रूसी तेल पर 100% टैरिफ की धमकी से बढ़ा तनाव, भारत-अमेरिका ट्रेड डील और निर्यात पर क्या होगा असर?
Prabhat Tiwari
प्रभात तिवारी
India US Trade Deal 100 Percent Tariff: रूस से तेल खरीद को लेकर भारत और अमेरिका के रिश्ते अब एक ऐसे मोड़ पर हैं, जहां ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार वार्ता और भू-राजनीतिक हित सीधे एक-दूसरे से टकरा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हाल में पारित कानून (लिंडसे ओ. ग्राहम एक्ट 2026) ने रूस के बड़े तेल-गैस खरीदार देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया है। कानून 18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर के बाद प्रभावी हो चुका है, लेकिन भारत पर 100% शुल्क स्वतः लागू नहीं हुआ है। कानून में राष्ट्रपति को इसे लागू करने और कुछ परिस्थितियों में छूट देने की व्यापक शक्ति भी दी गई है।
भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीद जारी रखेगी। भारत ने यह भी कहा है कि अमेरिकी कदम का द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर पड़ सकता है तथा वह अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा।
100% टैरिफ लगा तो क्या होगा?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 100% टैरिफ का अर्थ भारतीय कंपनियों पर सीधे 100% कर लगाना नहीं, बल्कि अमेरिका में भारत से आने वाले माल के आयात पर अतिरिक्त शुल्क होगा। इसका आर्थिक भार अमेरिकी आयातकों, भारतीय निर्यातकों या दोनों के बीच बंट सकता है। लेकिन किसी भी स्थिति में भारतीय माल की अमेरिकी बाजार में कीमत और प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होगी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। अमेरिकी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2025 में अमेरिका ने भारत से 103.8 अरब डॉलर का माल आयात किया, जबकि भारत को 45.6 अरब डॉलर का अमेरिकी माल निर्यात हुआ। कुल अमेरिकी-भारतीय वस्तु व्यापार 149.4 अरब डॉलर रहा और अमेरिकी वस्तु व्यापार घाटा भारत के साथ 58.2 अरब डॉलर था। इसलिए यदि भारत के व्यापक निर्यात पर 100% शुल्क लगाया जाता है, तो टेक्सटाइल, परिधान, चमड़ा, इंजीनियरिंग उत्पाद, रत्न-आभूषण, रसायन और दूसरे श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। अमेरिकी खरीदार वैकल्पिक देशों से माल खरीदने की कोशिश कर सकते हैं और भारतीय कंपनियों को कीमत घटाकर मार्जिन बचाने या दूसरे बाजार तलाशने की चुनौती आ सकती है।

क्या भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर असर पड़ेगा?
टैरिफ को लेकर होने वाले असर की संभावना स्पष्ट है, क्योंकि दोनों देश पहले ही व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। फरवरी 2026 के अंतरिम समझौता ढांचे में अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर 18% पारस्परिक टैरिफ का प्रावधान रखा था और कुछ क्षेत्रों में आगे टैरिफ हटाने की संभावना भी तय की गई थी। भारत ने बदले में अमेरिकी औद्योगिक और कई कृषि उत्पादों पर शुल्क घटाने या हटाने पर सहमति जताई थी। रूसी तेल को लेकर नया कानून इस समझौते को जटिल बनाता है। भारत के लिए सवाल यह है कि क्या व्यापार समझौते के जरिए हासिल बाजार पहुंच को रूसी तेल खरीद के मुद्दे से अलग रखा जा सकता है। दूसरी तरफ, अमेरिका के लिए भारत का बड़ा बाजार, सप्लाई चेन और चीन के विकल्प के रूप में भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यानी दोनों देशों के पास एक-दूसरे पर आर्थिक दबाव डालने के साथ-साथ समझौते की जरूरत भी है। यही वजह है कि मौजूदा स्थिति को सिर्फ टैरिफ विवाद के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
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आखिर अमेरिका भारत पर इतना दबाव क्यों बना रहा है?
इसका पहला कारण रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था पर दबाव है। भारत और चीन रूसी तेल के बड़े खरीदार बने हुए हैं। अमेरिकी कानून का घोषित उद्देश्य ऐसे खरीदारों पर आर्थिक दबाव डालना है, ताकि रूस की ऊर्जा आय पर असर पड़े। दूसरा कारण व्यापक अमेरिकी व्यापार नीति है। 2025 में अमेरिका का भारत के साथ वस्तु व्यापार घाटा 58.2 अरब डॉलर था। ऐसे में अमेरिकी प्रशासन लंबे समय से भारतीय बाजार में अधिक अमेरिकी पहुंच और भारत से आने वाले माल पर कम बाधाओं की मांग करता रहा है। फरवरी के व्यापार ढांचे में भी कृषि, औद्योगिक सामान और गैर-टैरिफ बाधाओं को लेकर भारत से कई प्रतिबद्धताएं ली गई थीं। इसके अलावा तीसरा प्रमुख पहलू सामरिक है। अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के संतुलन और सप्लाई-चेन विविधीकरण के लिहाज से महत्वपूर्ण मानता है। लेकिन वॉशिंगटन रूस के साथ भारत के ऊर्जा और रक्षा संबंधों को अपनी रूस नीति के संदर्भ में अलग नजरिए से देखता है। यही रणनीतिक अंतर मौजूदा व्यापार तनाव की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
रूस से तेल खरीद पर रोक लगाना आसान नहीं
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। रूस भारत का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, हालांकि हाल के महीनों में भारतीय रिफाइनरों ने स्रोतों में विविधता बढ़ाई है। अगस्त 2026 में रूस से भारत का तेल आयात 16.5% घटकर करीब 21 लाख बैरल प्रतिदिन रहा और सितंबर में इसके करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का प्रारंभिक अनुमान है। इसके साथ इराकी तेल खरीद बढ़ी है। इसका अर्थ है कि भारत पहले ही कुछ हद तक जोखिम घटा रहा है। लेकिन रूसी तेल को बहुत तेजी से बदलने पर लागत बढ़ सकती है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में भू-राजनीतिक तनाव के बीच महंगा कच्चा तेल भारत के आयात बिल, मुद्रास्फीति और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव डाल सकता है।

क्या UK और EU FTA अमेरिकी नुकसान की भरपाई कर सकते हैं?
भारत के पास अब बाजार विविधीकरण का बड़ा विकल्प है। भारत-यूके CETA 15 जुलाई 2026 से लागू हो चुका है। इसके तहत ब्रिटेन के लिए भारतीय उत्पादों की बाजार पहुंच बढ़ी है और कई भारतीय वस्तुओं को शुल्क लाभ मिला है। भारत और यूरोप के बीच व्यापार को लेकर होने वाला बड़ा समझौता हाल ही में तय हो गया है। हालांकि इसके वास्तविक लाभ क्रियान्वयन और अनुसमर्थन के बाद धीरे-धीरे सामने आएंगे। 2025 में भारत-ईयू वस्तु एवं सेवा व्यापार करीब 185 अरब यूरो था। ईयू के मुताबिक समझौता टैरिफ उदारीकरण और गैर-टैरिफ बाधाओं के लिहाज से महत्वाकांक्षी है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य और सीमा यह भी है कि यूके और ईयू बाजार अमेरिका का सीधा विकल्प नहीं हैं। यहां उत्पादों की मांग, मानक, नियम, लॉजिस्टिक्स और बाजार संरचना अलग हैं। इसलिए इन समझौतों से अमेरिकी बाजार में संभावित नुकसान का कुछ हिस्सा दूसरे बाजारों में निर्यात बढ़ाकर कम किया जा सकता है, लेकिन पूरी भरपाई स्वतः नहीं होगी।
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टकराव से ज्यादा अहम होगी रणनीतिक विविधता
भारत के सामने मूल चुनौती तीन हिस्सों में मानी जा रही है। इसमें सबसे पहली सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा बनाए रखना, दूसरी अमेरिकी बाजार में निर्यात की प्रतिस्पर्धा बचाना और तीसरी रूस के साथ संबंधों को अपनी रणनीतिक जरूरतों के अनुरूप बनाए रखने की है। 22 सितंबर के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय रिफाइनर पहले ही अक्टूबर-नवंबर की जरूरत के लिए स्पॉट बाजार से खरीद बढ़ा रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि भारत विकल्प तैयार कर रहा है, लेकिन रूसी तेल को पूरी तरह बदलने का फैसला केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि लागत और ऊर्जा सुरक्षा का भी सवाल है। इसलिए यदि 100% टैरिफ वास्तव में लागू होता है, तो इसका सबसे बड़ा असर भारत-अमेरिका व्यापार के आकार के साथ-साथ कंपनियों की लागत और बाजार हिस्सेदारी पर पड़ सकता है।
वहीं UK और EU के साथ हुए समझौते भारत को विविधीकरण का रास्ता देते हैं, लेकिन अमेरिकी बाजार के नुकसान की पूरी भरपाई की गारंटी नहीं। मौजूदा घटनाक्रम में सबसे अहम तथ्य यह है कि 100% टैरिफ अभी एक अधिकतम संभावित अमेरिकी कार्रवाई है, न कि भारत पर लागू हो चुका सार्वभौमिक शुल्क। आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि वॉशिंगटन कानून का इस्तेमाल किस तरह करता है, भारत रूसी तेल की खरीद को कितना समायोजित करता है और दोनों देश लंबित व्यापार समझौते में किस तरह का समझौता करते हैं।
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