डाली की विदाई पर छलक आते हैं आंसू, करमा पर्व पर निर्जला व्रत रखती हैं बहनें

खबर सार :-

नई दिल्ली, करमा पर्व का इतिहास बड़ा रोचक है। इस पर्व को बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है। पेड़ को एक देवता की तरह मान्यता दी गई है। पेड़ की डाली की घर पर पूजा की जाती है। बाद में इसकी विदाई कर किसी नदी में विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। यह समय बड़ा ही मार्मिक बन जाता है।
करमा-धरमा की कथा से शुरू होता है करम पर्व: पर्यावरण से भी है गहरा नाता

खबर विस्तार : -

नई दिल्ली, करमा पर्व रक्षाबंधन और भैया दूज की तरह मनाया जाता है। इसमें भाई-बहन के निष्कपट प्रेम की अद्भुत झलक दिखाई पड़ती है। जिस दिन यह पर्व आता है, बहनें निर्जला व्रत रखकर अपने भाइयों के सुख की कामना करती हैं। यह पर्व केवल भाई बहनों के रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए कृषि, पर्यावरण और सामाजिक बंधनों के को भी मजबूत करता है। 

जीवन को खुशहाल बनाने की कोशिश 

करमा पर्व में अनुष्ठान के अलावा निभाने की परंपरा भी रहती है। यह परंपरा मुंडा, उरांव, संथाल, और गोंड सहित तमाम जनजाति और सदान समुदायों के जीवन में रचा बसा होता है। इस पर्व के जरिए कई बातें सिखाई जाती हैं। जिसमें सत्य और निष्ठा भी शामिल होते हैं। यह लोग प्रकृति का सम्मान करते हैं। जीवन को खुशहाल बनाने की कोशिश करते हुए करमा उत्सव मनाते हैं।

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करम के सामने होते हैं नतमस्तक

दरअसल करमा पर्व के केंद्र में कर्म वास्तविक वनस्पति नाम है। करम पर्व के केंद्र में है करम (वानस्पतिक नामः नौक्लिया पार्विफोलिया / एडीना कोर्डिफोलिया) का वृक्ष है। इसके बारे में धार्मिक मान्यताओं के साथ लोकमान्यताएं भी हैं। कहते हैं कि यह एक लकड़ी होती है और इसमें कई औषधीय गुण होते हैं। सामान्य लकड़ियों की तरह इसमें कीड़े नहीं पड़ते हैं। करम देवता को पराक्रम और ऊर्जा का अधिष्ठाता माना जाता है। जब कभी सूखा, बाढ़ और अन्य परेशानियां सामने आती हैे, तब यह करम देवता से दुआएं करते हैं। उनके सामने नतमस्तक होते हैं।

 हरी फसलें, उन्नतशील फसलें, अनुकूल बारिश और अच्छी पैदावार के लिए लोक मान्यताओं पर आधारित है कि करम देवता। यही नहीं, रक्षा बंधन और भैया दूज की तरह ही भाई बहन का उत्सव भी मनाने की परंपराएं अलग हैं। इस दिन भाई कहीं जाते हैं तो बहनों की प्रार्थना कवच बनाकर उनकी रक्षा करती है और उनकी मदद करने में यह काम आती है।

बहन, भाई के लिए रखती है वृत

अगली सुबह को विसर्जन के समय भाई अपनी बहनों को नदियां पार कराते हैं। उन्हें ठेकुआ तथा पारंपरिक पकवान भी खिलाते हैं। यह सब प्रसाद की तरह पवित्र और सम्मानजनक होते हैं। दूसरी ओर जो अविवाहित कन्याएं होती हैं, वह करमा पर्व का शवा उत्सव मनाती हैं।  इसमें बांस की छोटी-छोटी सुंदर टोकरियों में रेत भरा जाता है और उसमें धान, मक्का, चना के बीज बोती हैं। इनकी देखरेख करती हैं और पारंपरिक तरीके से जावा उत्सव के गीत गाती हैं।

इन बीजों से अंकुरित पौधों की सेवा करती हैं। मान्यता यह है कि यह अंकुरित पौधे घर की खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक बनते हैं। वातावरण के लिहाज से भी इनको बहुत पवित्र और शुद्ध माना गया है। पूजा के दौरान खीरे को संतान के प्रतीक के रूप में अर्पित किया जाता है और नव सृजन की प्रार्थना की जाती है। पूजा में सुख समृद्धि की कामना करते हुए श्रद्धा अनुसार दान दक्षिणा की परंपरा है। इस पर्व में करम पेड़ की डाली लाने का नियम है। युवक और युवतियों के लिए विधान है कि वह नए वस्त्र पहनेंगे।

पूजा में लोककथा की है परंपरा

पूजा की थाल लेकर उस पर धूप अक्षत, सिंदूर, फूल और दूध लेकर वन की ओर प्रस्थान करेंगे। वहां पहुंचने पर वृक्ष की विधि विधान के साथ तीन डालियां काटी जाती हैं। कटी हुई डाली किसी भी सूरत में जमीन को छूने नहीं दी जाती है। इसे सम्मानजनक तरीके से गांव लाया जाता है। इसके बाद फिर अखाड़ा या आंगन को साफ सफाई करके करमा की डाली को रखा जाता है। यहीं पर व्रत रखने वाली महिलाएं बैठ जाती हैं। मान्यता है कि यहां पर एक लोक कथा सुनाई जाती है। 

डाली का किया जाता है विसर्जन

इसे अमर कथा के रूप में जाना जाता है। यह करमा और धरमा नामक दो भाइयों से जुड़ी होती है। जिसमें करम, सत्कर्म और धर्मा को धरम के साथ प्राकृतिक संतुलन की महत्ता को रेखांकित करते है। कथा संपन्न होने पर एक दूसरे के कानों में जावा के फूल लगाए जाते हैं। इसके बाद एक दूसरे को लोग शुभकामनाएं देते हैं। कथा संपन्न होने के बाद गीतों का उत्सव मनाते हुए आनंद उठाया जाता है।

युवतियां नृत्य करती हैं। इसके अगले दिन कर्म डाली को किसी पवित्र नदी या जल स्रोतों में विसर्जित कर दिया जाता है। इस समय यह भी महत्वपूर्ण होता है कि डाली की विदाई बहुत अच्छे तरीके से की जाती है, जिस समय विदाई का विधान होता है, ऐसा लगता है कि कोई घर का सदस्य रूखसत हो रहा है।

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