अब पहले ही पता चल जाएगा कहां आ रही बाढ़, आईआईटी मद्रास के शोध से बढ़ी उम्मीद

खबर सार :-

बाढ़, बरसात और जल भराव की तमाम चुनौतियों के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के प्रयास से देश के सामने ऐसा सटीक और सराहनीय रास्ता सामने आया है जो केवल भारत के लिए ही नहीं दुनिया भर के लिए उपयोगी होगा। यह रास्ता मौसम से संबंधित है। इसमें पूर्वानुमान के आधार पर यह बताया गया है कि कहां ज्यादा बारिश हो सकती है। बाढ़ की संभावना को भी यह पूर्वानुमान के आधार पर बताने की स्थिति में होगा।
पूर्वानुमान बताएगा बाढ़ के हाल, आईआईटी मद्रास के पास है सटीक जवाब

खबर विस्तार : -

नई दिल्ली/चेन्नई, एक अध्ययन (शोध) शहरी बाढ़ के पूर्वानुमान को अधिक सटीक बनाने की दिशा में किया गया है। इसमें वैज्ञानिकों के पास शोध का बेहतरीन निष्कर्ष बताया गया है। इस अध्ययन शोध में कई देशों ने भागीदारी की हैं। 

आईआईटी मद्रास, जर्मनी के जीएफजेड हेल्महोल्ट्ज सेंटर फॉर जियोसाइंसेज, जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जेएएक्सए) और काठमांडू विश्वविद्यालय के बीच एक बहुविषयक सहयोग के माध्यम से मौसम आधारित शोध किया गया। इसमें वायुमंडलीय विज्ञान, जल विज्ञान, हाइड्रोलिक मॉडलिंग और पृथ्वी अवलोकन में विशेषज्ञता को एक साथ लाया गया। वैज्ञानिकों ने आधार बनाकर शोध के जरिए यह पता करने की कोशिश की है कि वायुमंडल में किस तरह से दबाव बनता है।

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अध्ययन में ज्यादा शहरी क्षेत्रों को शामिल किया

यहां बारिश से पहले होने वाली प्रक्रियाओं के साथ जलाशय में पानी पहुंचने तक की प्रकृति का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में ज्यादातर शहरी क्षेत्रों को शामिल किया गया है। वैज्ञानिकों ने पूरी प्रक्रिया को एक साथ समझने का प्रयास किया है। इसमें वायुमंडलीय मॉडलिंग, जल विज्ञान, जल संचयन सिमुलेशन और उपग्रह आधारित पृथ्वी अवलोकन को जोड़ा गया है। शोध में यह पता लगाने की कोशिश की गई है की शहरी बेसिन किस स्तर पर अत्यधिक वर्षा का सटीक और पूर्वानुमान स्तर तैयार करता है।

इसके निष्कर्ष नेचुरल हैज़र्ड्स एंड अर्थ सिस्टम साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं, जोकि एक पीयर-रिव्यूड, ओपन-एक्सेस अंतरराष्ट्रीय जर्नल है। शोध पत्र के कई सह-लेखक हैं। डॉ. एन. निथिला देवी, सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास और जीएफजेड हेल्महोल्ट्ज़ सेंटर फॉर जियोसाइंसेज, जर्मनी, जापान, नेपाल के वैज्ञानिक शोध में शामिल हुए। आईआईटी मद्रास के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. चंदन सारंगी ने इस शोध का महत्व समझाया है। वह इस शोध के सह-लेखक भी हैं।

एरोसोल स्थितियों के तहत अनुकरण किया 

उनके अंतर्गत शहरी क्षेत्र में बाढ, बारिश के संबंध में सटीक जानकारियां नहीं दी जा पाती हैं। वह बताते हैं की वर्षा होने वाली प्रक्रियाओं में वायुमंडल में होने वाली घटनाएं और स्थान परिवर्तन महत्वपूर्ण रखता है। जब बरसात होने की स्थिति बनती है और उस दौरान परिणामस्वरूप बाढ़ के जलमग्न होने के सिमुलेशन में सुधार कर सकते हैं।

आईआईटी मद्रास के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एस.एन. कुइरी का कहना है, चेन्नई जैसे महानगर के लिए, वर्षा पूर्वानुमान जल संसाधन प्रबंधन एक ही विषय हो सकता है। इस अध्ययन में मौसम अनुसंधान और पूर्वानुमान (डब्ल्यूआरएफ) मॉडल का उपयोग करके 2015 की चेन्नई घटना से संबंधित वायुमंडलीय प्रक्रियाओं का विभिन्न एरोसोल स्थितियों के तहत अनुकरण किया गया।

उल्लेखनीय है कि चेन्नई जैसे तेजी से शहरीकरण वाले तटीय शहर के लिए मानसून के दौरान पर्याप्त जलाशय भंडारण बनाए रखना बेहद जटिल संतुलन है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलाशय में यदि पानी भरा हुआ है और मौसम की स्थिति बन रही है, उस दौर का भी अध्ययन किया गया है। ऐसे में ज्यादा बारिश होने की संभावना बनी हुई है तो जलाशय को खाली करना पड़ सकता है। अन्यथा बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

पानी का उचित प्रबंध किया जा सकेगा

वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि ज्यादा बारिश हो रही है और आपके जलाशय खाली हैं तो पानी का उचित प्रबंध किया जा सकेगा। जरूरत पड़ने पर उस पानी का सही उपयोग हो पाएगा और इससे बाढ़ की स्थिति भी नहीं रहेगी। यह परिस्थितियों प्रशासन को व्यवस्था बनाने के लिए बेहतर करती है। इससे यह भी पता चल जाएगा कि अगले कुछ घंटे में बारिश की मात्रा कितनी होगी। सामान्य शहर-स्तरीय मौसम पूर्वानुमान की तुलना में शहरी बेसिन स्तर का अधिक सूक्ष्म पूर्वानुमान जलाशय प्रबंधन और बाढ़ जोखिम आकलन को अधिक उपयोगी बना सकता है।

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