Critical Mineral Mission: धरती की गहराई से वैश्विक कूटनीति तक, भारत की नई रणनीतिक छलांग
Prabhat Tiwari
प्रभात तिवारी
India Critical Minerals Mission 2026: दुनिया में ऊर्जा परिवर्तन, इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर और हाई-टेक उद्योगों की बढ़ती मांग ने क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स को नई वैश्विक शक्ति का आधार बना दिया है। तेल और गैस के बाद अब लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ खनिजों पर नियंत्रण को लेकर देशों के बीच नए रणनीतिक समीकरण बन रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका, चीन, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देश खनिज सुरक्षा, सप्लाई चेन, तकनीकी साझेदारी और विदेश नीति को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत भी तेजी से अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत कर रहा है।
21वीं सदी में तेल और गैस के बाद जिस संसाधन को वैश्विक शक्ति संतुलन का नया आधार माना जा रहा है, वह है क्रिटिकल मिनरल्स। लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट, कॉपर और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिज अब केवल खनन उद्योग का विषय नहीं रहे, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष और डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। यही कारण है कि भारत ने पिछले दो वर्षों में इस क्षेत्र में अभूतपूर्व रणनीतिक सक्रियता दिखाई है।
35 देशों के साथ क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ सप्लाई चेन पर काम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने बीते 24 महीनों में 35 देशों के साथ क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ सप्लाई चेन को मजबूत करने की दिशा में व्यापक पहल की है। इनमें 24 देशों के साथ विभिन्न स्तरों पर समझौते और साझेदारियां स्थापित हो चुकी हैं, जबकि 11 देशों के साथ बातचीत जारी है। सरकार का लक्ष्य केवल खनिजों का आयात बढ़ाना नहीं, बल्कि खोज, खनन, प्रोसेसिंग, निवेश, तकनीकी सहयोग और दीर्घकालिक सप्लाई चेन विकसित करना है।

क्या हैं क्रिटिकल मिनरल्स और क्यों बढ़ी इनकी अहमियत?
दरअसल, क्रिटिकल मिनरल्स वे खनिज हैं जिनकी उपलब्धता सीमित है, लेकिन आधुनिक उद्योगों के लिए उनका महत्व अत्यधिक है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियां, मोबाइल फोन, कंप्यूटर, सेमीकंडक्टर चिप, सौर और पवन ऊर्जा संयंत्र, रक्षा उपकरण, मिसाइल सिस्टम, ड्रोन और अंतरिक्ष तकनीक इन खनिजों के बिना संभव नहीं हैं। दुनिया भर में हरित ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन कम करने की होड़ ने इनकी मांग कई गुना बढ़ा दी है। यही वजह है कि इन्हें अब ‘21वीं सदी का नया तेल’ भी कहा जाने लगा है।
भारत सरकार 30 क्रिटिकल मिनरल्स पर कर रही काम
भारत सरकार क्रिटिकल मिनरल्स की खोज की दिशा में दुनिया के कई देशों के साथ सर्वे और खनिजों को निकालने की दिशा में काम कर रही है। भारत सरकार के खान मंत्रालय ने देश की औद्योगिक और रणनीतिक जरूरतों को देखते हुए 30 क्रिटिकल मिनरल्स की पहचान की है। इनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, कॉपर, ग्रेफाइट, सिलिकॉन, रेयर अर्थ एलिमेंट्स, टाइटेनियम और टंगस्टन सहित कई महत्वपूर्ण खनिज शामिल हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों, सेमीकंडक्टर, मोबाइल फोन, सोलर पैनल, रक्षा उपकरण, अंतरिक्ष तकनीक और अन्य हाई-टेक उद्योगों में बड़े पैमाने पर किया जाता है, जिससे ये भारत की ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा के लिए बेहद अहम हैं। 30 क्रिटिकल मिनरल्स में प्रमुख रूप से एंटीमनी (Antimony), बेरिलियम (Beryllium), बिस्मथ (Bismuth), कोबाल्ट (Cobalt), तांबा (Copper), गैलियम (Gallium), जर्मेनियम (Germanium), ग्रेफाइट (Graphite), हैफनियम (Hafnium), इंडियम (Indium), लिथियम (Lithium), मोलिब्डेनम (Molybdenum), नाइओबियम (Niobium), निकेल (Nickel) शामिल है। इसके अलावा प्लेटिनम समूह के तत्व (PGE), फास्फोरस (Phosphorus), पोटाश (Potash), दुर्लभ पृथ्वी तत्व (Rare Earth Elements - REE), रेनियम (Rhenium), सिलिकॉन (Silicon), स्ट्रोंटियम (Strontium), टैंटलम (Tantalum), टेल्यूरियम (Tellurium), टिन (Tin), टाइटेनियम (Titanium), टंगस्टन (Tungsten), वैनेडियम (Vanadium), जिरकोनियम (Zirconium), सेलेनियम (Selenium), कैडमियम (Cadmium) शामिल है।

10 साल पहले की तस्वीर: आयात पर निर्भर और सीमित रणनीति
केंद्र की सत्ता में एनडीए की सरकार आने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से विदेश नीति और राष्ट्रीय नीतियों में काफी कुछ बदलाव देखने को मिल रहे हैं। करीब एक दशक पहले ऊर्जा जरूरतों, क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ के मामले में भारत की स्थिति काफी अलग थी। देश में क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर कोई व्यापक राष्ट्रीय रणनीति नहीं थी। आलम यह था कि हमारी अधिकांश जरूरतें आयात से पूरी होती थीं और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका बेहद सीमित थी। इस कारण हम क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ के मामले में अधिकांशतछ या कहें तो पूरी तरह से दूसरे देशों पर निर्भर थे। वहीं दूसरी तरफ, चीन का रेयर अर्थ प्रोसेसिंग का तरीका और कई महत्वपूर्ण खनिजों पर मजबूत नियंत्रण था, इस कारण भारत सहित अनेक देश आपूर्ति जोखिम का सामना भी कर रहे थे। उस समय इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग शुरुआती दौर में था, सेमीकंडक्टर निर्माण क्षमता लगभग नगण्य थी और ऊर्जा परिवर्तन की योजनाएं भी शुरुआती चरण में थीं। परिणामस्वरूप क्रिटिकल मिनरल्स राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक नीति का प्रमुख विषय नहीं बन पाए थे। तब भारत सरकार ने भविष्य को ध्यान में रखकर अपनी नीतियों में बदलाव किया और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कई बड़े समझौते किए हैं, जिसकी वजह से तेजी के साथ स्थितियां बदल रही हैं।
भारतीय विदेश नीति में बदलाव और व्यापार की तस्वीर
वर्तमान में भारत ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना दिया है। सरकार ने राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन शुरू किया है, जिसके तहत देश में नए खनिज भंडारों की खोज, निजी निवेश को बढ़ावा, विदेशी साझेदारियां और प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। भारत ने अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, नीदरलैंड, ब्राजील, अर्जेंटीना, डीआर कांगो, घाना, नामीबिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल, वियतनाम, मोजाम्बिक, जिम्बाब्वे, मलावी और रूस सहित अनेक देशों के साथ सहयोग स्थापित किया है। इसके अलावा चिली, पेरू, बोलिविया, जाम्बिया, कजाकिस्तान, मंगोलिया, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, म्यांमार और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ भी लिथियम, कॉपर और रेयर अर्थ खनिजों को लेकर बातचीत जारी है।
विदेश नीति का नया आयाम
भारत की विदेश नीति में अब ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ खनिज सुरक्षा भी महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर चुकी है। पहले जहां तेल और गैस का आयात प्रमुख चिंता के विषय हुआ करते थे, वहीं अब क्रिटिकल मिनरल्स भी रणनीतिक एजेंडा बन चुके हैं। भारत की कोशिश केवल खनिज खरीदने तक सीमित नहीं है। सरकार संयुक्त निवेश, विदेशी खदानों में हिस्सेदारी, तकनीकी सहयोग, प्रोसेसिंग इकाइयों की स्थापना और दीर्घकालिक सप्लाई चेन विकसित करने पर भी काम कर रही है। इससे वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत की निर्भरता कम होगी।
अर्थव्यवस्था और उद्योग को मिलेगा बड़ा लाभ
क्रिटिकल मिनरल्स की उपलब्धता भारत के औद्योगिक विकास को नई गति दे सकती है। इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग, बैटरी निर्माण, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ने की संभावना है। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसी योजनाओं को भी इससे मजबूती मिलेगी। घरेलू स्तर पर बैटरी और चिप निर्माण बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम होगी, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत खनिजों की खोज, प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन में सफलता हासिल करता है तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र अरबों डॉलर के निवेश और निर्यात का आधार बन सकता है।

भारत में 3 Semiconductor Plant शुरू, 12 प्रोजेक्ट्स निर्माणाधीन
भारत सेमीकंडक्टर निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। केंद्र सरकार अब तक 12 सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे चुकी है। इनमें गुजरात के साणंद स्थित माइक्रोन एटीएमपी, केन्स सेमीकॉन ओसैट और सीजी सेमी ओसैट में व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो चुका है, जबकि 12 अन्य परियोजनाएं निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। धोलेरा में देश का पहला फ्रंट-एंड फैब्रिकेशन प्लांट 2028 तक तैयार होगा। सरकार का लक्ष्य 2026 के अंत तक पांच सेमीकंडक्टर प्लांट्स में कमर्शियल उत्पादन शुरू कराना है।
राजनीतिक और रणनीतिक महत्व भी बढ़ा
क्रिटिकल मिनरल्स अब केवल आर्थिक विषय नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी सीधे जुड़े हैं। रक्षा उपकरण, मिसाइल, रडार, ड्रोन, संचार प्रणाली और आधुनिक हथियारों के निर्माण में इनका व्यापक उपयोग होता है। ऐसे में इन खनिजों की स्थिर उपलब्धता भारत की रक्षा तैयारियों के लिए भी बेहद जरूरी है। वैश्विक स्तर पर चीन का रेयर अर्थ बाजार में प्रभाव लंबे समय से बना हुआ है। ऐसे में भारत अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। इससे भारत की रणनीतिक स्थिति भी मजबूत होगी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा।
भविष्य की दिशा में तेजी से बढ़ते कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशक में जिस देश के पास क्रिटिकल मिनरल्स की सुरक्षित और विविध सप्लाई होगी, वही हरित ऊर्जा, डिजिटल तकनीक और हाई-टेक उद्योगों में वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर सकेगा। भारत फिलहाल सही दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। यदि विदेशी साझेदारियों के साथ घरेलू खोज, खनन, रिफाइनिंग, प्रोसेसिंग और रिसाइक्लिंग क्षमता का भी तेजी से विस्तार किया गया, तो भारत केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि वैश्विक क्रिटिकल मिनरल्स वैल्यू चेन का एक प्रमुख खिलाड़ी बन सकता है। स्पष्ट है कि क्रिटिकल मिनरल मिशन केवल खनिजों की उपलब्धता का कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था, विदेश नीति, औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा को नई दिशा देने वाली दीर्घकालिक रणनीति है। आने वाले वर्षों में यही रणनीति भारत को हरित अर्थव्यवस्था, सेमीकंडक्टर निर्माण और वैश्विक सप्लाई चेन के केंद्र में स्थापित करने की आधारशिला बन सकती है।
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