मोदी के नेतृत्व में भारत : एक विश्लेषण
नई दिल्लीः पिछले एक दशक से अधिक समय में भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और शासन-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने विकास, डिजिटल प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचे, सामाजिक कल्याण और वैश्विक कूटनीति के क्षेत्र में नई प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं। वर्ष 2014 के बाद भारतीय राजनीति में नेतृत्व का केंद्रीकरण, निर्णय लेने की गति और नीतियों के व्यापक क्रियान्वयन ने शासन की शैली को एक नया स्वरूप दिया है। इस परिवर्तन को केवल किसी एक सरकार की उपलब्धियों के रूप में नहीं, बल्कि बदलती भारतीय आकांक्षाओं, तकनीकी परिवर्तन और वैश्विक शक्ति-संतुलन में आ रहे बदलावों के व्यापक संदर्भ में समझना आवश्यक है।
मोदी सरकार की प्रमुख विशेषताओं में निर्णायक नेतृत्व और राजनीतिक स्थिरता को माना जा सकता है। 2014 और 2019 में भाजपा को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला, जबकि 2024 में भाजपा बहुमत के आंकड़े से नीचे रही और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ। 2014 के बाद केंद्र में भाजपा-नीत सरकारों की निरंतरता बनी रही। इससे नीति-निर्माण में निरंतरता और दीर्घकालिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की क्षमता बढ़ी है। साथ ही, प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली हुई है।
आतंकवाद और उग्रवाद के प्रति कठोर नीतियां
मोदी सरकार के राजनीतिक एजेंडे में कुछ ऐसे निर्णय रहे हैं, जिनका भारतीय राजनीति और सार्वजनिक विमर्श पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा है। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष संवैधानिक प्रावधानों को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी किया गया और जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन कर जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख को अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया। सरकार ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण और प्रशासनिक पुनर्गठन की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। इसके बाद क्षेत्र में सुरक्षा, निवेश, पर्यटन और विकास से जुड़े अनेक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया गया।
राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में मोदी सरकार ने आतंकवाद और उग्रवाद के प्रति कठोर एवं अधिक सक्रिय नीति अपनाई है। सितंबर 2016 में उरी आतंकी हमले के बाद नियंत्रण रेखा के पार की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने भारत की आतंकवाद-रोधी नीति में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया। फरवरी 2019 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट में की गई हवाई कार्रवाई ने सीमा पार आतंकवाद के विरुद्ध भारत के प्रतिरोधात्मक दृष्टिकोण को और स्पष्ट किया। इस नीति की अगली महत्वपूर्ण कड़ी ऑपरेशन सिंदूर रही। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद 7 मई 2025 को भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाया। इन कार्रवाइयों ने स्पष्ट किया कि भारत की आतंकवाद-रोधी नीति अब केवल कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं है। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट कार्रवाई और ऑपरेशन सिंदूर भारत की बदलती आतंकवाद-रोधी नीति के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हैं।
वामपंथी उग्रवाद या नक्सलवाद के विरुद्ध मोदी सरकार ने सुरक्षा कार्रवाई, विकास और प्रशासनिक पहुंच को साथ लेकर बहुआयामी रणनीति अपनाई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014 में नक्सलवाद से प्रभावित 126 जिले थे, जो अप्रैल 2024 तक घटकर 38 रह गए, दिसंबर 2025 में 8 और अप्रैल 2026 में नक्सलवाद से प्रभावित जिलों की संख्या शून्य हो गई। प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की तैनाती के साथ सड़क, दूरसंचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक पहुंच को बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। हालांकि, प्रधानमंत्री द्वारा ‘अर्बन नक्सल’ जैसी चुनौती का उल्लेख यह दर्शाता है कि सरकार उग्रवाद के वैचारिक और सामाजिक प्रभाव को भी सुरक्षा विमर्श का हिस्सा मानती है।
सामाजिक और कानूनी सुधारों में महत्वपूर्ण नियम
सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में मोदी सरकार ने व्यापक पैमाने पर योजनाओं को लागू किया है। प्रधानमंत्री जन-धन योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत और जल जीवन मिशन जैसी पहलों का उद्देश्य गरीब, ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों तक बुनियादी सुविधाओं की पहुंच बढ़ाना रहा है। विशेष रूप से आधार, बैंक खातों और मोबाइल तकनीक के संयोजन तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने कल्याणकारी योजनाओं के वितरण की प्रक्रिया को अधिक लक्षित और डिजिटल बनाया है। इन योजनाओं ने राज्य और नागरिक के बीच सेवा-प्रदान के संबंध को भी बदला है।
सामाजिक और कानूनी सुधारों के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। वर्ष 2019 में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम के माध्यम से तीन तलाक को अवैध और शून्य घोषित किया गया तथा इसके लिए दंडात्मक प्रावधान किए गए। इसी वर्ष 103वें संविधान संशोधन के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अधिकतम 10 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया गया। इन कदमों ने सामाजिक कल्याण, लैंगिक न्याय और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण को राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता दी।
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी मोदी काल की राजनीति और भारतीय सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल है। नवंबर 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद विवादित भूमि पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। अगस्त 2020 में भूमिपूजन और जनवरी 2024 में राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा ने दशकों पुराने धार्मिक-सामाजिक विवाद को एक नए चरण में पहुंचाया। यह घटना केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति, सांस्कृतिक पहचान और सार्वजनिक विमर्श की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रही।
अर्थव्यवस्था में सुधार
आर्थिक क्षेत्र में मोदी सरकार ने डिजिटलीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास को विशेष प्राथमिकता दी है। वस्तु एवं सेवा कर, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं ने अर्थव्यवस्था के संचालन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। यूपीआई ने डिजिटल भुगतान को व्यापक जनसुलभता प्रदान की और भारत के डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल को वैश्विक स्तर पर पहचान मिली। डिजिटल इंडिया के अंतर्गत आधार, मोबाइल और बैंकिंग प्रणाली के व्यापक उपयोग ने सरकारी सेवाओं और कल्याणकारी योजनाओं के वितरण को नया स्वरूप दिया है।
हालांकि, आर्थिक उपलब्धियों के साथ रोजगार, आय-वितरण, कृषि संकट, छोटे उद्यमों की चुनौतियां और क्षेत्रीय असमानता जैसे प्रश्न भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। भारत की अर्थव्यवस्था का आकार तेजी से बढ़ा है और वह विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। लेकिन आर्थिक विकास की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब विकास का लाभ व्यापक स्तर पर रोजगार, आय और जीवन-स्तर में सुधार के रूप में दिखाई दे।
मोदी काल की एक उल्लेखनीय विशेषता बुनियादी ढांचे के विकास की गति रही है। राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे, हवाई अड्डों, बंदरगाहों, मेट्रो नेटवर्क और ग्रामीण सड़कों के विस्तार पर बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है। वंदे भारत जैसी रेल सेवाओं, नए एक्सप्रेसवे और क्षेत्रीय हवाई संपर्क के विस्तार ने देश की अवसंरचनात्मक क्षमता को मजबूत किया है। बुनियादी ढांचे पर यह जोर केवल यातायात सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, निवेश और क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण से भी जोड़ा गया है।
भारत की संतुलित कूटनीति
‘आत्मनिर्भर भारत’ और उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन जैसी नीतियों के माध्यम से भारत को वैश्विक विनिर्माण और आपूर्ति शृंखलाओं का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने का प्रयास किया जा रहा है। मोबाइल फोन निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन और अन्य क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक कंपनियों द्वारा आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने की कोशिशों ने भारत के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। चुनौती यह है कि इन अवसरों को बड़े पैमाने पर रोजगार, कौशल विकास और निर्यात वृद्धि में कैसे बदला जाए।
राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति मोदी नेतृत्व के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रहे हैं। भारत ने आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और रक्षा आधुनिकीकरण को राष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श के केंद्र में रखा है। साथ ही, विदेश नीति में भारत ने पारंपरिक गुटनिरपेक्षता की तुलना में अधिक सक्रिय बहु-संरेखण (Multi-alignment)और रणनीतिक साझेदारियों की नीति अपनाई है। अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया तथा पश्चिम एशिया के देशों के साथ भारत ने समानांतर रूप से अपने संबंधों को आगे बढ़ाया है। क्वाड, ब्रिक्स, जी20 और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर भारत की सक्रिय भागीदारी उसकी बहुआयामी और संतुलित कूटनीति को दर्शाती है।
भारत की विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह किसी एक शक्ति-गुट के साथ पूर्ण रूप से जुड़ने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विभिन्न शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने का प्रयास करता है। रूस के साथ पारंपरिक रक्षा और ऊर्जा संबंधों को बनाए रखते हुए, भारत ने अमेरिका तथा यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक सहयोग को भी मजबूत किया है। पश्चिम एशिया में भी भारत ने इजरायल, खाड़ी देशों और ईरान के साथ अपने अलग-अलग हितों के अनुरूप संबंधों को संतुलित करने का प्रयास किया है। यही बहु-संरेखण भारतीय विदेश नीति को वर्तमान वैश्विक शक्ति-संतुलन में अधिक लचीला बनाता है।
भारत की वैश्विक भूमिका को नई ऊंचाई देने में 2023 का नई दिल्ली जी20 शिखर सम्मेलन महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। भारत ने वैश्विक दक्षिण के मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय विमर्श में प्रमुखता देने का प्रयास किया और अफ्रीकी संघ को जी20 का स्थायी सदस्य बनाए जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कूटनीतिक सक्रियता की अगली कड़ी के रूप में 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ। सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणा-पत्र को सर्वसम्मति से अपनाया गया, जिसने वैश्विक शासन, आर्थिक सहयोग, बहुपक्षवाद और वैश्विक दक्षिण से जुड़े मुद्दों पर भारत की प्राथमिकताओं को सामने रखा। ब्रिक्स की सफल मेजबानी ने स्पष्ट किया कि भारत अब वैश्विक मंचों का केवल सहभागी नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की दिशा और एजेंडा प्रभावित करने वाली प्रमुख शक्ति है।
आर्थिक वृद्धि के साथ रोजगार में बढ़ोत्तरी
तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में भी भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, यूपीआई, आधार और सरकारी सेवाओं के ऑनलाइन विस्तार ने भारत को डिजिटल शासन के एक विशिष्ट मॉडल के रूप में स्थापित किया है। चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत की अंतरिक्ष क्षमता और वैज्ञानिक आत्मविश्वास को मजबूत किया। अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के विस्तार ने भी नए अवसर पैदा किए हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, ड्रोन और डिजिटल तकनीक जैसे उभरते क्षेत्रों में भारत की क्षमता आने वाले वर्षों में उसकी आर्थिक और रणनीतिक शक्ति को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, मोदी नेतृत्व का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों के आधार पर करना पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र में किसी सरकार की सफलता का आकलन आर्थिक विकास और प्रशासनिक दक्षता के साथ, संस्थागत मजबूती, सामाजिक समावेशन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघवाद, संसद की प्रभावशीलता और संस्थाओं की स्वायत्तता के आधार पर भी किया जाना चाहिए। विपक्ष की भूमिका, मीडिया की स्वतंत्रता, राजनीतिक ध्रुवीकरण, सामाजिक तनाव और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर लगातार बहस होती रही है। इसलिए लोकतांत्रिक भारत की मजबूती के लिए विकास और राजनीतिक स्थिरता के साथ संस्थागत संतुलन भी आवश्यक है।
विकास के मॉडल का मूल्यांकन करते समय यह भी देखना होगा कि आर्थिक वृद्धि के साथ रोजगार के पर्याप्त अवसर कितनी तेजी से पैदा हुए हैं, ग्रामीण और शहरी भारत के बीच असमानता कितनी कम हुई है तथा शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मानवीय पूंजी में निवेश कितना प्रभावी रहा है। भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है, लेकिन इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और उत्पादक रोजगार के अवसरों का विस्तार अनिवार्य होगा।
मोदी युग को भारतीय राजनीति में केवल एक नेतृत्व परिवर्तन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह भारत की राजनीतिक संस्कृति, शासन शैली, आर्थिक प्राथमिकताओं और वैश्विक भूमिका में आए व्यापक परिवर्तन का दौर है। इस दौर की स्थायी विरासत का निर्णय समय करेगा। यदि भारत आर्थिक शक्ति को सामाजिक समावेशन, तकनीकी क्षमता को मानवीय विकास और वैश्विक प्रभाव को जिम्मेदार कूटनीति के साथ जोड़ने में सफल होता है, तो 2047 का विकसित भारत केवल एक सरकारी लक्ष्य नहीं, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय परिवर्तन की वास्तविक तस्वीर बन सकता है।
शशांक मणि त्रिपाठी
सांसद, देवरिया सदर एवं चिंतक
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