राष्ट्र निर्माण के प्रति संकल्पित संघ

संघ का विचारधारा "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" पर आधारित है। यह व्यक्ति- निर्माण, चरित्र- निर्माण एवं राष्ट्र- निर्माण का उत्तरोत्तर एवं उत्तरदाई संगठन है। संघ की एकता, साझा संस्कृति ,परंपरा, इतिहास, त्याग एवं राष्ट्र- निर्माण के मूल्य से जुड़ी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद सांस्कृतिक चेतना लोक पुनर्जागरण एवं सामाजिक सौहार्द से काम करता है ,जो समाज को संगठित समाज से जोड़ती है।
राष्ट्र निर्माण के प्रति संकल्पित संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ( आरएसएस)एक सामाजिक, सांस्कृतिक ,गैर- राजनीतिक एवं हिंदू समाज का राष्ट्रवादी संगठन हैं ,जिसकी स्थापना सन् 1925 में नागपुर में आद्य सरसंचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। संघ मन , कर्म एवं आत्मभाव से "मातृभूमि" की सेवा करने के उद्देश्य से स्थापित हुआ था। संघ व्यक्ति -निर्माण हेतु समर्पित, संकल्पित एवं मातृभूमि सेवार्थ वैश्विक स्तर का वृहद स्वयंसेवी संगठन है। इस संगठन में दया, करुणा ,ममता ,अर्पण ,तर्पण एवं समर्पण का "भावना" विद्यमान है। यह वैश्विक स्तर का वृहद सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन है, जिसका मौलिक लक्ष्य " भारत को अखंड सांस्कृतिक राष्ट्र के स्तर पर स्थापित करना है।" यह भारत के 'बुनियादी स्तंभ' का उन्नयन किया है।

संघ का उद्देश्य "भारत को अखंड सांस्कृतिक भू- भाग के रूप में स्थापित करना है।" यह भारत की बुनियाद को मजबूत किया है। भारत के संप्रभुता की रक्षा किया हैं ,कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने में सहयोग किया है एवं भारतीय सभ्यता के मूल्यों, आदर्शों एवं संस्कारों का उन्नयन किया है। संघ नि: स्वार्थ सेवा का जीवंत प्रतीक है। राष्ट्र का निर्माण व्यक्तियों के उत्तम एवं संगत चरित्र से होता है । संघ 'दैनिक शाखाओं ' एवं 'साप्ताहिक मिलन' कार्यक्रमों एवं संकल्पित भावना से राष्ट्र- निर्माण में सहयोग करता है। समर्पित एवं आत्माप्रित भाव से समाज के प्रत्येक क्षेत्र में स्वयंसेवक लगन से काम कर रहे हैं, उनका मौलिक उद्देश्य" भारत को परम वैभव , सर्वशक्तिशाली एवं वैश्विक गुरु" के स्तर पर स्थापित करना है। हिंदू समाज को संगठित करके ,समाज में सज्जन शक्तियों का प्रसार करके, समाज को एकजुट करके, सभी शक्तियों में सदभाव व स्नेह का वातावरण उत्पन्न करके "राष्ट्रीय एकता ,अखंडता एवं सांस्कृतिक गौरव का उन्नयन किया जा सके।"

संघ एक सामाजिक सांस्कृतिक संगठन के रूप में "राष्ट्रीय एकता और आत्मनिर्भरता "के साथ उभरा है। 27 सितंबर, 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के द्वारा की गई, जो एक चिकित्सक एवं राष्ट्रवादी चिंतक थे एवं ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान "हिंदुओं में सामाजिक असंगठन एवं कमजोरी" से अत्यधिक व्यथित थे। डॉ. साहब का मानना था कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन है जिसका उद्देश्य " हिंदू समाज को एकजुट करना, देशभक्ति, आत्मनिर्भरता एवं सेवा मूल्यों के प्रत्यय को बढ़ाना है।"

अपने स्थापना की शुरुआती वर्षों में ' युवाओं के बीच चरित्र- निर्माण, व्यक्तिः निर्माण एवं अनुशासन के उन्नयन के लिए ध्यान केंद्रित किया था, जिसके लिए" दैनिक शाखाएं" आयोजित की जाती थी। इन शाखाओं में शारीरिक क्रियाएं, शारीरिक कसरत, खेल , देशभक्ति गीत, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय विषयों पर विचार- विमर्श होता था। इस कार्य से व्यक्तियों में "राष्ट्रीयता की भावना" का उन्नयन किया जाता हैं ,जिससे वे राष्ट्र -निर्माण में अपने अभीष्ट योगदान के निरंतरता को बनाए रखें।

संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा बताए गए" पंच परिवर्तन" के गुरुत्वीय मंत्र एवं साधक पाथेय से समाज एवं राष्ट्र के सामने आने वाली " ज्वलंत समस्याएं एवं नई चुनौतियों" का मुकाबला करने का एक ' कार्ययोजना ' प्रस्तुत किए हैं। 'स्वबोध ' यानी आत्म जागरूकता ताकि हम औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त हो सके एवं अपनी स्व विरासत पर गर्व करते हुए 'स्वदेशी के सिद्धांत ' को आत्माप्रित कर सकें।' सामाजिक समरसता' यानी सामाजिक सदभाव ताकि वंचित वर्गों को मुख्य धारा सेअसमायोजित लोगों एवं विकास की संकल्पना से अनजान लोगों को प्राथमिकता देकर "सामाजिक न्याय" सुनिश्चित किया जा सके।' कुटुंब प्रबोधन' यानी पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करना जो भारतीय संस्कृति की नींव है ।'नागरिक शिष्टाचार' यानी हर नागरिक में नागरिक बोध एवं जिम्मेदारी की भावना जागृत करना है, एवं 'पर्यावरण की रक्षा ' यानी आने वाली पीढियां के भविष्य की सुरक्षा करना एवं सतत विकास को प्राप्त हेतु प्रोत्साहित करना है।

संघ ने राष्ट्र के नैतिक एवं सांस्कृतिक पथ को "नवीन आयाम एवं नवीन दिशा "प्रदान किया है। यह अपने असाधारण कार्यक्षमता , विवेकी कौशल एवं रचनात्मक कार्यक्रमों से राष्ट्र की महत्ती सेवा किया है। यह भारत माता के प्रति सच्ची भावना ,व्यक्तिगत त्याग एवं उद्देश्य की प्रमोच्चता की स्पष्टता से " भारत माता को परम वैभवशाली बनाने में समर्पित रहे हैं।" संघ अपने विवेकी सोच, क्रियात्मक कार्य, संगठित प्रयास एवं सतत प्रयास से परम वैभवशाली भारत की दिशा में अग्रसर है । स्वयंसेवक " शाखाओं के माध्यम" से एवं अपने विवेकी कौशल से निरंतर कार्यकर्ताओं से संपर्क व संवाद करके "राष्ट्र के लिए समर्पित रहते हैं।" संघ हमेशा श्रेष्ठ कार्य पद्धति एवं बदलते समय के प्रति खुले दिमाग एवं मन से काम करते हुए स्वयंसेवकों के ऊर्जा को नया आयाम दिया है ।संघ के विचारों में स्पष्टता ,लक्ष्य के प्रति जुनून, कार्यों में भरपूर ऊर्जा एवं लक्ष्य के प्रति संकल्प संघ की विशिष्ट विशेषता हैं।"

 संघ अपने स्वयंसेवकों को "भारत बोध" से अनुप्राणित करते हुए "निष्काम कर्म एवं निष्काम सेवा" करने की प्रेरणा देता है। यह दैनिक जीवन में अध्यात्म की सेवा से ही संभव है। संघ ने भारत बोध की दिशा की अवधारणा के उन्नयन में महनीय भूमिका निभाया है।' राष्ट्र' के नैतिक एवं सांस्कृतिक पथ को "नवीन आयाम एवं नवीन दिशा" प्रदान किया है। संघ के स्वयंसेवकों ने अपने असाधारण कार्यक्षमता, विवेकी कौशल एवं रचनात्मक कार्यक्रमों से राष्ट्र का अनवरत सेवा किया है। यह "भारत माता के प्रति आस्थावान भावना, व्यक्तिगत त्याग एवं उद्देश्य की स्पष्टता से भारत माता को परम वैभवशाली बनाने में समर्पित रहे हैं।" संघ" दैनिक शाखाओं "के माध्यम से एवं अपने विवेकी कौशल से निरंतर" कार्यकर्ताओं से संपर्क व संवाद करके राष्ट्र के लिए समर्पित रहे हैं।"


डॉ.सुधाकर कुमार मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक

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