100 डॉलर का कच्चा तेल बढ़ाएगा भारत का चालू खाता घाटा, महंगाई और उद्योगों पर भी बढ़ेगा दबाव

खबर सार :-

महंगा कच्चा तेल भारत के लिए तत्काल व्यापक आर्थिक संकट नहीं है, क्योंकि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, नियंत्रित महंगाई और सीमित चालू खाता घाटा सुरक्षा देते हैं। फिर भी लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर कीमतें रहने पर आयात बिल, महंगाई और राजकोषीय दबाव बढ़ सकते हैं। पश्चिम एशिया में आपूर्ति बाधा बढ़ी तो विकास की रफ्तार और उपभोक्ता मांग पर भी असर पड़ने की आशंका रहेगी।
कच्चे तेल की कीमतों में छलांग से भारत पर बढ़ा दबाव, संकट अभी दूर

खबर विस्तार : -

Crude Oil Prices Rise: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड 107-108 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) भी 103 डॉलर से ऊपर कारोबार करता दिखा। तेल की इस तेजी ने भारत की आर्थिक संभावनाओं को लेकर चिंता बढ़ाई है। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा स्थिति चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे फिलहाल व्यापक आर्थिक संकट नहीं माना जा सकता।

तेल की ऊंची कीमत भारत के लिए गंभीर चुनौती

भारत के पक्ष में सबसे बड़ा सहारा उसकी मजबूत बाहरी वित्तीय स्थिति है। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में चालू खाता घाटा (सीएडी) जीडीपी का करीब 0.8 प्रतिशत रहा। वहीं, भारतीय रिजर्व बैंक के हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार 785.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। इतना बड़ा फॉरेक्स रिजर्व बाहरी झटकों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच उपलब्ध कराता है। फिर भी तेल की ऊंची कीमत भारत के लिए गंभीर चुनौती है, क्योंकि देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88.6 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में प्रत्येक बड़ी बढ़ोतरी से आयात बिल बढ़ता है और व्यापार तथा चालू खाते पर दबाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहा या पश्चिम एशिया तथा समुद्री मार्गों से आपूर्ति बाधित हुई, तो विकास और महंगाई के बीच संतुलन कठिन हो सकता है।

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खुदरा महंगाई करीब 49 आधार अंक तक बढ़ने की उम्मीदः आरबीआई

भारतीय रिजर्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से खुदरा महंगाई करीब 49 आधार अंक तक बढ़ सकती है। इसका असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। परिवहन, खाद्य पदार्थों और विनिर्मित वस्तुओं की लागत बढ़ने से अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों पर दबाव बन सकता है। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी महंगे होने की स्थिति में घरेलू उपभोग तथा परिवारों की वास्तविक आय प्रभावित हो सकती है। सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए उत्पाद शुल्क घटाती है या सब्सिडी बढ़ाती है, तो दूसरी तरफ राजकोषीय घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। तेल विपणन कंपनियों पर भी कीमतों को नियंत्रित रखने का बोझ पड़ सकता है। यानी महंगे तेल का मुकाबला केवल उपभोक्ता कीमतों के जरिए करना सरकार के लिए आसान विकल्प नहीं होगा।

तेल की कीमतें बढ़ीं तो बढ़ेगा चालू खाता घाटा

विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि औसत कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर जीडीपी के 1.9-2.2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह पहले के 0.7-0.8 प्रतिशत के अनुमान से काफी अधिक होगा। महंगे तेल का असर कंपनियों और उद्योगों पर भी समान नहीं होगा। एयरलाइंस, पेंट, रसायन, लॉजिस्टिक्स, सीमेंट, उपभोक्ता सामान और तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर ONGC और Oil India जैसी घरेलू तेल एवं गैस उत्पादक कंपनियों को ऊंची कीमतों से फायदा मिल सकता है। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और घरेलू गैस आधारित क्षेत्रों में निवेश की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं। बाजार की आगे की दिशा काफी हद तक पश्चिम एशिया और लाल सागर के समुद्री मार्गों की स्थिति पर निर्भर करेगी। यदि तनाव सीमित रहता है और आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो भारत की मौजूदा आर्थिक मजबूती झटके को संभाल सकती है। लेकिन लंबे समय तक महंगा तेल और गंभीर आपूर्ति व्यवधान महंगाई, चालू खाते और राजकोषीय स्थिति पर एक साथ दबाव बढ़ा सकते हैं।

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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)....

1. कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर रहने से भारत पर क्या असर होगा?

इससे भारत का आयात बिल और चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, साथ ही महंगाई पर भी दबाव बढ़ेगा।

2. महंगे कच्चे तेल से किन उद्योगों पर ज्यादा असर पड़ेगा?

एयरलाइंस, पेंट, रसायन, लॉजिस्टिक्स, सीमेंट और तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।

3.क्या महंगे तेल से भारत में आर्थिक संकट आ सकता है?

फिलहाल व्यापक संकट की स्थिति नहीं है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और नियंत्रित महंगाई भारत को बाहरी झटकों से बचाने में मदद कर रहे हैं।

 

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