ओडिशाः जंगल में मां से बिछड़े ओरांगुटान बच्चों में दो बीमार, इलाज कर रही चिकित्सकों की टीम
खबर सार :-
पिछले दिनों बचाए गए पांच ओरांगुटान बच्चों में से दो में एनीमिया पाया गया है। इनके सामने अब यह संकट का दौर है। यह प्राणी बचपन में मां के बिना सदमें जैसी हालत में चले जाते हैं। जांच और इलाज में जुटे चिकित्सकों ने बताया कि यह मूल रूप से भरत में नहीं पाए जाते हैं।
खबर विस्तार : -
भुवनेश्वर, मैसूर चिड़ियाघर में प्राइमेट्स की सेहत की जांच की गई। इनको बालेश्वर फॉरेस्ट डिवीज़न से हाल ही में बचाकर लाया गया है। पांचों ओरंगुटान बच्चों की सेहत की जांच में दो बीमार पाए गए। भुवनेश्वर के नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क में इनको रख गया है। वेसे तो यह फिजिकल जांच के दौरान सामान्य, स्वस्थ और एक्टिव हैं, लेकिन दो में एनीमिया (खून की कमी) पायी गई है। चिकित्सकों का कहना है कि यह मां से बिछड़कर दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।
मैसूर जू के असिस्टेंट डायरेक्टर कर रहे देखभाल
ओडिशा सरकार ने बेबी ओरंगुटान की सेहत की स्थिति पर नजर रखने के लिए एक टेक्निकल टीम बनाई है। इसके जरिए बेबी ओरंगुटान के संबंध में जानकारी मिली रहेगी। इसी के साथ ही इनके सेहत की देखभाल होती रहेगी। मैसूर चिड़ियाघर के असिस्टेंट डायरेक्टर डॉ. शशीधर ने बुधवार को बताया कि सरकार ने बेबी ओरंगुटान की भलाई के लिए प्लान पर काम करने के लिए कहा है। इस प्लान के अनुसार, ओरंगुटान पर नजर रखने के लिए बनाइ गई टेक्निकल टीम काम कर रही है। इस टीम का हिस्सा डॉ. शशीधर भी हैं। उन्होंने बताया कि लैब में डिटेल जांच के लिए खून और मल के सैंपल लिए गए थे। उसकी जांच की रिपोर्ट से पता चला कि पांच में से दो प्राइमेट्स एनीमिया से जूझ रहे हैं। दरअसल, यह प्राइमेट इंडोनेशिया और मलेशिया के जंगलों में पाए जाते हैं। ऐसे वन्य प्राणी भारत के नहीं हैं।
जांच रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है इलाज
जो बच्चे एनीमिया से जूझ रहे हैं, उनमें संबंधित समस्या बहुत ज्यादा हैै। अभी इनका बायोकेमिकल टेस्ट जैसे कई दूसरे टेस्ट लिए गए हैं, उनके नतीजों का इंतजार किया जा रहा है। जांच की रिपोर्ट मिलने के बाद ही आगे इलाज किया जाएगा। इनकी बीमारी को देखते हुए दवाओं का सुझाव दिया गया है।
बहुत ज़्यादा तनाव में हो सकते हैं बेबी ओरंगुटान
एक्सपर्ट की ओर से जानकारी दी गई कि बेबी ओरंगुटान बहुत ज़्यादा तनाव में हो सकते हैं। इसका कारण बहुत कम उम्र में ही उनकी मां से अलग कर दिया जाना हो सकता है। डॉ. शशीधर ने मीडिया को ओरंगुटान के स्वास्थ्य के बारे में बताया कि यह लंबे समय तक अपनी मां पर निर्भर रहते हैं। इनको बहुत जल्दी अलग कर दिया गया है। इन परिस्थितियों में यह बहुत ज़्यादा तनाव में हैं। यह परिस्थिति इनके लिए खतरनाक बन सकती है।
ज्यादा परेशानी बढ़ने पर या केट्रोल न होने पर इनको इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ सकता है। वन्य प्राणियों में ओरंगुटान का बचपन काफी दिनों तक चलता रहता है। इनका बचपन तीन साल तक माना गया है। डॉक्टरों ने बताया कि यह चार से सात साल तक किशोर अवस्था में रहते हैं। यही कारण है कि इन बच्चों को काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। इनको फिलहाल संभालने के लिए अलग से एक बाड़ा होना चाहिए। बाड़े में उनकी देखभाल करने की जरूरत है। ज्यादा दिनों तक कंट्रोल्ड हालात में यह नहीं आ पाते हैं तो यह उनके जीवन के लिए सही नहीं होगा।
जांचों का अध्ययन और लैब रिपोर्ट पर नजर टिकी
इनके खाने और पीने की सामग्री तय है। दूध या खास तरह के खाने की जरूरत होने की स्थिति में उसका भी मात्रा और समय देखा जाता है। इन जानवरों को उनकी उम्र और सेहत के हिसाब से ही देखभाल में पोषक वस्तुओं की ज़रूरत है। कई जांचों का अध्ययन और लैब रिपोर्ट पर नजर टिकी हुई हैं। देखभाल कर रही टीम रिपोर्ट का एनालिसिस करेगी और फिर आगे के इलाज के बारे में फैसला लेगी। डॉ. शशीधर ने कहा कि युवा ओरंगुटान को आत्मनिर्भर बनना है। इससे पहले कुछ समय के लिए एक कंट्रोल्ड माहौल चाहिए। ओरंगुटान की देखभाल के लिए टीम पर भी नंदनकानन जू के अधिकारियों की नजर बनी रहती है। यहां के इंतज़ाम भी बेहतर हैं। जू के असिस्टेंट डायरेक्टर ने जानवरों के लिए सही माहौल देने के लिए तापमान और नमी को कंट्रोल करने वाले कमरे न होते तो यह अभी ठीक नहीं हो पाते।
बालासोर जिले में स्थानीय लोगों ने इन्हें देखा था
इन पांच बेबी ओरंगुटान ओडिशा के एक जंगल में लावारिस हालत में मिले थे। बालासोर जिले में स्थानीय लोगों ने जब इन्हें देखा तो हैरान थे। उन्होंने वन अधिकारियों को इनके बारे में सूचना दी। उनके प्रयास से ही इन ओरंगुटानों को बचाया जा सका। इनसे संबंधित एक वीडियो वायरल हुआ है। इसमें बेबी एप्स को एक जंगल में देखा गया। यह सभी ज़मीन पर एक साथ बैठकर केले खा रहे थे। इनके बारे में बताया गया कि प्राकृतिक घर, ट्रॉपिकल रेनफॉरेस्ट, से हजारों किलोमीटर दूर थे। इनके साथ इनकी मां भी नहीं थी। जानकारी यह भी है कि ओरंगुटान भारत के मूल वन्य प्राणी नहीं हैं। यह धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो रहे हैं।
यह भी पढें: ‘विश्व ओजोन दिवस पर प्रकृति की रक्षा का संकल्प लें’, CM भजनलाल समेत कई नेताओं ने की पर्यावरण संरक्षण की अपील
अन्य प्रमुख खबरें
-
दिल्ली में संशोधित ग्रैप नियम 1 नवंबर से लागू, कई वाहनों पर लगेगी रोक
2026-10-30
-
पलामू की नदियों को स्वच्छ बनाने की कवायद, कचरे का आकलन कर रहा प्रशासन
2026-10-29
-
हेल्पलाइन पर कर सकते हैं दिवाली पर शोर की शिकायतें, BMC ने दी जानकारी
2026-10-27
-
गुजरात का अंबाजी मंदिर होगा प्रदूषण मुक्त, प्रसाद पैकेजिंग की तैयारी
2026-10-26
-
'जल संचय जन भागीदारी' अभियान से ग्राउंड वॉटर रिचार्ज को मिली मजबूती
2026-10-26
-
मध्य प्रदेश का शहडोल वन बाघों और हाथियों के लिए है प्राकृतिक काॅरिडोर
2026-10-24
-
किन्नौर में पहली बार दिखा प्रवासी पक्षी ‘पैसिफिक गोल्डन प्लोवर’
2026-10-23
-
दिल्ली में ग्रैप—1 को लेकर कड़े कदम उठाएगी ट्रैफिक पुलिस
2026-10-22
-
Bhagalpur: जहाजों से गंगा में गिर रहा कचरा, पर्यावरण को हो सकता है गंभीर खतरा
2026-10-20
-
कटहल के छिलके से 10 मिनट में 90% फ्लोराइड साफ!
2026-10-14
-
महाराष्ट्र के राजोडी बीच पर चला स्वच्छता अभियान, 15 टन कचरा हटाया
2026-10-10
-
केवल देश की राजधानी नहीं, लाखों लोगों का घर है दिल्ली, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता
2026-10-08
-
पूर्वानुमान बताएगा बाढ़ के हाल, आईआईटी मद्रास के पास है सटीक जवाब
2026-10-07
-
विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य का रेतीला तट चकवा को पसंद, लाउडस्पीकर और पटाखों पर पाबंदी लागू
2026-10-07
-
world welfare day : बेजुबानों को भी उनका हक चाहिए
2026-10-04