पंच परिवर्तन की उपादेयता

पंच परिवर्तन के अंतर्गत सर्वाधिक मौलिक तत्व सामाजिक समरसता है । भारत का समाज आंतरिक स्तर पर विभिन्न षडयंत्रों ,आंतरिक विभाजनों ,राजनीतिक शत्रुता एवं क्षेत्रीय विभाजनकारी शक्तियों से संघर्ष करता रहा हैं । विखंडित समाज से सशक्त राष्ट्र -राज्य का निर्माण संभव नहीं है। समाज को सशक्त करके ही राष्ट्र की मजबूती हो सकती है।
पंच परिवर्तन की उपादेयता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने नागपुर में अपने वार्षिक विजयादशमी उद्बोधन में यह प्रतिपादित किया कि पांच सूत्रीय पंच परिवर्तन अभियान समाज के व्यावहारिक स्वरूप में क्रमिक एवं सकारात्मक परिवर्तन लाने का संकल्प मंत्र है। इस सकारात्मक पहल में नागरिक, विधिक एवं संवैधानिक कर्तव्यों के प्रति निष्ठा के साथ-साथ सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्यों के प्रति आभार, पारिवारिक मूल्यों एवं आदर्शों का संरक्षण, पर्यावरण के प्रति नागरिक संचेतना, स्वत्त्व की अवधारणा एवं आत्मनिर्भर जीवन शैली का उच्चतर स्तर पर मूल्यों का उन्नयन है। भारत की भूमि उर्वरा भूमि, ऋषियों की भूमि एवं तपस्वियों का तपोस्थली रहा है, जिनका वैश्विक स्तर पर वसुधैव कुटुंबकम एवं पृथ्वी के प्रति मात्री दृष्टिकोण एवं सहयोगात्मक जीवनदर्शन है, जो मौलिक मूल्यों, आध्यात्मिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक मूल्यों में उन्नयन कर रहा है। भारत- भूमि की इस पावन तपोभूमि एवं वट वृक्ष की साकार अवधारणा मानवता की सेवा एवं आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति मानव एवं मानव समुदाय के प्रति दैवीय पदार्पण है। पंच परिवर्तन की अवधारणा समतामूलक एवं संगठित समाज के प्रति ईश्वरीय आशीर्वाद है।

कुटुम्ब प्रबोधन

 प्राचीन काल में भारत की सांस्कृतिक विविधताओं ,भौतिक संपन्नता, धन-धान्य से उन्नत सामग्री, साहित्यिक क्षेत्र में गरिमा पूर्ण प्रगति, उच्चतर नैतिक मूल्यों की बढ़ोतरी, सांस्कृतिक आयामों में उज्जवल समृद्धि, गुणात्मक मानवीय समुदाय के सारगर्भित अवस्था इत्यादि ने तत्कालीन भारत को विश्व गुरु के स्तर पर आसीन था। यह विशेषण सांस्कृतिक गौरव के साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक स्तर पर स्वीकृत थी। यह संपदा वैश्विक बौद्धिक इतिहास के मानवीय, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का नूतन प्रसाद था, जो मानवीय समाज की बौद्धिक दैवीय ज्ञान को सामाजिक सद्भाव एवं नैतिक मूल्य के साथ नागरिक शिष्टाचार का अद्वितीय मूल्योंपादता है। तत्कालीन बौद्धिक समाज में नालंदा विश्वविद्यालय एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय दक्षिण एशिया ,पूर्वी एशिया एवं पांडित्य के प्रति जिज्ञासु विद्यार्थियों के ज्ञान पिपासा एवं ज्ञान अन्वेषण का बौद्धिक एवं सांस्कृतिक केंद्र था।

सामाजिक समावेशन राष्ट्र की एकता एवं अखंडता के प्राणवान कारक हैं, जो राष्ट्रीयता के उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सामाजिक समरसता भारत की संस्कृति की आत्मा में है। यह समाज में एकत्व की भावना का सार है। भारत के संविधान के अंतर्गत समानता की भावना दृष्टिगोचर है, जो समाज में उच्च- नीच ,जाति -पाती एवं अन्य सामाजिक बुराइयों का निषेध करता है। यह विविधता की आत्मा का आत्मबोध है, जो धर्म, जाति, लिंग एवं वंश के आधार पर सामाजिक विभेदीकरण का लोप कर रहा है। यह समानता के तत्व का सहअस्तित्व है।

सामाजिक समरसता

सामाजिक समरसता अंतःकरण की करुणा, दया एवं सहानुभूति से प्रस्फुटित होता है। समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को ‘ सम्मान’ एवं ‘समानता’ प्राप्त होती है, तो सामाजिक समरसता का सिद्धांत का प्रासंगिक है।

वर्तमान सरकार ने अपने अनेक शासकीय पहलों में भी सामाजिक समावेशन की नीति का क्रियान्वयन किया है। प्रधानमंत्री जन -धन योजना, आयुष्मान भारत योजना एवं उज्जवला योजना के कार्यक्रम आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए मुख्य धारा से जोड़ने का शासकीय प्रयास है। शासकीय व्यवस्था का सामाजिक कल्याण नीतियों एवं संघ की सामाजिक समरसता की अवधारणा एक समान सामाजिक आकांक्षा को अभिव्यक्त करते हैं।

पंच परिवर्तन का दूसरा स्तंभ कुटुंब प्रबोधन है, जो सांस्कृतिक तत्व के संरक्षण में कुटुंब की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है। कुटुंब प्रबोधन का उद्देश्य संकटग्रस्त पारिवारिक सामाजिक जीवन को सुरक्षित करना है। प्राचीन काल से परिवार भारत की सबसे बड़ी विशेषता एवं मौलिक उपलब्धि रही है। परिवार भारतीय जीवन का सर्वाधिक स्थाई एवं जीवंत इकाई है। यह व्यक्तियों के मूल्य, भावना, सहयोग, संवेदना एवं सहानुभूति की इकाई है। यह सामाजिक संगठन की सबसे छोटी किंतु सर्वाधिक प्रभावशाली इकाई है। परिवार में ही कर्तव्य -, अनुशासन, परस्पर सम्मान एवं सामूहिक उत्तरदायित्व आदि नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का उन्नयन होता है।
 
परिवार मानवीय संबंधों का संयोजक है, जहां करुणा, त्याग, आत्मीयता एवं सहयोग का व्यावहारिक प्रशिक्षण होता है। परिवार में विखंडन कुटुंब प्रबोधन के लिए नुकसानदायक होता है। परिवार की प्रबलतासामाजिक संबंधों को मजबूती देता है। सामयिक में शासकीय पहलें भी सामाजिक संस्थाओं को सुदृढ़ करके कुटुंब प्रबोधन को मजबूती प्रदान कर रहे हैं । ‘बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ’ अभियान परिवार में महिलाओं के सशक्तिकरण को जोर देकर कुटुंब प्रबोधन को मजबूती दे रहा है।

पर्यावरण संरक्षण

पंचपरिवर्तन का तीसरा आयाम पर्यावरण संरक्षण है। संघ द्वारा पर्यावरणीय कारकों पर दिया गया जोर ‘दार्शनिक परंपराओं’ से प्रेरित है। यह जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखा जाता है । पर्यावरण सतत् विकास का महत्वपूर्ण अव्यय है। यह  मनुष्य की चेतना में गहन बोध का पुनर्जागरण है जिसमें प्रकृति एवं जीवन अविभाज्य रूप से दिखते हैं। पर्यावरण आपदाओं से वैश्विक समुदाय ग्रसित है। भारत भी पर्यावरण जोखिम से प्रभावित है। हम सभी को विकास का एक ऐसा प्रतिदर्श विकसित करना है जो पर्यावरण अनुकूल हो। इसी के कारण संघ पर्यावरण संरक्षण पर जोर दे रहा है। पर्यावरणानुकूल जीवन शैली स्वास्थ्य सह विकास को प्रोत्साहित कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण भारत के संविधान के अंतर्गत मौलिक कर्तव्य की श्रेणी में है जो नागरिकों का मूल कर्तव्य है और इसकी प्रकृति नैतिक आधार की है। भारत सरकार ने भी पर्यावरण स्थिरता पर बल दिया है। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, स्वच्छ भारत मिशन एवं नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के प्रसार पारिस्थितिकी उत्तरदायित्व की दिशा में नीतिगत परिवर्तन का संकेतक है।

स्वदेशी आचरण

पंच परिवर्तन का चौथा आयाम स्वदेशी आचरण है जो आर्थिक आत्मनिर्भरता एवं राष्ट्रीय आत्मविश्वास का अभ्यास अध्याय हैं । स्वदेशी ‘आचरण’ से संबंधित है जिसका आशय स्वदेशी आर्थिक व्यवस्थाओं के समर्थन से है। स्वदेशी की अवधारणा भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ी है।स्वदेशी व्यवहार औपनिवेशिक आर्थिक शोषण का प्रतीक थी एवं स्थानीय उत्पादों के अनुप्रयोग  को प्रोत्साहित करती थी। स्वदेशी का आशय आत्मनिर्भरता के माध्यम से आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना है। आत्मनिर्भरता सांस्कृतिक एवं नैतिक आधार है। स्वदेशी का बोध व्यक्ति को प्रबोधित करता है कि व्यक्ति का विकासात्मक पहलू बाहरी वस्तुओं में नहीं ,बल्कि आत्मविश्वास एवं सांस्कृतिक संवेगों  में हैं। भारत सरकार ने भी स्वदेशी के संकल्प को पूर्ण करने के लिए सकारात्मक एवं दूरदर्शी पहल किया है। भारत सरकार द्वारा चलाए गए आत्मनिर्भर भारत अभियान का उद्देश्य घरेलू- निर्माण को मजबूत करना है एवं वह देश के आपूर्ति तंत्रों पर निर्भरता को कम करना है । ‘स्टार्टअप’ एवं ‘मेक इन इंडिया’ योजनाओं से देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती को बढ़ाना।

नागरिक कर्तव्य

पंच परिवर्तन का पांचवा आयाम नागरिक कर्तव्य है। नागरिक कर्तव्य का आशय उत्तरदाई नागरिकता एवं लोकाचार से है। उत्तरदाई एवं जिम्मेदार नागरिकता के संस्कार का उन्नयन करना ही भारत की भावना का उन्नयन करना है। लोकतंत्र में अधिकारों के साथ कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का समन्वय नागरिक कर्तव्य की आधारशिला है। नागरिक कर्तव्य उस चेतना का अवयव है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र की अखंडता का संवाहक है। व्यक्ति का आचरण, विचार एवं व्यवहार सामूहिक जीवन को प्रभावित करता है,वही वास्तविक नागरिक कर्तव्य है।

 पंच परिवर्तन की अवधारणाओं को जीवन में साकार करके विकसित भारत @ 2047 के लक्ष्य को साकार किया जा सकता है । इससे आर्थिक आत्मविश्वास सभ्यतागत पुनरुत्थान का अनिवार्य स्तंभ है। यह संपूर्ण मानवता के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है। यह उस चेतना में है, जो मनुष्य को अपने भीतर और बाहर दोनों में संतुलन स्थापित करने की शक्ति देती है। पंच परिवर्तन वह साधना है, जिसमें स्व का प्रबोध,कर्तव्य का अनुशासन, प्रकृति का संतुलन, समाज की समरसता और परिवार की आत्मीयता मिलकर जीवन को उस स्तर पर ले जाते हैं जहां अंतःकरण का सत्य ही बाहर की व्यवस्था का रूप ले लेता है।

प्रोफेसर अनुराग मिश्रा 
दीन दयाल कॉलेज,दिल्ली विश्विद्यालय।

अन्य प्रमुख खबरें