भारत के नवनिर्माण का महामंत्र - वन्दे मातरम्
'वन्दे मातरम्' सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पदयात्रा और राष्ट्रीय भावनाओं की संकल्पबद्ध अभिव्यक्ति है। यह राष्ट्रीय जागरण का सशक्त स्वर तथा "राष्ट्रवाद के प्रखर उन्नयन का महामंत्र रहा है।" औपनिवेशिक शासन के दौर में 'वन्दे मातरम्' ने भारतीय जनमानस में राष्ट्रीय चेतना के संचार और स्वाधीनता के आकांक्षा को प्रबल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके सामूहिक गायन से राष्ट्रवादी चिंतकों, स्वतंत्रता संग्राम के प्रबल समर्थकों एवं क्रांतिकारियों में "राष्ट्र के प्रति एकता ,समर्पण ,स्वाधीनता की उत्कट अभिलाषा और संघर्ष के प्रति अदम्य साहस जाग्रत होता था।"
श्रद्धा और स्वतंत्रता का संकल्प
स्वतंत्रता संग्राम में ' वन्दे मातरम् 'मात्र एक गीत ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता,मातृभूमि के प्रति संकल्पित श्रद्धा और स्वतंत्रता के संकल्प का प्रभावशाली प्रतीक बन गया था। यह संघर्षरत वीरों एवं वीरांगनाओं के लिए उस ऊर्जा- स्रोत के समान था जो उन्हें मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा और संबल प्रदान करता था। इस प्रकार ' वन्दे मातरम् ' भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में "सांस्कृतिक चेतना, देशभक्ति और स्वाधीनता संकल्प को एक सूत्र में पिरोनेवाला सशक्त राष्ट्रगीतात्मक उद्घोष बनकर उभरा।"
तत्कालीन परिस्थितियों में कंपनी के अधिकारी शोषणकारी औपनिवेशिक व्यवस्था के प्रतिनिधि बन चुके थे। कंपनी के संरक्षण प्राप्त ठेकेदार और बिचौलिए अपने आर्थिक स्वार्थ एवं कमीशन की लालसा में किसानों एवं खेतिहर समुदायों पर कंपनी के इच्छानुसार फसलों की खेती के लिए दबाव डालते थे। इस प्रकार कृषि व्यवस्था पर कंपनी का नियंत्रण निरंतर बढ़ता चला गया और कृषक समुदाय आर्थिक शोषण ,उत्पीड़न एवं विवशता की स्थिति में पहुंचता गया।
आंदोलन के लिए ऊर्जादाई मंत्र
कंपनी की अमानवीय एवं शोषणकारी नीतियों तथा उसके संरक्षण प्राप्त ठेकेदारों के कठोर एवं क्रूर व्यवहार से उत्पन्न और असंतोष ने क्षेत्र के साधु- संतों, सन्यासियों एवं बैरागियों को प्रतिरोध के लिए प्रेरित किया। कालांतर में यह प्रतिरोध सशस्त्र विद्रोह के रूप में अभिव्यक्त हुआ। ब्रिटिश सत्ता ने इस विद्रोह का अत्यंत कठोरता पूर्वक दमन किया। इस घटनाक्रम ने ईस्ट इंडिया कंपनी की उस औपनिवेशिक प्रशासनिक संस्कृति को उजागर किया जिसकी प्रमुख विशेषताएं "शोषण, उत्पीड़न, दमन, निरंकुशता, जन विरोधी नीतियां एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व का अभाव थीं।"
'वन्दे मातरम्' का गायन उत्पीड़ित एवं शोषित जनता की रगों में प्रतिरोध की ऊर्जा का स्वत: स्फूर्त संचार करता था। यह स्वतंत्रता आंदोलन के लिए ऊर्जादाई मंत्र और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त प्रतीक बन गया था।' वन्दे मातरम् 'के गायन से क्रांतिकारी में अदम्य साहस ,अपार ऊर्जा और असीमित क्षमता का संचार होता था । "भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में यह गीत केवल देशभक्ति की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना , संघर्ष और आत्मबल का शाश्वत एवं अमर प्रतीक बनकर उभरा।"
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी तत्कालीन बंगाल में अपने प्रशासकीय दायित्वों के निर्वहन के दौरान अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भारतीय जनता पर किए जा रहे अत्याचार, शोषण एवं उत्पीड़न को निकट से देखें। इन दमनकारी एवं अमानवीय परिस्थितियों ने उनके मन को गहराई से उद्वेलित किया। इसी राष्ट्रीय चेतना और मातृभूमि के प्रति उत्कट भावबोध की साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप में उन्होंने अपने प्रसिद्ध ' आनंद मठ' में' वन्दे मातरम् 'की रचना की।
वीरों के प्रति श्रद्धा
'वन्दे मातरम् ' कालांतर में केवल साहित्यिक रचना न रहकर भारतीय राष्ट्रीय चेतना, मातृभूमि- भक्ति और स्वतंत्रता की आकांक्षा का सशक्त प्रतीक बन गया राष्ट्रीय आंदोलन के संघर्षपूर्ण दौर में इस गीत ने जनमानस में स्वाधीनता, आत्म सम्मान और राष्ट्रभक्ति की भावनाओं को जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत माता की वंदना और राष्ट्र की स्वतंत्रता के संकल्प से ओत- प्रोत यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों एवं जनसाधारण के लिए प्रेरणा एवं भावात्मक ऊर्जा का प्रभावशाली स्रोत बन गया।
देश की संसद ने शहीद क्रांतिकारियों तथा भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करने के साध्य के रूप में ' वन्दे मातरम् 'को कानूनी संरक्षण प्रदान किया है। संसद लोकतंत्र की आत्मा एवं मंदिर होती है। ' वन्दे मातरम् ' की गीत में राष्ट्रीयता की भावना, राष्ट्र -राज्य के प्रति आत्मीयता, समर्पण एवं संकल्प की भावनात्मक प्रत्यय हैं," जो भारत को एकसूत्रता ,अखंडता एवं राष्ट्रीयता का उन्नयन करता है।"
1896 से कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों का प्रारंभ' वन्दे मातरम् ' के सामूहिक गायन से होने लगा। तत्कालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह राष्ट्रीय गीत केवल देशभक्ति की अभिव्यक्ति नहीं था, बल्कि विभिन्न राजनीतिक धाराओं को एकजुट करने, राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ करने तथा ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों और ' फूट डालो और राज करो की नीति' का विरोध करने का प्रभावी माध्यम थी।' वन्दे मातरम् ' ने जनमानस में राष्ट्रीयता की भावना को जाग्रत करने तथा कांग्रेस के कार्यक्रमों और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति जन समर्थन एवं लोकप्रियता को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध
'वन्दे मातरम्' के गायन में भारत माता के प्रति अटूट श्रद्धा, समर्पण और राष्ट्र भाव की सजीव अभिव्यक्ति निहित है। व्यक्ति और राष्ट्र के मध्य स्थापित यह भावनात्मक संबंध ही राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है। अधिवेशनों , संगोष्ठियों एवं विभिन्न राष्ट्रीय कार्यक्रमों में' वन्दे मातरम् 'का सामूहिक गायन मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता, सम्मान और आत्मीयता की भावना को अभिव्यक्ति करता है। वस्तुतः कृतज्ञता मात्र भाव की अभिव्यक्ति नहीं ,बल्कि कर्तव्य- बोध का प्रथम सोपान है। यही भाव नागरिकों को राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को निर्वहन के लिए प्रेरित करता है।
सामयिक संदर्भ में' वन्दे मातरम्' भारत के नवनिर्माण का प्रभावशाली महामंत्र है। यह राष्ट्र के प्रति नागरिकों में अगाध श्रद्धा और समर्पण की भावना का संचार करता है। कृतज्ञता व्यक्ति में अपने राष्ट्र के प्रति कर्तव्य- बोध को जाग्रत करती है और उसे राष्ट्रहित में रचनात्मक योगदान के लिए प्रेरित करती है। यही भाव विकास की समग्र कार्य योजना को गति प्रदान करता है। इस दृष्टि से ' वन्दे मातरम् ' राष्ट्रभक्ति का उद्घोष नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना , कर्त्तव्यपरायणता और राष्ट्र- निर्माण की भावना को उन्नयन करने वाला महत्वपूर्ण साधन है।
'वन्दे मातरम्' को आत्मसात करने से राष्ट्र के प्रति ईमानदारी, निष्ठा और कर्तव्य- बोध की भावना मजबूत होती है। यह नागरिकों में संविधान में निहित मौलिक कर्तव्यों के प्रति सम्मान, उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है । इसके माध्यम से समाज में समरसता, एकता और बंधुत्व को बल मिलता है तथा समावेशी विकास की अवधारणा सुदृढ़ होती है । विकास का वास्तविक आशय तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और प्रत्येक नागरिक राष्ट्र की प्रगति में सहभागी बने।
' वन्दे मातरम् ' समाज की सामूहिक और सांस्कृतिक अधिरचना का सशक्त अनुनाद है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान यह राष्ट्रीय एकता, धर्म ,स्वराज के प्रति संघर्ष और औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रेरणा स्रोत बना था। सामयिक संदर्भ में ' वन्दे मातरम् ' विकसित भारत 2047, आत्मनिर्भर भारत, सशक्त भारत, गरीबी मुक्त- भारत और अखंड भारत का संकल्प है। निःसंदेह यह राष्ट्र की सामूहिक चेतना को जाग्रत करने वाला' वन्दे मातरम्' विकसित भारत 2047 के निर्माण का महामंत्र सिद्ध होगा !!
युगल किशोर मिश्रा
प्रधानाचार्य ,
सरस्वती शिशु मंदिर इंटर कॉलेज,सुल्तानपुर।
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