Bhagalpur: समय पर करना होगा विक्रमशिला सेतु का काम, डॉल्फिन और प्रवासी पक्षी उठा रहे तकलीफ
खबर सार :-
विक्रमशिला सेतु के लिए काम चल रहा है। इस प्रोजेक्ट का असर सीधे गंगा के पानी पर पड़ रहा है। यहां के पानी पर बड़ी संख्या में निर्भरता भी है। यदि यही हाल रहा तो समस्त प्राणियों पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। मानव जीवन, पशु, पक्षी और जलीय जीव के साथ कृषि क्षेत्र के लिए भी यह सही नहीं होगा।
खबर विस्तार : -
भागलपुर, विक्रमशिला सेतु के पुनर्निर्माण का काम चल रहा है। यह काम शुरू होने से आज नहीं तो कल आम जनता को राहत मिल जाएगी। लेकिन सेतु के लिए शुरू किया गया जलयान परिचालन ज्यादा दिन तक अच्छी खबरें नहीं दे पाएगा। जल्द ही यह काम पूरा कर मशीनरी हटानी होगी। इसका वर्तमान ज्यादा प्रभाव नहीं बना पा रहा है, लेकिन आने वाले महीनों में परेशानियां ही परेशानियां होंगी। यह सबसे पहले गंगा पर रहकर गगाजल को अपनी चपेट में लेने लगा है।
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पानी में फेंक रहे हैं प्लाटिक सामग्री
यह सुनने में भले ही अच्छा लग रहा है कि आने वाले समय में यहां से यात्रा सुगम होने वाला है, लेकिन इसके उत्साह में यात्री अपनी नागरिक जिम्मेदारियों को भूल रहे हैं। वह पवित्र नदी को डस्टबिन बनाने में तुले हुए हैं। पर्यावरण को पूरी तरह से नुकसान करने की कोशिश की जा रही है। जहाजों से सीधे गंगा में प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के पैकेट के साथ ही कचरा भी फेंका जा रहा है। इससे पूरा इकोसिस्टम तबाह हो रहा है। इस पूरे क्षेत्र को हम विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभ्यारण्य के अंतर्गत जानते हैं।
इतनी जानकारी समझदार के लिए काफी होती है। इस नाम से ही पता चलता है कि यहां वर्तमान में विदेश से प्रवासी पक्षियों का आगमन शुरू हो चुका है। लोगों की लापरवाही यहां बेजुबान और विलुप्तप्राय जीवों के लिए आफत बन रही है। हजारों की संख्या में प्लास्टिक की थैलियां उड़ा करती हैं। भागलपुर का यह गंगा क्षेत्र आज से नहीं काफी समय से भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव, गांगेय डॉल्फिन (सोंस) का सुरक्षित गढ़ कहा जाता रहा है।
सर्दी का मौसम इनके लिए अनुकूल रहता
यहां आने वाले पक्षी सर्दियों में ही प्रवास करतेे हैं। इनकी यात्रा हजारों किलोमीटर की रहती है। जानकारों का कहना है कि जब यह यहां आते हैं, इनको खाने की पर्याप्त सामग्री मिलती है। यह मध्य एशिया और साइबेरिया से आतेे हैं। इनके यहां आने का कारण यही होता है कि वातावरण अनुकूल रहता है। यह दशकों पहले से यहां आया करते थे। तब भी इनको किसी प्रकार का संकट नहीं था। अब इनको पर्यावरण से संबंधित दिक्कतें आ सकती हैं। पूरा क्षेत्र विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभ्यारण्य के अंतर्गत आने के कारण दुनियाभर के लोग प्राकृतिक वातावरण का आनंद उठाने के लिए यहां आते रहते हैं।
बेजुबान की मौत का कारण भी है कचरा
यदि गंगा में हर साल इसी तरह से कचरा फेंका जाता रहा तो केवल सामान्य गंदगी नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बन सकता है। यह बात प्रख्यात पर्यावरणविद् सह पक्षी विशेषज्ञ दीपक कुमार उर्फ झुन्नू ने कही है। उनकी चेतावनी है कि गांगेय डॉल्फिन और मछलियां पानी में तैरती रहती हैं।
इस दौरान प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक को डॉल्फिन और मछलियां इस कष्टदायी और नुकसानदायक अपशिष्ट को अनजाने में निगल जाती हैं। कभी तो इनके प्राणों पर आ जाती है और कभी यह खतरा बना रहता है। इनके शरीर में पहुंचते ही यह पेट में विकार बनकर तो कई बार सांस लेने की तंत्रिका ब्लॉक कर देती है। इससे उनकी मौत हो जाती है।
खाने-पीने की वस्तुओं में आ रही है कमी
जो पक्षी विदेशों से आते हैं, वह एक ही जगह पर बैठने के लिए नहीं आते हैं। इधर-उधर उड़ना इनकी आदत में है। यह उड़ते हुए नदी के किनारे तो कभी टापुओं पर बैठ जाते हैं। जहां इनके लिए कीडे़, घोंघा और वनस्पतियां मिला करती हैं, वहां अब प्लास्टिक कचरा भोजन नष्ट कर रहा है। यहां का पानी भी प्रदूषित होने लगा है। उनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। नदी का पारिस्थितिकी तंत्र नॉन-बायोडिग्रेडेबल (न गलने वाला) प्लास्टिक नदी के तल में बैठकर पानी की प्राकृतिक शुद्धीकरण क्षमता और जलीय वनस्पतियों को खत्म कर रहा है।
सोशल वर्करों की मेहनत से मिल सकती है राहत
पर्यावरणविद दीपक कुमार ने जिला प्रशासन और जलयान ऑपरेटरों से संपर्क किया है। उन्होंने सभी पहलुओं से परिचित भी करा दिया है। अब आने वाले दिना में सभी संचालित स्टीमर और जहाजों पर पर्याप्त संख्या में बड़े कूड़ेदान रखे जा सकते हैं। यात्रियों को कचरा फेंकने की जरूरत न पड़े, जागरूकता के लिए भी पहल जरूरी है।
कानून बनाए तो गए हैं, उनका कड़ाई से पालन नहीं कराया जा रहा है। यदि नदी में कचरा फेंकने वालों पर ऑन-द-स्पॉट जुर्माने का प्रावधान लागू हो तो दीपक कुमार उर्फ झुन्नू के प्रयास सफल हो सकते हैं। कोई भी व्यक्ति इतना बड़ा काम अकेले नहीं कर सकता है। उन्होंने संदेश दिया कि याद रखिए, गंगा पार करना हमारी जरूरत है, लेकिन गंगा को स्वच्छ रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
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