Waqf Case : वक्फ संशोधन कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जो काफी गंभीर और जोरदार बहसों और तर्कों के साथ आगे बढ़ी। न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले की सुनवाई जारी रहेगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि वक्फ काउंसिल्स में गैर-मुस्लिमों को शामिल करना धर्मनिरपेक्षता नहीं बल्कि असमानता है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी हिंदू धार्मिक स्थान की प्रबंधन समिति में कोई गैर-हिंदू नहीं होता, इसलिए वक्फ संपत्ति के मामलों में भी समान विशेषाधिकार होना चाहिए। उन्होंने वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण और विवादों को लेकर मौजूदा कानून में मौजूद असंतुलन की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब तक संपत्ति रजिस्टर्ड नहीं होती, मुकदमा भी दायर नहीं किया जा सकता, जो कि कानूनी अधिकारों का हनन है। सिब्बल ने यह भी कहा कि पहले वक्फ काउंसिल में केवल मुस्लिम सदस्य होते थे, जबकि संशोधन के बाद अब गैर-मुस्लिम बहुमत में हो गए हैं। उन्होंने इसे धार्मिक संपत्तियों पर कब्ज़े की मंशा से जुड़ा बताया, जो संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
वहीं केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चर्चा करते हुए कहा कि कोर्ट को बहस को सीमित दायरे में रखने की जरूरत है। एसजी ने अपील करते हुए कहा कि कोर्ट केवल पहले से तय तीन बिंदुओं पर ही विचार करे लेकिन सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस अनुरोध का कड़ा विरोध किया और कहा कि यह मामला व्यापक और गंभीर है, जिसे समग्रता में सुना जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि वक्फ संशोधन कानून पूरी तरह से संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अनुरूप है और इससे धार्मिक स्वतंत्रता या प्रबंधन अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता। यह प्रावधान वक्फ संपत्तियों के धर्मनिरपेक्ष और पारदर्शी प्रबंधन के उद्देश्य से किया गया है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि जो संपत्तियाँ पहले से वक्फ के रूप में रजिस्टर्ड हैं, उन्हें बाय यूज़र के नए प्रावधान से कोई नुकसान नहीं होगा।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले 17 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया था कि वक्फ संशोधन कानून के विवादित प्रावधान फिलहाल लागू नहीं होंगे। अदालत ने स्पष्ट किया था कि वक्फ बोर्ड या काउंसिल में फिलहाल कोई नई नियुक्ति नहीं की जाएगी और यथास्थिति बनी रहेगी। अब निगाहें आगे की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत इस संवेदनशील मुद्दे पर और गहराई से विचार करेगी।
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