पंडित दीनदयाल उपाध्यायः ' एकात्म मानववाद' की वर्तमान में प्रासंगिकता
साम्राज्यवाद की राक्षसी दैत्याकार समेटने वाली दृष्टि तथा लोकमानस के प्रति अंग्रेजी साम्राज्यवादी नीतियों ने "भारतीय समाज और साहित्य पर हीनभावना एवं उत्पीड़क प्रभाव डालें।" इन परिस्थितियों ने भारतीय बौद्धिक वर्ग में व्यापक उद्वेलन उत्पन्न किया और "विवेकशील प्रज्ञा ने राष्ट्रीय चेतना तथा राष्ट्रबोध की भावना को प्रखर स्वर प्रदान किया।" इसी क्रम में भारतबोध एवं भारतीय चेतना का सशक्त उद्घोष पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के चिंतन में विविध रूपों में अभिव्यक्त हुआ। इस महापुरुष के विचारों ने भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता, राष्ट्रीय स्वाभिमान और आत्मबोध को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मानव जीवन का समग्र विकास
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी महान चिंतक ,महान दार्शनिक एवं कुशल संगठनकर्ता थे। उन्होंने भारत की सनातन चिंतन परंपरा को युगानुकुल स्वरूप प्रदान करते हुए "एकात्म मानववाद" के रूप में एक समग्र एवं प्रगतिशील विचार दृष्टि प्रस्तुत की ,जिसमें व्यक्ति, समाज, राज्य ,राष्ट्र और संपूर्ण सृष्टि के मध्य अंतर्संबंधों को रेखांकित किया गया है।
"एकात्म मानववाद" मानव जीवन को केवल भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित न मानकर उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास को एक समग्र इकाई के रूप में विकासात्मक पहलुओं को उन्नयन करता है। यह दर्शन व्यक्ति और समाज के साथ-साथ प्रकृति एवं समस्त सृष्टि के कल्याण को भी विकास की अनिवार्य शर्त मानता है। इस दृष्टि में विकास का उद्देश्य केवल आर्थिक समृद्धि नहीं बल्कि, मानव जीवन में संतुलन, सामाजिक समरसता एवं प्रकृति के साथ-साथ सह- अस्तित्व स्थापित करना है। यह विकास मनोनैतिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रकृति का है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी अपने लेखन, व्याख्यानों और चिंतन के माध्यम से इस दर्शन को भारतीय समाज और राष्ट्र जीवन के संदर्भ में व्यवस्थित रूप से प्रतिपादित किया। समकालीन में यह भारतीय जनता पार्टी की घोषित वैचारिक परंपरा के प्रमुख आधारों में से एक है और उसके राजनीतिक चिंतन को समझने में इसकी महत्वपूर्ण उपादेयता एवं प्रासंगिकता है।
व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन
वर्तमान में भी "एकात्म मानववाद "की प्रासंगिकता व्यक्ति, समाज, राज्य एवं राष्ट्र के बीच संतुलित संबंध, सामाजिक समरसता, अंत्योदय एवं समग्र विकास की अवधारणाओं के संदर्भ में देखी जा सकती है। इस दृष्टिकोण की मूल विशेषता यह है कि यह विकास को मानव केंद्रित होने के साथ-साथ समाज और प्रकृति के व्यापक कल्याण से जोड़ता है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी व्यक्तिवाद, पूंजीवाद,समाजवाद, साम्यवाद एवं लोकतंत्र को पश्चिमी चिंतन का उपज मानते थे। उनके अनुसार ये पश्चिमी विचारधाराए मुख्यतः भौतिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं ,इसके विपरीत उन्होंने" एकात्म मानववाद" को एक ऐसा दर्शन माना जो मनुष्य के जीवन के सभी पक्षों को समग्र रूप से समझता है और मानवीय शांति तथा सामाजिक ,राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रस्तुत करता है।
दीनदयाल उपाध्याय जी का चिंतन केवल सैद्धांतिक नहीं था बल्कि, वह समाज और व्यक्ति के वास्तविक जीवन से जुड़ा हुआ था। उनका मानना था कि मनुष्य का विकास केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं बल्कि, उसके शारीरिक ,मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के साथ होना चाहिए। इसी समग्र दृष्टिकोण को उन्होंने अपने राजनीतिक और सामाजिक चिंतन का आधार स्तंभ बनाए।
लोककल्याण और अंत्योदय
दीनदयाल जी के चिंतन में मनुष्यता और लोककल्याण को विशेष महत्व प्राप्त है ।भारतीय चिंतन परंपरा में ऋषियों, संतों और आचार्यों ने लोक कल्याण को सर्वोच्च आदर्श माना है। इसी भावना को "भद्रं पश्यन्ती दृश्यः " जैसे वैदिक विचारों में देखा जा सकता है, इसका व्यापक भाव है कि ऋषि और संत समाज एवं समस्त मानवता के कल्याण की दृष्टि रखते हैं।
लोक कल्याण का विषय किसी एक व्यक्ति या समुदाय तक सीमित नहीं है बल्कि, यह समस्त मानवता और वैश्विक कल्याण की भावना से योजित व्यापक आदर्श है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का "एकात्म मानववाद"भी इसी समग्र और मानवीय दृष्टिकोण को सामने रखता है एवं समाज में अपने विचारों को संप्रेषित करता हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के कथनी एवं करनी में पूर्ण सामंजस्य था। उन्होंने " एकात्म मानववाद" के माध्यम से व्यक्ति, समाज ,राज्य एवं राष्ट्र के समग्र एवं संतुलित विकास का वैचारिक मार्ग प्रस्तुत किया है।उनके राजनीतिक चिंतन में विकास का उद्देश्य आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं था ,बल्कि समाज के हर वर्ग के जीवन में गरिमा, अवसर एवं समृद्धि का प्रत्यय सम्मिलित था।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के लिए विकास का आशय "समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का उत्थान था।" उन्होंने अंत्योदय की अवधारणा के माध्यम से अंतिम व्यक्ति की उन्नति को सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना था। उनका मानना था कि विकास का लाभ समाज के सबसे वंचित व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।
प्रकृति और मानव के बीच समन्वय
वर्तमान की विषम एवं जटिल वैश्विक परिस्थितियों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा प्रतिपादित "एकात्म मानव दर्शन" व्यक्ति, परिवार, समाज , राज्य ,राष्ट्र एवं वैश्विक समुदाय का प्रकृति के मध्य सामंजस्य एवं समन्वय स्थापित करने वाली एक प्रासंगिक एवं समग्र जीवन दृष्टि के रूप में सामने आता है । यह दर्शन व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताओं को केंद्र में रखने वाली एकांगी दृष्टि के विपरीत उसके जीवन के समस्त आयामों को समाहित करता है। इसमें व्यक्ति के शरीर ,मन, बुद्धि एवं आत्मा के समन्वित विकास के साथ-साथ धर्म ,अर्थ काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ- चतुष्टय को जीवन की संतुलित एवं सार्थक अभिव्यक्ति का आधार माना गया है।
"एकात्म मानव दर्शन "की विशेषता है कि यह व्यक्ति को समाज एवं राष्ट्र से पृथक कोई स्वतंत्र इकाई नहीं मानकर "उसे व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न अंग मानता है।" व्यक्ति,परिवार ,समाज , राज्य और राष्ट्र से लेकर समस्त वैश्विक तथा प्रकृति तक के व्यक्ति के अंतर्संबंधों को स्वीकार करते हुए दर्शन "व्यक्ति से समष्टि "तक का एकात्मकता और परस्पर पूरकता की भावना को प्रतिष्ठित करता है। इस दृष्टि से "एकात्म मानव दर्शन "मानव के आर्थिक अथवा भौतिक विकास का प्रतिपादन नहीं करता बल्कि, व्यक्ति, समाज , राज्य, राष्ट्र और विश्व के संतुलित एवं समन्वित विकास पर आधारित "एक व्यापक मानव दृष्टि प्रस्तुत करता है।"
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में दिन दयाल उपाध्याय जी का विचार मानवीय मूल्यों एवं आदर्शों के लिए प्रासंगिक एवं गुणवत्तापूर्ण उपादेयता है।यह व्यक्ति,परिवार , समाज, राज्य एवं राष्ट्र के साथ वैश्विक स्तर पर शांति ,एकता, सदभाव एवं आत्मीयता का भावना जाग्रत कर रहा हैं जो घरेलू एवं वैश्विक समस्याओं के समाधान में उपादेयता प्रदान कर रहा है।
डॉ.बालमुकुंद पांडे
राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली
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