बम धमाकों में 267 लोगों की मौत पर श्रीलंका में ऐतिहासिक फैसला, कोर्ट एरिया छावनी में तब्दील

खबर सार :-

श्रीलंका का यह एक बड़ा मामला था। इसकी आखिरी सुनवाई पर फैसला हो चुका था। उसी फैसले पर सजा तय की जानी थी। 267 लोगों की मौत और 600 घायलों के परिजनों को न्याय दिए जाने की घड़ी आई तो अदालत का एरिया छावनी में तब्दील कर दी गई।
Sri Lanka : ईस्टर बम धमाकों में 15 दोषियों को 200 से 260 साल तक की सजा

खबर विस्तार : -

कोलंबो: श्रीलंका की एक हाईकोर्ट ने 2019 के ईस्टर संडे बम धमाकों के मामले में सुनवाई के बाद एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस मामले में 15 लोगों को दोषी ठहराया था। इनको 200 से 260 साल तक जेल की सजा सुनाई है। यह धमाके आज भी लोगों को खतरनाक दृश्य दिखा देते हैं। इनमें 267 लोगों की जान गई थी, जबकि 600 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। अदालत ने इस मामले के दोषियों की संपत्ति भी जब्त करने का आदेश दिया है।

तीन चर्च और तीन होटलों में धमाके किए गए

दरअसल, यह मामला 21 अप्रैल 2019 का है। श्रीलंका में ईस्टर के मौके पर तीन चर्च और तीन प्रमुख होटलों में बम धमाके किए गए थे। आत्मघाती हमलावरों ने इन स्थानों को निशाना बनाकर धमाके किए थे। हमले में बड़ी संख्या में लोग मारे गए, इनमें 42 विदेशी नागरिक भी थे। हमलावरों के बारे में बताया गया था कि वह इस्लामिक स्टेट से प्रेरित थे। यह हमलावर श्रीलंका के स्थानीय इस्लामी उग्रवादी संगठनों से जुड़े बताए गए थे।

अदालत के आसपास बड़ी संख्या में फोर्स तैनात थी

 श्रीलंका के एक प्रमुख अखबार ने बुधवार को इन बम धमाके की सुनवाई और सजा पर एक खबर प्रकाशित की है। इसमें बताया गया है कि तीन न्यायाधीशों की हाईकोर्ट पीठ ने मंगलवार को करीब पांच साल तक चले मुकदमे पर आखिरी सुनाई की और बाद में अपना फैसला सुनाया। इस मामले पर सजा की सुनवाई केवल बाकी रही, सुनवाई तो औपारिक हुई। अदालत में बड़े मामले पर फैसला सुनाया जाना था, इसलिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। अदालत परिसर के आसपास बड़ी संख्या में पुलिस तैनात कर दी गई थी। 

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5 को 200, 5 को 220, 4 को 240, 1 को 260 साल की सजा

एक ही मामला होने के बाद भी अदालत ने सजा अलग-अलग सुनाई। इसका कारण था कि अदालत ने दोषियों को उनकी भूमिका के आधार पर ऐसा किया है। बम की घटना को लेकर अदालत पूरी तरह से घटना के परिदृष्य को देख रही थी। इसमें पांच लोगों को 200-200 साल, पांच को 220-220 साल, चार को 240-240 साल और एक व्यक्ति को 260 साल की सजा सुनाई है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, यहां पर सभी सात धमाकों इनमें (तीन चर्च, तीन होटल और एक मोटल में हुए विस्फोट) को सजा तय करते समय ध्यान में रखा गया।

24 लोगों में 15 को ठहराया गया दोषी

यह मामला जल्द ही निपटाने की कई बार कोशिश की गई। इसके बाद भी सजा मुकर्रर होने तक कई साल लग गए। 2021 में 25 आरोपियों के खिलाफ 23,270 आरोप दर्ज किए गए थे। इन पर भी सुनवाई चली। आरोपों में हत्या, आतंकवादी साजिश और आग्नेयास्त्रों तथा विस्फोटकों से जुड़े अपराध शामिल थे। इस मामले में 24 लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई थी। सुनवाई का सामना सभी 24 आरोपियों ने किया। इनमें 15 को दोषी ठहराया गया, जबकि नौ को आरोप साबित नहीं होने पर बरी कर दिया गया। एक अन्य आरोपी की मुकदमा पूरा होने से पहले मौत हो गई थी।

कोई भी धमाकों में सीधे शामिल नहीं था

सबसे ज्यादा चौकाने वाली बात यह रही कि 15 लोगों को दोषी ठहराया गया है।  इनमें से कोई भी धमाकों में सीधे शामिल नहीं था। साथ ही काई भी आत्मघाती हमलावर भी नहीं माना गया है। विस्फोट के दौरान सभी हमलावर मारे गए थे। अदालत में बताया गया कि हमले सुनियोजित थे और उनका उद्देश्य ईसाई श्रद्धालुओं के साथ ही पर्यटकों को निशाना बनाना था। अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि हमलावर हर हाल में नुकसान देखना चाह रहे थे। 
इस मामले में एक वीडियो भी अदालत के सामने लाया गया। इस वीडियों में एक आत्मघाती हमलावर हमलों से एक दिन पहले कुछ चीजें रिकॉर्ड की थी। रिपोर्ट में इस बात की जानकारी दी गई कि वीडियो में हमलावरों ने चेहरे ढक रखे थे। उन्होंने तत्कालीन इस्लामिक स्टेट प्रमुख अबू बक्र अल-बगदादी के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी।

श्रीलंका में धमाकों की चेतावनी पहले मिली थी

ईस्टर धमाकों के बाद श्रीलंका में राजनीतिक हमले भी हुए थे। बताया जाता है कि हमलों को लेकर सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र लापरवाह बना रहा। पूरे लंका देश की सुरक्षा पर सवाल उठाए गए। एक संसदीय समिति ने पाया था कि पुलिस और खुफिया अधिकारियों को हमलों की संभावित चेतावनी पहले से मिली हुई थी। इसके बाद भी उस पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई। जुलाई 2026 में श्रीलंका के एक पूर्व पुलिस प्रमुख और रक्षा मंत्रालय के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी को विदेशी खुफिया चेतावनियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं करने के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, श्रीलंका में 1976 के बाद किसी व्यक्ति को फांसी नहीं दी गई है और वहां मौत की सजा आम तौर पर उम्रकैद में बदल जाती है। इसलिए वह बच गए। 

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