संघ के वैश्विक उभार से घबराए वामपंथी लोग
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं गैरराजनीतिक संगठन के रूप में समाज और राष्ट्र के प्रति अपने प्रतिबद्धता के कारण निरंतर प्रसांगिक बना रहा है। संघ की कार्य पद्धति का मूल आधार व्यक्तनिर्माण ,सामाजिक समरसता और राष्ट्र सेवा की भावना को मन, कर्तव्यनिष्ठ एवं सत्यनिष्ठ आचरण के माध्यम से संघ के स्वयंसेवक मातृभूमि की सेवा को अपना दायित्व मानकर निरंतर कार्य कर रहे हैं। स्वयंसेवकों का यही राष्ट्र सेवा की भावना व्यक्ति को" विकसित भारत, 2047" के संकल्प के प्रति प्रतिबद्ध होने की प्रेरणा प्रदान करती है।
विषम परिस्थितियों में विश्व का साथ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यक्तिनिर्माण को राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला मानते हुए बृहद स्तर पर कार्यरत स्वयंसेवक संगठन है। इसके कार्यों में सेवा, संवेदना ,दया ,करुणा ,ममता, त्याग ,अर्पण एवं समर्पण जैसे माननीय मूल्यों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है। स्वयंसेवकों के माध्यम से इन मूल्यों को सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया जा रहा है। इस दृष्टि से संघ का उद्देश्य केवल संगठनात्मक विस्तार नहीं, बल्कि चरित्रवान, अनुशासित, संवेदनशील और राष्ट्र -निष्ठ नागरिकों के निर्माण के माध्यम से समाज को सशक्त एवं संगठित बनाना है।
प्रवासी भारतीय समुदाय के प्रति संघ ने सदैव मानवीय, सहानुभूतिपूर्ण एवं बंधुत्व दृष्टिकोण अपनाया है। वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों के साथ संघ के संबंधों में सहयोग, समन्वय और मानवीय संवेदना की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पड़ोसी देशों सहित विश्व के विभिन्न भागों में निवास कर रहे प्रवासी भारतीयों के प्रति संघ ने आवश्यकता के समय सहयोग एवं सहायता की भावना को निरंतर प्राथमिकता दिया है। संघ के अधिकारी ,समन्वय एवं कार्यकर्ता संकट एवं विषम परिस्थितियों में प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ खड़े होकर मानवी सहयोग एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का परिचय देते रहे हैं। यह दृष्टिकोण संघ की व्यापक मानवीय चेतना, सामाजिक समरसता और वैश्विक भारतीय समुदाय के प्रति आत्मीय प्रतिबद्धता को अभिव्यक्त करता है।
संघ का उद्देश्य "परम वैभवशाली भारत" के निर्माण की दिशा में कार्य करना है। यह वैश्विक स्तर पर विस्तृत सांस्कृतिक संगठन है, जो अखंड सांस्कृतिक भारत की संकल्पना को अपने कार्यों का आधार मानता है। संघ ने राष्ट्र के बुनियादी स्तंभों को मजबूत करने तथा अपने विधिक सेवाप्रकल्पों के माध्यम से समाज के "कमजोर एवं वंचित वर्गों के सशक्तिकरण में योगदान दे रहा हैं।"
वसुधैव कुटुंबकम" की अवधारणा
संघ भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण, संवर्धन एवं भारतीय मूल के लोगों में "राष्ट्रीयता की भावना" के प्रसार के लिए भी कार्य कर रहा है। इसके साथ ही संघ ने अपने आदर्शों एवं मूल्यों की सामाजिक उपयोगिता को व्यापक बनाने का प्रयास कर रहा है। धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक संगठन, सामाजिक समरसता एवं सौहार्द के संवर्धन के क्षेत्र में भी संघ की भूमिका उल्लेखनीय एवं सराहनीय है।
संघ का मानना है कि "वसुधैव कुटुंबकम"की उदात्त अवधारणा को केवल वैचारिक आधार तक सीमित न रखकर उसके व्यावहारिक अनुप्रयोग को सामाजिक जीवन का आधार बनाया जाना चाहिए। धार्मिक उपासना पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं, किंतु मानवीय संबंधों की मूल आधारभूमि मानवता ,परस्पर सम्मान और सार्वभौमिक कल्याण की भावना है। "सत्य का स्वरूप मूलतः एक है और समस्त मानवता इस एक सत्य की अभिव्यक्ति है।" मनुष्य की विविध अवस्थाओं और जीवन पद्धतियों के बावजूद इंसानियत का मूल भाव सार्वभौमिक और एकरूप है।
विविधता में एकता भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के "मूल "में है ।यह हमारी पहचान और शक्ति है, इसलिए हमें इस विविधता पर गर्व करना चाहिए । प्रवासी भारतीय समुदाय के बीच संघ की प्रासंगिकता एवं उपादेयता के प्रति विश्वास निरंतर बढ़ रहा है । संघ की स्थापना ऐसे संगठन के रूप में हुई थी, जिसका उद्देश्य चरित्र निर्माण, सामाजिक एकता और नागरिकों में राष्ट्रीय पहचान की मजबूत भावना का विकास करना था। संघ प्रतिकूल परिसंपत्तियों में भी निरंतर नए स्वयंसेवकों के निर्माण में सफल रहा है। हिंदू राष्ट्र की अवधारणा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और नैतिक शक्ति ये तीन प्रमुख विचार संघ की बुनियाद है। संघ का मूल उद्देश्य "भारत के गौरव और उसकी सांस्कृतिक चेतना के पुनर्स्थापना करना है।"
निः स्वार्थ सेवा का जीवंत संगठन
संघ विचारकों का मानना हैं कि,इस उद्देश्य की प्राप्ति का मार्ग हिंदू राष्ट्र के संगठन से होकर जाता है। भारत की पहचान हिंदुत्व में है। हिंदुत्व में ही विश्व में सुखशांति एवं कल्याण का मार्ग है। हिंदू समाज सनातन की ध्वजवाहक है। सामयिक में भारत का विकासात्मक दृष्टिकोण हिंदुत्व के कारण बढ़ रहा है।
संघ निः स्वार्थ सेवा का जीवंत संगठन है। राष्ट्रनिर्माण उत्तम संस्कारों और गंभीर चरित्र वाले व्यक्तियों से होता है।संघ दैनिक शाखाओं के साथ-साथ साप्ताहिक मिलन कार्यक्रमों और समर्पित कार्य भावना के माध्यम से राष्ट्र -निर्माण में योगदान दे रहा है। स्वयं सेवक आत्मीयता और समर्पण के साथ समाज के विभिन्न क्षेत्रों में निरंतर कार्य कर रहे हैं। स्वयं सेवकों का मूल उद्देश्य भारत को परमवैभव की ओर ले जाना तथा उसे विश्व में एक सशक्त और आदर्श राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित करना है। हिंदू समाज को संगठित करने, समाज की सज्जन शक्तियों को एक करके, समाज को संगठित करके एवं सभी नागरिकों में भारतीयता की भावना उत्पन्न करके भारत माता को परम वैभव की दिशा में उन्नयन करना है।
वैश्विक स्तर पर संघ के सांस्कृतिक योगदान,सामाजिक उपादेयता और हिंदुत्व के विचारधारा के प्रसार से उसकी स्वीकार्यता बढ़ी है । संघ के अधिकारी एवं स्वयंसेवक "परम वैभवशाली भारत "के निर्माण के लिए निरंतर प्रयासरत है। सामाजिक एकता ,समरसता, नैतिक मूल्यों, स्वस्थ एवं संगठित समाज के निर्माण में संघ की भूमिका महत्वपूर्ण है। सामाजिक ,सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना के उन्नयन के माध्यम से वह राष्ट्र जीवन को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।
प्रोफ़ेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी
पूर्व कुलपति एवं चिंतक,काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी
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