झारखंडः जिंदगी बचाने को छटपटा रही थी हथिनी, वन विभाग को पता नहीं कौन निकाल ले गया दांत

खबर सार :-

हाथी की जान जाने वाली खबरों को लेकर वन विभाग चिंतित नहीं दिख रहा है। कभी हाथी मृत पाया जाता है, कभी मार दिया जाता है। ऐसे में सरकार और एनजीओे की कोशिशें धरी रह जा रही हैं।
झारखंड के चाईबासा में खेत में मृत पाई गई हथिनी, दोनों दांत काट ले गए तस्कर

खबर विस्तार : -

चाईबासा, सरकार और एनजीओ की ओर से वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए नई-नई कोशिशें की जा रही हैं। वहीं इनकी जान लेने वालों की हिम्मत कानून से ज्यादा शक्तिशाली दिख रही है। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के जगन्नाथपुर थाना क्षेत्र के भनगांव के दीपसाई टोला में शुक्रवार सुबह एक हथिनी मृत पाई गई।

इसके दोनों दांत गायब पाए गए हैं। आशंका जताई जा रही है कि हथिनी की मौत के पीछे इन प्राणियों के दांत तस्करों की साजिश हो सकती है। बहरहाल, कारण कोई भी हो, इस घटना के बाद से वन्य प्राणियों और पशु प्रेमियों में खासी नाराजगी देखी जा रही है। जंगल में हथिनी की मौत का वास्तविक कारण पता लगाने के लिए लोगों में बेचैनी है।

ग्रामीणों ने खेत में हथिनी को मृत अवस्था में देखा जरूर था और इसकी सूचना भी वन विभाग को दी, लेकिन वह भी चाहते हैं कि हाथी की मौत का कारण बताया जाए। करीब 9 बजे वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने की कोशिश की। अधिकारियों ने आसपास के क्षेत्र से कुछ संदिग्ध वस्तुएं साक्ष्य में जुटाई हैं। उधर, हथिनी के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। 

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कई राज खुलेंगे

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के सटीक कारणों का पता चल सकेगा। वन्य प्राणी की मौत प्राकृतिक हुई या शिकार के चलते? इसकी जांच की जा रही है। यदि उसके दांत काटे गए तो सवाल दो तरह के उठने स्वाभाविक हैं। पहला कि दांत किसने और किस उपकरण से काटे? दूसरा सवाल यह कि वह प्राणी जिंदा था, तब दांत काटे गए या मरने के बाद?

एक सवाल यह भी कि मरने का वास्तविक कारण पता लगाया जाना जरूरी है कि हाथी के दांत काटने वाले ने उसकी जान ली या नहीं ली? बहरहाल, यह तो जाहिर है कि किसी भी परिस्थिति में दांत काटे गए, अपराध तो किया है। जांच करने वालों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और घटनास्थल से मिले साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। 

बिजली के तार से गई हाथी की जान

जगन्नाथपुर और आसपास के वन क्षेत्रों में पिछले एक वर्ष के दौरान करीब 7 हाथियों की मौत की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों की लगातार आवाजाही के बीच उनकी सुरक्षा और वन्यजीवों की सुरक्षा दोनों बड़ी चुनौती बन गई हैं। सितंबर में लातेहार में एक हाथी की मौत अवैध रूप से लगाए गए बिजली के तार की चपेट में आने से हुई थी। 

झाड़ियों में फंसकर गई हाथी की जान

मई में गिरिडीह के धोबरी वन क्षेत्र में एक कम उम्र के हाथी की झाड़ियों और लताओं में फंसने के बाद भूख-प्यास से मौत हुई थी। बीते साल भी चाईबासा वन प्रभाग के अलग-अलग जंगलों में दो सप्ताह के भीतर तीन हाथियों के शव बरामद हुए थे। बताया जाता है कि जगन्नाथपुर और आसपास के इलाकों में हाथियों के झुंड लगातार विचरण करते हैं। कई बार गांवों तथा रिहाइशी इलाकों में पहुंच जाते हैं। इसी दौरान हाथी गलत रास्ते का इस्तेमाल कर भटक जाते हैं।

विस्फोट की चपेट में हुई हाथी की मौत 

मानव-हाथी संघर्ष की स्थिति जब कभी बनती है तो उसका समाधान निकालने के लिए वन विभाग की टीम रहती है। इससे अलग सारंडा के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पूर्व में विस्फोट की चपेट में आने से हाथी की मौत हो चुकी है। पश्चिमी सिंहभूम के टोंटो क्षेत्र में इसी साल एक हाथी की मौत दूसरे हाथी के साथ संघर्ष में लगी चोटों के कारण हुई थी। 

हाथी को मारने की सजा क्या है?

भारत में हाथी को मारने पर 3 से 7 साल तक की जेल और कम से कम 25,000 रुपये का जुर्माना हो सकता है। वन्यजीव अधिनियम, 1972 की धारा 9 के तहत हाथी जैसे संरक्षित जंगली जीव का शिकार करना या उसकी हत्या करना एक गंभीर अपराध है। इसमें दोषी पाए जाने पर 3 से 7 साल की कैद और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
जंगल और उसके आसपास रहने वाले हाथियों और इंसानों की सुरक्षा के लिए कई तरह के सरकारी और पारंपरिक उपाय अपनाए जाते हैं।

प्रोजेक्ट एलीफेंट में हाथियों के संरक्षण और उनके आवास को बचाने के लिए यह प्रमुख कार्यक्रम चलाया जा रहा है। देश भर में 33 एलीफेंट रिजर्व और लगभग 150 हाथी गलियारों पहचाने गए हैं। साथ ही वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत हाथियों को नुकसान पहुँचाना, उन पर पत्थर फेंकना या पटाखे फोड़कर प्रताड़ित करना कानूनी अपराध है, जिसमें जेल और जुर्माने का प्रावधान है।

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