जयपुर की बेटी पिया दांडिया ने जीती फ्लोरिडा सीट, संसद पहुंचने वाली दूसरी भारतीय-अमेरिकी महिला

खबर सार :-

दांडिया को इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट फंड और सर्व अमेरिका पीएसी के अलावा वेलिंगटन के रिपब्लिकन मेयर माइकल नेपोलियोन का भी समर्थन मिला था। आज भी उनका भारत के प्रति लगाव है।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए चुनी गईं पिया दांडिया, जयपुर से है पारिवारिक लगाव

खबर विस्तार : -

वाशिंगटन, राजस्थान की राजधानी जयपुर का नाम आज वाशिंगटन में सुना जा रहा है। यहां भारत के जयपुर की अप्रवासी भारतीय माता-पिता की बेटी पिया दांडिया फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से जीत हासिल कर ली है। वह मंगलवार को डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए चुनी गई हैं। इससे पहले जयपाल यह उपलब्धि हासिल कर चुकी हैं। बताया जा रहा है कि दांडिया ने रिपब्लिकन पार्टी के केसी असकर को पराजित करने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा।

जीत के मुकाम तक पहुंचने में 99 प्रतिशत मतों की गिनती पूरी होने के बाद भी स्थिति साफ नहीं हो पाई थी। वह लगभग 52 प्रतिशत वोट के साथ आगे थीं। असकर को 48 प्रतिशत मत ही मिल सके। एनबीसी न्यूज के हवाले से कहा गया है कि यदि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव से तुलना किया जाए तो इस सीट पर डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में 14 प्रतिशत का रुझान परिवर्तन हुआ है। बताया जाता है कि दांडिया का बचपन जुपिटर में बीता है। उनका जन्म पाम बीच काउंटी में हुआ।

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माता-पिता बचपन में पिया को भारत भेजते थे

1980 के दशक में उनके माता-पिता राजस्थान के जयपुर से अमेरिका चले गए थे। उनके पिता डॉ. रोहित दांडिया वहां पर डॉक्टर थे। उनकी मां ने 40 वर्ष की उम्र में जुपिटर में एक मोंटेसरी स्कूल खोला। इस स्कूल को खोलने के पीछ पिया की शिक्षा अच्छी तरह कराने का इरादा था। यद्यपि वह अमेरिका में पैदा हुईं, लेकिन उनकी परवरिश भारतीय संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं में हुआ। 

वह अमेरिका में पली -बढी, लेकिन भारत में उनके रिश्तेदारों से वह कभी दूर नहीं हुई। इस लगाव के कारण उनके माता-पिता का अपनों के प्रति स्नेह रहा। उनके माता-पिता बचपन में पिया को भारत भेजते थे। वह कहते थे कि वह अपने चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के साथ समय बिता सकें। साथ ही वह चाहते थे कि पिया अपनी जड़ों को समझ सकें। अगस्त 2025 में न्यू इंडिया अब्रॉड को उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था, “मेरे माता-पिता बहुत छोटी उम्र से ही मुझे अकेले भारत भेजते थे। उन दिनों की यात्राएं पिया के जीवन को बदलने वाली साबित हुईं। माता-पिता के उस योगदान या व्यवहार के विशेष महत्व देते हुए कहा कि उनको पहचान बनाया। दुनिया को समझने में आसानी साबित हुई। 

दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाई

कुछ काम ऐसे पिया के रहे, जिनसे नहीं लगता कि उनके साथ भारतीय शब्द न जोड़ा जाए। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पहले वर्ष की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद गर्मी की छुट्टी में दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाई। आशा कोऑपरेटिव सोसायटी के साथ जुड़कर उन्होंने सात से 17 वर्ष की उम्र के बच्चों को पढ़ाया। एक दिन इस अनुभव को भी उन्होंने साझा किया।
तब कहा था के अंतर उनकी क्षमताओं का नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों का होता है जिनमें उन्हें जीवन बिताना पड़ता है।

2025 में इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट फंड की ओर से समर्थन मिलने पर दांडिया ने अपने राजनीतिक सफर और पारिवारिक पृष्ठभूमि का जिक्र किया था। दांडिया ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से गवर्नमेंट विषय की पढ़ाई की। वह बोस्टन विश्वविद्यालय से शिक्षा में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उन्होंने बोस्टन में टीच फॉर अमेरिका कार्यक्रम के तहत अध्यापन किया। इसके बाद महज 28 वर्ष की उम्र में वह न्यूयॉर्क के हार्लेम में डेमोक्रेसी प्रेप एंड्योरेंस हाई स्कूल की संस्थापक प्रिंसिपल बनीं। यह ऐसा स्कूल था, जिसमें 86 प्रतिशत विद्यार्थी कम आय वाले परिवारों से आते थे।

22वें डिस्ट्रिक्ट से चुनाव लड़ने का फैसला भी खरा साबित 

वहां उनका लोगों से वादा रहा कि जो बच्चे उनके स्कूल में पढ़ेंगे तो उनमें से 100 प्रतिशत को कॉलेज में दाखिला मिलेगा। समय बदला, वर्ष 2020 में दांडिया को व्हाइट हाउस फेलो चुना गया था। उन्होंने व्हाइट हाउस की घरेलू नीति परिषद, अमेरिकी शिक्षा विभाग, एप्पल में सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़ी पहलों का नेतृत्व किया। बाद में इलिनॉय के गवर्नर जेबी प्रित्जकर की ओर से राज्य की पी-20 परिषद में भी जगह मिली। इस बार उनका फ्लोरिडा में मध्यावधि परिसीमन के बाद 22वें डिस्ट्रिक्ट से चुनाव लड़ने का फैसला भी खरा साबित हुआ। 

 18 अगस्त को डेमोक्रेटिक पार्टी का प्राइमरी चुनाव जीतने के बाद फ्लोरिडा के 21वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल कर दिया। यहां करीब 1.85 लाख रिपब्लिकन, 1.46 लाख डेमोक्रेटिक और 1.50 लाख अन्य राजनीतिक संबद्धता वाले मतदाता हैं। 14 अक्टूबर तक दांडिया के चुनाव अभियान को करीब 46 लाख डॉलर का चंदा मिला था, जबकि असकर ने लगभग 74 लाख डॉलर जुटाए थे।

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