पशुओं के आश्रय की उचित व्यवस्था की मांग, वन्य प्राणियों का संरक्षण हो

खबर सार :-

मानव जीवन में अपनी तरक्की करने की होेड़ मची है। वह पशुओं पर हो रहे क्रूरता के बारे में नहीं सोच पाता है। लेकिन कुछ लोग इन बेजुबानों को उनका हक दिलाने के लिए जूझ रहे हैैं। 4 अक्टूबर 1925 को विश्व कल्याण दिवस पहली बार मनाया गया था। हर साल हर दिन पशुओं के कल्याण के लिए हमें प्रयत्न करना होगा। कठोर कानून बनाकर पशुओं को उनके आश्रय की उचित व्यवस्था हो।
world welfare day : बेजुबानों को भी उनका हक चाहिए

खबर विस्तार : -

लखनऊ, आज world welfare day है। हर साल 4 अक्टूबर को पूरी दुनिया में यह दिन पशुओं के कल्याण के लिए गर्मजोशी के साथ मनाया जाता है। पूरी दुनिया में पशुओं के कल्याण के लिए हजारों लोग संघर्ष भी करते रहते हैं। इनका नतीजा कुछ देखने को मिल रहा है। कई ऐसे वन्यजीव लुफ्त हो रहे हैं।

वनों की कटाई से वन्य प्राणियों के आश्रय हटे

यह प्राणी किताबों में सिमट कर रह जाते हैं। ऐसे दुर्लभ wild animals की रक्षा के लिए और उनकी संख्या बढ़ाने के लिए कोशिशों का दौर चल रहा है। इनकी प्रजनन की व्यवस्थाएं सरकारों की ओर से की जा रही हैं। कई केद्र खोले भी जा रहे हैं। वहीं स्वयंसेवी संगठनों ने भी कई महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। भारत में कभी सर्कस में बाघ, हाथी और चीता जैसे प्राणियों को देखा जाता था। वहीं, संगठनों की तमाम कोशिशें का नतीजा है कि अब यह आजाद रूप में जंगलों में घूम रहे हैं।

इनको कैद कर रखने की व्यवस्थाएं बंद कर दी गई हैं। इनके पालने पर भी नियम लगाए गए हैं। खूंखार प्राणियों के पालने की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई है। प्राणी उद्यान और चिड़ियाघरों में भी वही कैद किए जाते हैं, जो जंगल में नहीं रहना चाहते हैं और मानव जीवन के लिए खतरा बन जाते हैं। पहले कुछ कोशिशें की जाती हैं। उनको जंगल में भेजने की व्यवस्था भी जाती है। जब सफलता हाथ नहीं आती है तो उन्हें किसी न किसी तरह से वन्य प्राणियों में लाया जाता है।

बेजुबान प्राणियों के प्रति हमारी है जिम्मेदारी

यहां भी उनकी समुचित देखभाल की जाती है। उनके स्वास्थ्य और खाने पीने की बराबर व्यवस्थाएं की जाती हैं। 4 अक्टूबर को पूरी दुनिया में विश्व कल्याण दिवस मनाने का उद्देश्य पशु कल्याण के लिए है। यह दिन बेजुबान प्राणियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी और करुणा का प्रतीक माना जाता हैै। 1925 में जर्मनी के बर्लिन में इस दिन की शुरुआत की गई थी। इतिहासकारों का मानना है कि पशु प्रेमी पशुओं के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं। उनको आजादी की मांग करते हैं।

उनके संरक्षण के साथ उन पर होने वाली कू्ररता को रोकने के लिए जागरूकता फैलाने का आवाहन करते हैं। इसके बाद भी कई स्थानों पर कुछ उदाहरण मिल जाते हैं। इनमें मानव निर्दयता या क्रूरता के उदाहरण सामने आते हैं। अभी हाल ही में दक्षिण भारत में कई हाथियों के मारे जाने की खबरें मीडिया के जरिए आई हैं। आज इंसान की तरक्की की तमाम कोशिशें उनके अपने प्रयासों पर हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिनकी सोच नहीं बदली है।

पशु कल्याण से जुड़ी संस्थाएं हैं सक्रिय

जंगल की अंधाधुंध कटाई से पशुओं के घर उजड़ रहे हैं। उनके खाने की वनस्पतियां नष्ट हो रही हैं। वह बस्तियों की ओर विचरण करने लगे हैं। शहरीकरण से उनके प्राकृतिक आवासों पर प्रहार हो रहा है। खतरनाक प्रयासों के जरिए वन्य प्राणियों की मौत हो रही हैं। सड़कों के विस्तार और हाईवे के मकड़जाल में इनकी मौत हो रही है। इन पर प्रहार वह चाहे प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, पशु हत्या भी मानी जाए तो कम नहीं है।

सड़कों पर प्लास्टिक खाकर मारती गाएं, क्या यह कू्ररता नहीं है? पशु मानव तस्करी के शिकार बन जाते हैं। हाथियों की हत्या उनके दांत के लिए की जा रही है।वेदों में कहां गया है, अहिंसा परमो धर्मः और सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे का संदेश भी वन्य प्राणियों के लिए है। जागरूकता के प्रयासों के बीच पशुओं पर प्रयोग पर प्रयोग किये जा रहे हैं। इन पर भी पशु क्रूरता साफ झलकती ह। देश भर में पशु कल्याण से जुड़ी संस्थाएं सक्रिय हैं। इसके बाद भी इनके कल्याण के मायने सार्थक नहीं हो पा रहे हैं।

 गौशालाओं में पशुओं की हो रही दुर्दशा 

 गौशालाओं में पशुओं की दुर्दशा है। इसके बाद भी हम केवल गोष्ठियों और रैलियां तक ही संवेदनशीलताएं लागू करते हैं। सरकार भी पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 जैसे कड़े कानून के बारे में लोगों को जागरूक करती रहती है। पशुओं के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के लिए जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत है।

जर्मनी के लेखक और पशु कल्याण कार्यकर्ता हेनरिक जिमर मैन  के प्रयास से कुछ काम तो शुरू हुआ। पहला विश्व पशु कल्याण दिवस 24 मार्च 1925 को जर्मनी में मनाया गया था।  जरूरत है कि उनके चलाए गए मिशन पर बराबर काम होता रहे। निशुल्क पशु चिकित्सा सिविर, टीकाकरण, गोष्ठियां, स्कूल कॉलेज में शिक्षा के अलावा चौराहा तक में मानव जीवन में हृदय परिवर्तन की जरूरत है। इसके लिए हर जगह सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए। अन्यथा हम हर बरस इस दिवस पर कार्यक्रमों तक ही सीमित रह जाएंगे।

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