बार सहम गया, उसे किसी भी प्रगति-पत्रक से दोबारा नहीं लौटाया जा सकेगा।

- युगल किशोर मिश्र, प्रधानाचार्य सरस्वती शिशु मंदिर इंटरमीडिएट कॉलेज, सिरवारा मार्ग, सुल्तानपुर
("एक शिक्षक एवं विद्यालय प्रशासक के व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित")

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