पक्षियों को बच्चों की तरह मानते हैं यहां के लोग, तमिलनाडु के दो गांवों ने छोड़ी दीपावली पर पटाखों की परंपरा

खबर सार :-

तमिलनाडु के दो गांवों में दिवाली फोड़कर नहीं, बल्कि मिट्टी के दीयों की रोशनी, अपनों के साथ बिताए गए खुशी के पलों और पेड़ों पर चहचहाते पक्षियों की आवाजों के बीच मनाई जाती है।
तमिलनाडु के 2 गांवों में 25 सालों से पटाखों के बिना मनाई जा रही दिवाली

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कोयंबटूर: पटाखों की आवाज के बिना दिवाली के त्योहार की कल्पना करना मुश्किल है। मिट्टी के दीयों की चमक, त्योहार की मिठाइयों की मिठास और आसमान में रंग-बिरंगी आतिशबाजी इस त्योहार की पहचान हैं। हालांकि, तमिलनाडु में कुछ ऐसे गांव हैं जहां दिवाली की खुशी पटाखों के शोर से नहीं, बल्कि पक्षियों की चहचहाहट से मनाई जाती है। यहां के ग्रामीणों ने पक्षियों और चमगादड़ों की सुरक्षा के लिए अपनी परंपराओं में बदलाव किया है।

तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले में स्थित किट्टमपालयम गांव में पिछले 25 सालों से पटाखे नहीं फोड़े गए हैं। इसी तरह, तिरुनेलवेली जिले के कुंथनकुलम गांव में भी दिवाली, शादियों और अन्य सामाजिक आयोजनों के दौरान पटाखे नहीं फोड़े जाते, ताकि वहां रहने वाले पक्षियों को बचाया जा सके।

पक्षियों की चिंता के कारण बदली दिवाली की परंपराएं

लगभग 25 साल पहले, कोयंबटूर जिले के कारुमाथमपट्टी के पास स्थित किट्टमपालयम के निवासियों ने मिलकर पटाखे न फोड़ने का फैसला किया। इस गांव में बड़ी संख्या में पक्षी और चमगादड़ रहते हैं, जो यहां के पुराने बरगद, पीपल और अन्य विशाल पेड़ों पर बसेरा करते हैं। दिवाली के दौरान, पटाखों के तेज शोर और धुएं से इन जीवों को बहुत परेशानी होती थी। ग्रामीणों को एहसास हुआ कि जिस त्योहार को वे इतने उत्साह और खुशी से मनाते हैं, उसका इन जीवों के प्राकृतिक जीवन पर बुरा असर पड़ रहा है।

इस समस्या को समझते हुए, गांव के बुजुर्गों ने पटाखे न फोड़ने का फैसला किया, ताकि पक्षी और चमगादड़ अपने प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रह सकें। समय के साथ, नई पीढ़ी ने भी इस फैसले को अपना लिया और अब यह इस गांव की एक खास पहचान बन गई है। आज भी, लगभग ढाई दशक बाद, ग्रामीण उसी प्रतिबद्धता के साथ दिवाली मनाते हैं। नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के फैसलों का सम्मान करती है। गांव वालों के लिए, यह सिर्फ पटाखे न जलाने की बात नहीं है; बल्कि यह प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की एक जीवन-दृष्टि को दर्शाता है। वे पक्षियों के जीवन और उनकी सुरक्षा को उतना ही महत्व देते हैं, जितना कि अपने खुद के त्योहारों और उत्सवों को। यही कारण है कि यह परंपरा इस गांव में पीढ़ियों से चली आ रही है।

पक्षियों के लिए बरगद, पीपल और फलदार पेड़ लगाना

गांव वालों की यह पहल सिर्फ पटाखे न जलाने तक ही सीमित नहीं है। वे पक्षियों को सुरक्षित आश्रय और भोजन उपलब्ध कराने के लिए नए पेड़ भी लगा रहे हैं—खासकर बरगद, पीपल, अंजीर, जामुन और अमरूद के पेड़। ये पेड़ पक्षियों को घोंसले बनाने के लिए जगह देते हैं, और साथ ही फलों व अन्य प्राकृतिक संसाधनों के रूप में उन्हें भोजन भी प्रदान करते हैं। इस पहल से गांव में हरियाली बढ़ रही है और पक्षियों के अनुकूल माहौल तैयार हो रहा है। गांव वालों का मानना ​​है कि पक्षियों को सुरक्षित आश्रय देना और उनके प्राकृतिक आवासों को बचाना समाज की जिम्मेदारी है।

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129 हेक्टेयर में फैले पक्षी अभयारण्य और तालाब

तिरुनेलवेली जिले में भी पक्षी संरक्षण की एक ऐसी ही अनूठी परंपरा देखने को मिलती है। तिरुनेलवेली के जिला वन अधिकारी इलांगो के अनुसार, जिले में नांगुनेरी के पास दो पक्षी अभयारण्य हैं—कूनथनकुलम और कट्टनकुलम। इन अभयारण्यों और इनसे जुड़े तालाबों का कुल क्षेत्रफल 129 हेक्टेयर है। इनमें से अकेले कूनथनकुलम अभयारण्य 71.02 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। मानसून के दौरान इन इलाकों में छाई हरियाली और अनुकूल प्राकृतिक वातावरण बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। विदेशों से आने वाले ये पक्षी तिरुनेलवेली जिले के विभिन्न तालाबों और झीलों में अपने घोंसले बनाते हैं और प्रजनन करते हैं। नतीजतन, मानसून के मौसम में पूरा इलाका पक्षियों की चहल-पहल से गूंज उठता है।

पक्षियों को अपने बच्चों की तरह मानते हैं ग्रामीण 

पक्षियों के महत्व को समझते हुए कूनथनकुलम गांव के लोगों ने उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मान लिया है। ग्रामीण इन पक्षियों के साथ अपने बच्चों जैसा व्यवहार करते हैं और उनकी सुरक्षा के लिए विशेष सावधानी बरतते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि पटाखों का शोर और धुआं पक्षियों के जीवन पर बुरा असर डाल सकता है, और उनके प्रजनन के लिए ज़रूरी पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है। यही कारण है कि यहां के निवासी कई सालों से दिवाली पर पटाखे नहीं जलाते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने इस परंपरा को अन्य सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों में भी अपना लिया है। शादियों जैसे शुभ मौकों पर भी यहां पटाखे नहीं जलाए जाते, और न ही किसी के घर में शोक के समय इनका इस्तेमाल होता है। इन ग्रामीणों के लिए, पक्षियों की सुरक्षा केवल एक त्योहार तक सीमित नहीं है; यह उनकी जीवनशैली का एक अहम हिस्सा बन गई है।

पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देती ग्रामीणों की एक पहल

हर साल, सरकार दिवाली पर पटाखों से होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण के बारे में जागरूकता अभियान चलाती है। तमिलनाडु सरकार ने तो पटाखे जलाने के लिए एक तय समय सुबह 6:00 से 7:00 बजे तक और शाम 7:00 से 8:00 बजे तक भी निर्धारित कर रखा है। इसके बावजूद, त्योहार के दौरान होने वाला प्रदूषण और वन्यजीवों पर इसका असर एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। इस संदर्भ में, किट्टमपालयम और कूनथनकुलम के ग्रामीणों की पहल पर्यावरण संरक्षण का एक सशक्त संदेश देती है। इन गांवों ने दिखा दिया है कि त्योहार मनाने के लिए तेज शोर और पटाखों की जरूरत नहीं होती। सामूहिक इच्छाशक्ति और प्रकृति के प्रति गहरी संवेदनशीलता के जरिए, समुदाय ऐसी परंपराएं विकसित कर सकते हैं जो आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण की रक्षा करने के लिए प्रेरित करें। ग्रामीणों की मूल सोच यह है कि हमारी खुशी किसी दूसरे जीव के लिए परेशानी का कारण नहीं बननी चाहिए। पटाखों से जगमगाते आसमान के बजाय, पक्षियों की चहचहाहट से गूंजते पेड़ों को अहमियत देकर, इन गांवों ने सह-अस्तित्व और प्रकृति के प्रति प्रेम का एक अनूठा उदाहरण पेश किया है।

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