सोमनाथ मंदिर के बाद अब अंबाजी मंदिर में प्लास्टिक पर रोक, कागज-खोई के डिब्बों में हो रही प्रसाद की पैकेजिंग

खबर सार :-

गुजरात के अंबाजी मंदिर में अब प्लास्टिक के डिब्बों में प्रसाद की पैकेजिंग पर रोक लगा दी गई है। इसके स्थान पर कागज, खोई और टिन के डिब्बों का इस्तेमाल पैकेजिंग के लिए हो रहा है।
गुजरात का अंबाजी मंदिर होगा प्रदूषण मुक्त, प्रसाद पैकेजिंग की तैयारी

खबर विस्तार : -

गांधीनगर: गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GPCB) अंबाजी मंदिर में 'प्रसाद' के लिए पर्यावरण के अनुकूल (इको-फ्रेंडली) पैकेजिंग शुरू करने की योजना बना रहा है। पारंपरिक प्लास्टिक के डिब्बों की जगह लेने वाले इस बदलाव से हर साल प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे में लगभग 135.6 टन की कमी आने की उम्मीद है। यह पहल सितंबर में सोमनाथ मंदिर में प्लास्टिक-मुक्त प्रसाद पैकेजिंग शुरू किए जाने के बाद की जा रही है और इसका उद्देश्य इस मॉडल को गुजरात के एक और प्रमुख तीर्थ स्थल तक पहुंचाना है। 

अहमदाबाद स्थित 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन' (NID) द्वारा तैयार किए गए विकल्पों में गन्ने की खोई (गन्ने के प्रसंस्करण से बचा हुआ अवशेष) से ​​बने कंटेनर, दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले टिन के डिब्बे और प्लास्टिक-मुक्त कागज की पैकेजिंग शामिल हैं। वन और पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने बताया कि अंबाजी मंदिर में एक सामान्य दिन में लगभग 15,000 प्लास्टिक के डिब्बों का इस्तेमाल होता है और त्योहारों तथा विशेष अवसरों पर यह मांग काफी बढ़ जाती है। हर महीने लगभग 10 लाख (1 मिलियन) डिब्बे बांटे जाते हैं, जिससे अनुमानित 11,299.5 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा पैदा होता है।

लगभग 135.6 टन प्लास्टिक कचरे पर रोक

मोढवाडिया ने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को अपनाने से अंबाजी मंदिर में हर साल लगभग 135.6 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होने से रोका जा सकता है। इन पैकेजिंग समाधानों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि ये स्वच्छता, उपयोगिता और प्रसाद बांटने की सुविधा को बनाए रखें, साथ ही इसकी सांस्कृतिक पहचान को भी सुरक्षित रखें। GPCB ने NID अहमदाबाद के 'इंटीग्रेटेड डिजाइन सर्विसेज' विभाग को पेशेवर डिजाइन परामर्श देने और दोनों मंदिरों की विशिष्ट जरूरतों के अनुसार विकल्प तैयार करने का काम सौंपा है।

पैकेजिंग के लिए अलग-अलग समाधान तैयार

सोमनाथ और अंबाजी मंदिरों में किए गए फील्ड अध्ययन में कई पहलुओं की जांच की गई, जैसे कि भक्तों की संख्या, बांटे जाने वाले प्रसाद की मात्रा, उसे तैयार करने और पैक करने की प्रक्रिया, भंडारण की स्थिति, वितरण का तरीका और कचरा पैदा होने की मौजूदा स्थिति। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि इन सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए केवल एक तरह की पैकेजिंग काफी नहीं होगी। जो प्रसाद तुरंत खाया जाना है, उसके लिए हल्के और बायोडिग्रेडेबल (प्राकृतिक रूप से नष्ट होने वाले) पैकेजिंग की जरूरत है, जबकि जो प्रसाद लोग घर ले जाते हैं या लंबी दूरी तक ले जाते हैं, उसके लिए अधिक मजबूत कंटेनरों की आवश्यकता है। इसके परिणामस्वरूप, तुरंत इस्तेमाल, साथ ले जाने (टेकअवे) और दोबारा इस्तेमाल की जा सकने वाली पैकेजिंग के लिए अलग-अलग समाधान तैयार किए गए।

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पेपर बॉक्स और टिन के डिब्बों में हो रहा प्रसाद वितरण

इन विकल्पों में कम समय के इस्तेमाल के लिए पेपर बॉक्स और गन्ने की खोई (बगास) से बने कंटेनर शामिल हैं। इसके अलावा, इसमें मजबूत टिन के डिब्बे भी हैं, जिन्हें श्रद्धालु अपने पास रख सकते हैं और दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं। सोमनाथ में अब प्रसाद का वितरण प्लास्टिक-मुक्त पेपर बॉक्स और दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले टिन के डिब्बों में किया जा रहा है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने 17 सितंबर को इस पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग पहल का औपचारिक उद्घाटन किया। मंदिर में हर दिन लगभग 4,200 किलोग्राम प्रसाद बांटा जाता है, जिसे करीब 27,700 कंटेनरों में पैक किया जाता है। पारंपरिक प्लास्टिक कंटेनरों की जगह इन टिकाऊ विकल्पों को अपनाने से, हर साल प्लास्टिक के इस्तेमाल में 203 टन से अधिक की कमी आने की उम्मीद है।

धार्मिक अनुष्ठानों में पर्यावरण को शामिल करना उद्देश्य

वन और पर्यावरण राज्य मंत्री प्रवीण माली ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य धार्मिक अनुष्ठानों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी को शामिल करना है। उन्होंने कहा कि प्रमुख तीर्थ स्थलों पर बायोडिग्रेडेबल (प्राकृतिक रूप से नष्ट होने वाले) और दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले विकल्पों को अपनाकर, गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GPCB) यह दिखाना चाहता है कि कैसे सोच-समझकर की गई डिजाइन, संस्थागत कदम और जनभागीदारी से पर्यावरण को स्पष्ट लाभ मिल सकते हैं। इस पहल का लक्ष्य धार्मिक स्थलों पर कचरे के टिकाऊ प्रबंधन को बढ़ावा देना और श्रद्धालुओं को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। सोमनाथ में इसे पहले ही लागू किया जा चुका है और अंबाजी में भी ऐसा करने की योजना है। इस मॉडल को गुजरात और अन्य जगहों के अन्य तीर्थ स्थलों पर भी अपनाया जा सकता है।

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